छत्तीसिंहपुरा नरसंहार: जब कश्मीर में इस्लामी आतंकियों ने किया था सिखों को कत्लेआम
         Date: 04-Jan-2019
 
 
आजादी के 53 साल बाद साल 2000 की शुरूआत में जब देश जब तरक्की के नये सपनें देख रहा था। कश्मीर में बसे हिंदू और सिख तब भी दशकों से चल रहे आतंक के साये में जीने के मजबूर थे। केंद्र में वाजपेयी की सरकार थी और जम्मू कश्मीर में फारूख अब्दुल्ला की। 21 मार्च को अमेरिका के राष्ट्रपति बिल क्लिंटन भारत पहुंचने वाले थे। दुनिया सबकी निगाहें साउथ एशिया में शांति और क्लिंटन दौरे पर थी। ऐसे में कश्मीर के आतंकियों ने दुनिया को ये दिखाने का मौका चुना कि कश्मीर अभी भी आतंकियों की गिरफ्त में हैं और निशाना बनाया अनंतनाग जिले के छत्तीसिंहपुरा गांव में रह रहे सिखों को।
 
 
पिछले 10 सालों में साढ़े 3 लाख कश्मीरी हिंदू घाटी छोड़ चुके थे। लेकिन कश्मीर के इलाकों में बसे सिखों को लगा कि वो सुरक्षित हैं। उन्होंने डर के साये को हावी नहीं होने दिया। छत्तीसिंहपुरा गांव में करीब 10-20 परिवार थे। 21 मार्च 2000 की रात 15-17 आतंकी गांव में दाखिल हुए। उन्होंने गांव के सिख पुरूषों और लड़कों को गांव के ही गुरूद्वारे में इकठ्ठा होने को कहा। गुरूद्वारे में 36 सिख नौजवान और बूढ़े जमा कर लिये गये और फिर आतंकियों ने सबको लाइन में लगाकर गोलियों से दागना शुरू कर दिया। आतंकी तब तक गोलियां चलाते रहे, जब तक उनके यकीन नहीं हुआ कि सब मारे जा चुके हैं। इसके बाद आतंकी इत्मीनान से अंधेरे का फायदा उठाकर गांव से गायब हो गये। आतंकियों ने एक ही छटके में 35 बेकूसरों की जान ले ली, जिनका कसूर इतना था कि वो मुस्लिम बहुल घाटी में बेखौफ रह रहे थे और आतंकवाद के सामने घुटने टेकने से इंकार कर चुके थे।
 
 
 
 
इस नरसंहार में सिर्फ एक शख्स जिंदा बचा। वो थे नानक सिंह औलख, जिसने बाद में सबसे ये नरसंहार की दर्दनाक कहानी बतलाई। ये पहली बार था जब सिखों पर इतने बड़े पैमाने पर निशाना बनाया गया था। इसके बाद घाटी से लेकर दिल्ली तक हंगामा खड़ा हो गया। उप-प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने सिखों को अतिरिक्त सुरक्षा देने को कहा। लेकिन सिखों ने इस मांग को ठुकरा दिया। सिखों ने जल्द से जल्द जिम्मेदार लोगों को सबक सिखाकर न्याय की मांग की। 
 


 
 
सिखों ने बहादुरी से आतंकवादियों का सामना करने का फैसला किया। सुरक्षा एंजेसियों ने पाया कि इस नरसंहार में पाकिस्तान समर्थित लश्कर-ए-तैयब्बा और हिज्बुल मुजाहिदीन का हाथ था। न्यूयॉर्क टाइम्स के पत्रकार बैरी बीरक के साथ इंटरव्यू में हाफिज सईद के भतीजे और लश्कर आतंकी मुहम्मद सुहैल मलिक ने इस नरसंहार में लश्कर औऱ पाकिस्तान का हाथ होने की बात कबूली थी। इसके बाद मुबंई हमले के मामले में गिरफ्तार डेविड हेडली ने भी एनआईए के सामने छत्तीसिंहपुरा नरसंहार में पाकिस्तान के आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयब्बा के होने की पुष्टि की थी।