कश्मीर पर फेक प्रोपेगैंडा लेकिन PoJK पर चुप्पी, तुर्किये के भारत विरोधी सम्मेलन के आयोजन और पाकिस्तान प्रेम के पीछे की कहानी ?

    07-Nov-2026
Total Views |
 
 
5 नवंबर की सुबह जब पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर यानी POJK के रावलाकोट में पाकिस्तानी सुरक्षा बलों की ड्रोन स्ट्राइक में सात नागरिक मारे गए, इस घटना से ठीक पांच दिन पहले, तुर्किये के इस्तांबुल में कश्मीर के नाम पर एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन किया गया था.
 
नाम था— KASHMIR ISTANBUL SUMMIT 2026
 
इस सम्मेलन में शामिल होने वालों में पाकिस्तान के इस्तांबुल स्थित कॉन्सुल जनरल ख्वाजा खुर्रम नईम, वर्ल्ड कश्मीर फ्रीडम मूवमेंट के मुजम्मिल अय्यूब ठाकुर, सेंटर फॉर इस्लाम एंड ग्लोबल अफेयर्स के निदेशक सामी अल-एरियन और तुर्किये रिसर्च फाउंडेशन के उपाध्यक्ष एनेस बायराकली शामिल थे.
 
इन सभी में एक समानता है, जम्मू कश्मीर के मुद्दे पर इनका भारत विरोधी रुख.
 
लिहाजा, हैरानी नहीं कि इस सम्मेलन में जिन मुद्दों पर चर्चा हुई, उनमें कश्मीर में कथित मानवाधिकार उल्लंघन, हिंदुत्व और यहां तक कि कश्मीर की तुलना फिलिस्तीन से करना भी शामिल था.
 
इस पूरे घटनाक्रम को समझने के लिए पहले समझना होगा इसके आयोजक और उनके एजेंडे को.
 
तो आपको बता दें कि यह कार्यक्रम तुर्किये के युवा संगठन TÜGVA ने WKFM यानी World Kashmir Freedom Movement और The Kashmir Centre के साथ मिलकर आयोजित किया था.
 
ये तीनों संगठन जम्मू-कश्मीर के मुद्दे पर भारत विरोधी रुख के लिए जाने जाते हैं.
 
WKFM का मौजूदा अध्यक्ष डॉ. मुजम्मिल अय्यूब ठाकुर है, जो लंदन में रहकर कश्मीर के मुद्दे पर भारत विरोधी नैरेटिव चलाता रहा है.
 
वहीं The Kashmir Centre के कार्यकारी निदेशक भी डॉ. मुजम्मिल अय्यूब ठाकुर ही हैं. इस मंच के जरिए भी वह कश्मीर पर भारत विरोधी अभियान को आगे बढ़ाता रहा है.
 
यानी मंच तुर्किये का... मौजूदगी पाकिस्तान की... और चर्चा का केंद्र जम्मू कश्मीर
 
सम्मेलन के दौरान बुरहान वानी जैसे अलगाववादी चेहरे और जम्मू कश्मीर में पत्थरबाजी के पुराने वीडियो और तस्वीरें भी दिखाई गईं. इनके जरिए भारत के खिलाफ एकतरफा और भ्रामक नैरेटिव पेश करने की कोशिश की गई.
 
लेकिन यह पहली बार नहीं है, जब तुर्किये ने कश्मीर के मुद्दे पर पाकिस्तान के रूख का समर्थन किया हो. पिछले करीब एक दशक से तुर्किये के राष्ट्रपति एर्दोगन अलग-अलग अंतरराष्ट्रीय मंचों पर ऐसा करते आए हैं.
 
2017 में उन्होंने कश्मीर विवाद के समाधान के लिए बहुपक्षीय बातचीत की वकालत की थी.
 
इसके बाद 2019, 2021, 2025 और 2026 में संयुक्त राष्ट्र महासभा के मंच से उन्होंने बार-बार कश्मीर का मुद्दा उठाया और पाकिस्तान के रुख का समर्थन किया.
 
