महाराजा हरि सिंह: जम्मू कश्मीर अधिमिलन के महानायक
         Date: 26-Oct-2018
 
 
 
जम्मू कश्मीर का भारत के साथ अधिमिलन 26 अक्टूबर 1947 को हुआ औऱ इसका सबसे बड़ा क्रेडिट सिर्फ एक शख्स को जाता है, जम्मू कश्मीर के तत्कालीन महाराजा हरि सिंह। अधिमिलन के नियमों के अनुसार प्रिंससी स्टेट्स के सिर्फ राजा य़ा नवाब को ये अधिकार था, कि वो अपने राज्य का भविष्य तय करे कि उसे किस देश का हिस्सा बनना है, भारत का या पाकिस्तान का। अंग्रेजी कूटनीति औऱ जिन्ना की तमाम कोशिशों, छल-प्रपंचों के बावजूद महाराज हरि सिंह ने भारत को चुना। उनके एक हस्ताक्षर के चलते ही यूनाइटेड नेशन्स ने भी माना कि अविभाज्य जम्मू कश्मीर सिर्फ और सिर्फ भारत का संवैधानिक राज्य है। 
  

 
 
ब्रिटिश शासन चाहता था कि जम्मू कश्मीर पाकिस्तान का हिस्सा बनें। क्योंकि जम्मू कश्मीर एशिय़ा में सामरिक औऱ भौगोलिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण राज्य था। लिहाजा ब्रिटिश पाकिस्तान के सहारे जम्मू कश्मीर पर अपना वर्चस्व बनाये रखना चाहते थे। जम्मू कश्मीर के प्रधानमंत्री रामचंद्र काक की पत्नी ब्रिटिश थी। जिनके जरिये वो महाराजा हरि सिंह को गलत सलाह दी जा रही थी। 22 अक्टूबर को पाकिस्तान ने जम्मू कश्मीर पर हमला कर दिया। जिसके बाद महाराजा हरि सिंह ने 26 अक्टूबर को भारत के साथ अधिमिलन पत्र पर हस्ताक्षर कर जम्मू कश्मीर को भारत का हिस्सा बना दिया।
 

 
 
जम्मू कश्मीर के अधिमिलन के समय जम्मू कश्मीर का काफी हिस्सा पाकिस्तानी हमलावरों के कब्ज़ें में था। ये कबाइली सेना  जम्मू कश्मीर के इलाकों में जबरदस्त कत्लेआम कर रही थी। महाराजा हरि सिंह अधिमिलन पर हस्ताक्षार के साथ तुरंत सैनिक सहायता की मांग की। 27 अक्टूबर को जब लॉर्ड माउंटबेटन ने अधिमिलन पत्र स्वीकार किया। ठीक उसी वक्त जम्मू कश्मीर में भारतीय सेना हवाई मार्ग से दाखिल हुई औऱ पाकिस्तानी सेना को जम्मू कश्मीर से बाहर खदेड़ना शुरू कर दिया।
 
 

 
 
जम्मू कश्मीर भारत का राज्य बनने के बाद पाकिस्तान ने मिथ्या प्रचार शुरू कर दिया और अधिमिलन पर सवाल उठाना शुरू कर दिया। कहा गया कि चूंकि राज्य में ज्यादातर जनसंख्या मुसलमानों की है, इसीलिए महाराजा का ये फैसला गलत है। लेकिन अधिमिलन अधिनियम के मुताबिक प्रिंसली स्टेट का राजा या नवाब को ये हक हासिल था कि वो अपने विवेक से अपने राज्य के भविष्य का फैसला करे। ना कि प्रजा की जनसंख्या के आधार पर। ये भी कहा गया कि अधिमिलन में देरी हुई। इसीलिए ये गलत है, लेकिन अधिमिलन अधिनियम के ही मुताबिक किसी भी प्रिंसली स्टेट को  अधिमिलन की कोई समय सीमा नहीं दी गई थीष लिहाजा ये मिथ्या प्रचार है।  
 

 
 
जम्मू कश्मीर अधिमिलन के बाद राज्य भारत का संवैधानिक हिस्सा बन चुका था। लेकिन इसके बावजूद भी जम्मू कश्मीर का बड़ा हिस्सा  पाकिस्तान के कब्ज़े में था।  पाकिस्तान के आक्रमणकारी रवैये के खिलाफ भारत ने 1 जनवरी 1948 को यूएन जाने का फैसला किया। यहां भी जम्मू कश्मीर अधिमिलन पत्र ही वो दस्तावेज़ था। जिसके आधार पर यूएन ने जम्मू कश्मीर पर भारत के दावे को सही माना।
 

 
 
यूएन ने पाकिस्तान को पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू कश्मीर से अपनी सेनायें वापिस लेने को कहा। लेकिन ब्रिटेन औऱ अमेरिका की शह पर पाकिस्तान ने यूएन की भी एक नहीं सुनी, और इस तरह जम्मू कश्मीर का आधे से ज्यादा हिस्सा पाकिस्तान के कब्जे में चला गया। 
 

 
 
1947 में जम्मू कश्मीर का क्षेत्रफल करीब  2,22,236 वर्ग किमी था। जिसमें से करीब 83 हजार वर्ग किमी हिस्सा पाकिस्तान के कब्जे में चला गया।  इसके बाद 1962 में चीन ने 37,555 वर्ग किमी हिस्से पर कब्जा कर लिया। इस प्रकार करीब 1 लाख 21 हज़ार वर्ग किमी हिस्सा आज चीन औऱ पाकिस्तान के कब्ज़े में है। जिसे पाकिस्तान अधिक्रांत जम्मू कश्मीर औऱ चीन अधिक्रांत जम्मू कश्मीर कहा जाता है।