सरदार पटेल ने कैसे जम्मू कश्मीर का अधिमिलन भारत में कराया, जानिए ये दिलचस्प कहानी
         Date: 31-Oct-2018
 
 
 
 
आजादी के समय देश के एकीकरण में सरदार वल्लभ भाई पटेल का सबसे बड़ा योगदान था। भारत के ताज़ जम्मू कश्मीर के अधिमिलन में भी सरदार पटेल की कूटनीतिक भूमिका का महत्वपूर्ण योगदान था। जम्मू कश्मीर एक ऐसा राज्य था जिसकी सीमा पाकिस्तान और भारत दोनों से मिलती थी. महाराजा हरी सिंह दोनों में से किसी भी डोमिनियन में जा सकते थे। ऐसी परिस्थितियों हरी सिंह के इस वैधानिक अधिकार का सम्मान करना सरदार वल्लभ भाई पटेल की वैधानिक और राजनैतिक दक्षता थी. वो जानते थे ऐसे समय में हम किसी तरह का दबाव यदि महाराज पर डालेंगे तो उनका रवैय्या प्रतिकूल हो सकता है. और ऐसा होने पर भारत के सारे विकल्प खत्म हो जाएंगे।
 
 
पटेल की यह सोच रणनीतिक रूप से भी सही थी, क्योंकि यदि भारत किसी तरह का दबाव या धमकी वाला रवैय्या रखता तो महाराजा पाकिस्तान भी जा सकते थे। ऐसा होने की सम्भावना थी यह इस बात से और ज्यादा स्पष्ट हो जाएगा जब आप यह समझेंगे कि पाकिस्तान के जम्मू कश्मीर पर हमला करने के बाद महाराजा हरी सिंह ने तुरंत राज्य का अधिमिलन भारत में कर दिया। जबकि पहले महाराजा ने स्टैन्ड्स्टिल एग्रीमेंट पाकिस्तान को भेजा था जिसे पाकिस्तान ने स्वीकार कर लिया था, जिसका मतलब था कि महाराजा भारत या पाकिस्तान से अधिमिलन का निर्णय लें तब तक यथास्तिथि बनी रहे। लेकिन जैसे ही पाकिस्तान ने यह एग्रीमेंट तोड़कर जम्मू कश्मीर पर आक्रमण किया, महाराजा ने राज्य का अधिमिलन भारत में कर दिया क्योंकि महाराजा यह समझ गए थे भारत निति और कानून के अनुरूप चल रहा है जबकी पाकिस्तान उसके ठीक विपरीत चल रहा है, पाकिस्तान की कथनी और करनी में अंतर है।
 
तो यहाँ पर रणनीतिक रूप में वल्लभ भाई पटेल सही साबित हुए।
 
 

 
 
 
अब आइये देखें कि कैसे एक राजनेता या स्टेट्समैन के रूप में भी सरदार बल्लभ भाई पटेल ने कमाल का काम किया जिसका जिक्र कोई भी वामपंथी लेखक कभी नहीं करता। इस बात का साक्ष्य है , जम्मू कश्मीर के उस समय के प्रधानमन्त्री मेहर चंद महाजन की पुस्तक Looking Back में उनका लिखा फर्स्ट हैंड अकाउंट।
 
 अब ये मेहर चंद महाजन कौन थे ?
 
 

 
 
मेहर चंद महाजन उस समय एक हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस थे। उन्हें वल्लभ भाई पटेल जम्मू कश्मीर का प्रधानमंत्री बननाचाहते थे क्योंकि वो जानते थे कि ऐसे सम्वेदनशील समय में एक सूझ भूझ वाला व्यक्ति राज्य का प्रधानमंत्री होना चाहिए। पटेल जम्मू कश्मीर के तत्कालीन प्रधानमंत्री राम चंद्र काक की हरकतों को जान चुके थे , काक, मेहर चंद से पहले राज्य के प्रधानमंत्री थे।
काक की पत्नी ब्रिटिश थी जिसने काक को ये सलाह दी कि वो महाराजा को किसी तरह मना ये कि जम्मू कश्मीर का अधिमिलन पाकिस्तान में होना चाहिए। साथ ही वो जिन्ना के प्रभाव में आकर महाराजा हरी सिंह को गलत सलाह दे रहे थे/ दिग्भ्रमित कर रहे थे और लगातार इस बात का दबाव बना रहे थे कि जम्मू कश्मीर का विलय पाकिस्तान में हो जाना चाहिए। ऐसे समय में मेहर चंद जैसे व्यक्ति का महाराजा हरी सिंह के साथ प्रधानमन्त्री के रूप में होना बेहद जरूरी था। किन्तु नेहरू के दबाव में मेहर चंद के जम्मू कश्मीर में जाने को लेकर समस्याएं आ रही थी, उसकी नियुक्ति की फाइल केंद्र से स्वीकृत नहीं हो पा रही थी।
 
 

 
 
 
ऐसे में एक दिन पटेल का महाजन जी से मिलना हुआ और उन्होंने महाजन से पूछाआप अभी तक जम्मू कश्मीर क्यों नहीं गए। तब उन्होंने बताया कि उनकी फाइल्स क्लियर नहीं हो रही है। ऐसे में पटेल नेअपनेप्रभाव का प्रयोग करते हुए मेहर चंद महाजन की फाइल्स तुरंत क्लियर करवाई और उनको जल्दी से जल्दी जम्मू कश्मीर भेजा गया। इस बात का पूरा ब्यौरा आप मेहर चंद महाजन द्वारा लिखी गयी आत्म कथा “ Looking back” में आप पढ़ सकते है। यहाँ पर यह बात ध्यान देने योग्य है की यदि पटेल जम्मू कश्मीर को लेकर नकारात्मक थे तो वे मेहर चंद महाजन को जम्मू कश्मीर भेजने के लिए प्रयत्नक्यों करते? पटेल जानते थे कि महाराजा के पास राज्य का अधिमिलन करने का वैधानिक अधिकार है ऐसे समय में उनको धमकी देने की बजाय एक अच्छे सलाहाकार की जरुरत है और मेहरचंद महाजन से अच्छा सलाहकार कौन हो सकता है। परिणाम आज पूरे देश के सामने है। जम्मू कश्मीर भारत का अंग है ।