फरवरी 2020 में तो एर्दोगन ने पाकिस्तान की संसद के संयुक्त सत्र को संबोधित करते हुए यहां तक कह दिया था कि कश्मीर का मुद्दा तुर्किये के लिए भी उतना ही महत्वपूर्ण है, जितना पाकिस्तान के लिए.
 
लेकिन बड़ा सवाल है कि आखिर क्यों?
 
आखिर भारत के साथ रिश्तों की कीमत पर भी तुर्किये कश्मीर के मुद्दे पर पाकिस्तान के साथ खड़ा क्यों नजर आता है?
 
जबकि भारत का रुख इस मुद्दे पर पूरी तरह स्पष्ट है, कि केंद्र शासित प्रदेश जम्मू कश्मीर और लद्दाख का संपूर्ण भूभाग भारत का अभिन्न हिस्सा था, है और रहेगा. पाकिस्तान से बातचीत का एकमात्र लंबित मुद्दा उसके अवैध कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर के भूभाग यानी POJK को खाली कराना है.
 
तो तुर्किये के इस पाकिस्तान प्रेम के पीछे तीन बड़ी वजहें हैं, दोनों देशों के बीच पुराने रणनीतिक रिश्ते, मुस्लिम दुनिया में नेतृत्व की महत्वाकांक्षा और रक्षा सहयोग. हालांकि इससे किसकी कितनी रक्षा हो पाएगी ये आने वाला वक्त ही बताएगा.
 
लेकिन अब दोनों देश इस दिशा में एक और कदम आगे बढा चुके हैं. 6 नवंबर को तुर्किये की संसद ने पाकिस्तान और सऊदी अरब के साथ 7 अगस्त 2026 को हुए मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट को मंजूरी दे दी है. जिसके तहत किसी एक सदस्य देश पर बाहरी हमला सभी सहयोगी देशों पर हमला समझा जाएगा.
 
लेकिन जब तुर्किये कश्मीर पर फेक पाकिस्तानी प्रोपेगैंडा फैलाने में लगा है, यहां उससे एक सवाल पूछा जाना चाहिए.
 
अगर उसे वाकई कश्मीरियों के अधिकारों की इतनी चिंता है, तो फिर पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर में पिछले कई महीनों से जारी हिंसा और अत्याचार पर वो खामोश क्यों है?
 
दरअसल, POJK में पिछले पांच महीनों से जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी यानी JAAC के नेतृत्व में लोग सड़कों पर हैं. राजनीतिक अधिकारों, महंगाई, बिजली की कीमत और बेहतर प्रशासन की मांग से शुरू हुआ यह आंदोलन पाकिस्तान के अवैध कब्जे से छुटकारे की मांग में बदल चुका है.
 
पाकिस्तानी सेना इस विरोध प्रदर्शन को दबाने के लिए अब तक 400 से ज्यादा लोगों को बर्बरता से मौत के घाट उतार चुकी है, हजारों लोग लापता हैं. मानवाधिकार जैसी कोई चीज बची नहीं रह गई है. लेकिन तुर्किये की ओर से इस पर एक बयान तक नहीं आया.
 
तो क्या मानवाधिकारों की चिंता सिर्फ भारत के खिलाफ बयान देने के लिए है?
 
तुर्किये को समझना होगा कि भारत संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता पर कोई समझौता नहीं करेगा. उसका शुरु से ही यह स्पष्ट मत रहा है कि जम्मू-कश्मीर के मुद्दे पर किसी भी तीसरे देश की मध्यस्थता स्वीकार्य नहीं है. तुर्किये और भारत विरोधी ताकतों के इस तरह के आयोजन इसे प्रभावित नहीं कर पाएंगे.
 
साल 2019 में अनुच्छेद 370 के निष्प्रभावी होने के बाद से ही जम्मू कश्मीर आतंक और अलगाववाद का रास्ता छोड़कर विकास के रास्ते पर आगे बढ़ चुका है. और उसे डिरेल करने की भारत विरोधी ताकतों की इस तरह की साजिश कभी कामयाब नहीं पाएंगी. जम्मू कश्मीर नाऊ दिल्ली