24 हिन्दुओं की हत्या की वह रात जब कश्मीर घाटी में पाकिस्तान के राष्ट्रीय दिवस वाले दिन इस्लामिक आतंकवादियों ने 24 हिन्दूओं को बेहरहमी से मार डाला
   23-मार्च-2019

 
एक इंग्लिश मैगज़ीन को 2018 में रामकिशन धर बताते हैं, “बगल वाली मस्जिद से पंडितों और भारत के खिलाफ ऊंची आवाज में नारें लगने शुरू होते ही हम समझ जाते थे कि हमारा यहाँ से जाने का समय आ गया हैं।” ऐसा 1989 से लगातार होता रहा और आज जम्मू-कश्मीर हिन्दूओं से लगभग खाली हो चुका हैं। साल 1994 तक 2 लाख और 2003 तक विस्थापितों की संख्या 3 लाख से भी ऊपर चली गयी। इस साल तक वहां मात्र 7823 हिन्दू बचे थे। नाड़ीमर्ग नरसंहार के बाद इन बचे हुए हिन्दूओं के पास कोई विकल्प ही नहीं बचा। आज इनमें से भी अधिकतर अपने ही देश में शरणार्थी बन गए हैं।
 
शोपियां जिले में नाड़ीमर्ग (अब पुलवामा में) एक हिन्दू बहुल गाँव था, जिसकी कुल आबादी मात्र 54 थी। तत्कालीन मुख्यमंत्री मुफ़्ती मोहम्मद सईद के पैतृक गाँव से 7 किलोमीटर दूर स्थित इस गाँव में 23 मार्च, 2003 की रात सब तबाह हो गया। जब पूरा देश भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की याद में शहीद दिवस मना रहा था, तब नाड़ीमर्ग में हिन्दुओं का नरसंहार हो रहा था। उस दिन 7 आतंकवादी गाँव में घुसे और हिन्दूओं को चिनार के पेड़ के नीचे इकठ्ठा करने लगे। रात के 10 बजकर 30 मिनट पर इन आतंकियों ने 24 हिन्दुओं की गोली मार कर हत्या कर दी। गौर करने वाली बात है कि 23 मार्च को पाकिस्तान का राष्ट्रीय दिवस मनाया जाता हैं।
 
मरने वालों में 70 साल की बुजुर्ग महिला के लेकर 2 साल का मासूम बच्चा भी शामिल था। क्रूरता की हद पार करते हुए एक दिव्यांग सहित 11 महिलाओं, 11 पुरुषों और 2 बच्चों पर बेहद नजदीक से गोलियां चलायी गयी। कुछ रिपोर्ट्स का दावा है कि पॉइंट ब्लैंक रेंज से हिन्दूओं के सिर में गोलियां मारी गयी थी। आतंकी यही नहीं रुके उन्होंने घरों को लूटा और महिलाओं के गहने उतरवा लिए। न्यूयॉर्क टाइम्स अखबार ने इस घटना का जिम्मेदार ‘मुस्लिम आतंकवादियों’ बताया। अमेरिका के स्टेट्स डिपार्टमेंट ने भी इसे धर्म आधारित नरसंहार माना था।
 
 
आतंकियों को मदद पड़ोस के मुस्लिम बहुलता वाले गाँवों से मिली थी। उस दौरान जम्मू-कश्मीर पुलिस के इंटेलिजेंस विंग को संभाल रहे कुलदीप खोड़ा ने भी कहा कि बिना स्थानीय सहायता के नाड़ीमर्ग नरसंहार को अंजाम ही नहीं दिया जा सकता था। नरसंहार के चश्मदीद बताते है कि आतंकियों ने हिन्दूओं को उनके नाम से पुकारकर घरों से बाहर निकाला था। यानि वे पहले से ही इस योजना पर काम कर रहे थे। आतंकियों ने गाँव का दौरा किया हो, इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता। इस प्रकरण में राज्य सरकार की भूमिका भी संदेह वाली बनी रही। उस इलाके की सुरक्षा में लगी पुलिस को हटा लिया गया था। घटना से पहले वहां 30 सुरक्षाकर्मी तैनात थे, जिनकी संख्या उस रात को घटाकर 5 कर दी गयी।
 
अगले ही महीने इस नरसंहार में शामिल एक आतंकी जिया मुस्तफा को गिरफ्तार कर लिया गया। पाकिस्तान के रावलकोट का रहने वाला यह आतंकी लश्कर-ए-तोइबा का एरिया कमांडर था। उसमें जांच के दौरान बताया कि लश्कर के अबू उमैर ने उसे ऐसा करने के लिए कहा था। मुस्तफा के मुताबिक वह उन बैठकों का हिस्सा रहा, जहाँ देश भर के हिन्दू मंदिरों पर आतंकी हमले की योजना बनायी गयी थी। उसने एजेंसियों को बताया कि वे सभी पाकिस्तान के संपर्क में थे। वहां से उन्हें कहा गया था कि जेहाद के लिए 6 आतंकियों को दिल्ली और गुजरात में मुस्लिम युवाओं के बीच भेजना हैं। सितम्बर 2001 में सीमा पार से मुस्तफा कश्मीर घाटी में घुसा था। वह दूसरे 6 आतंकियों के साथ पुलवामा के आसपास आतंकी गतिविधियों को अंजाम देता था।
 
 
मुस्तफा स्थानीय लोगों से संपर्क से लश्कर में भर्ती होने के लिए युवाओं को उकसा रहा था। हथियारों और वायरलेस के अलावा उसके पास से कुछ दस्तावेज भी बरामद किये गए। उनसे पता चला कि उसे पैसा पाकिस्तान से मिलता था। इस गिरफ्तारी ने पाकिस्तान के उन दावों की पोल खोल दी जिसमें वह भारत में आतंकी गतिविधियों में अपना हाथ होने से इनकार करता रहा हैं। अमेरिका में तत्कालीन असिस्टेंट सेक्रेटरी ऑफ़ स्टेट्स (दक्षिण एशिया), क्रिस्टीना रोक्का ने भी चेतावनी देते हुए कहा कि पाकिस्तान को उसकी जमीन से संचालित आतंकवाद को रोकने के हरसंभव प्रयास करने चाहिए। नाड़ीमर्ग नरसंहार के सभी आतंकी पाकिस्तान से ही आये थे। इसकी पुष्टि बॉर्डर सिक्यूरिटी फ़ोर्स को 18 अप्रैल, 2003 को मिली एक सफलता से हो गयी। मुस्तफा के खुलासे के बाद बीएसएफ ने कुलगाम में तीन आतंकियों को मार गिराया। उनमें से एक आतंकी मंजूर ज़ाहिर था जोकि नरसंहार के साथ अक्षरधाम मंदिर हमलें में भी शामिल था। लाहौर का रहने वाला मंजूर लश्कर के लिए काम करता था।
 
नाड़ीमर्ग नरसंहार के बाद जम्मू-कश्मीर के हिन्दूओं के मन में बैठ गया कि वे राज्य में सुरक्षित नहीं हैं। बीते दशकों में उनके पुनर्वास की कोई ठोस योजना नहीं बनाई गयी। भारत के उच्चतम न्यायालय से भी उन्हें कोई राहत नहीं मिली। चूँकि यह मामला 27 साल पुराना है इसलिए न्यायालय इस पर सुनवाई नहीं कर सकता। मात्र यह कहकर 2017 में दो न्यायाधीशों की पीठ ने हिन्दूओं की घाटी में वापसी पर दायर पीआईएल को खारिज कर दिया। वास्तव में यह मामला एक मजाक बनकर रह गया हैं। दरअसल वहां हिन्दूओं का नरसंहार तो किया ही गया बल्कि उन्हें मानसिक रूप से प्रताड़ित भी किया गया हैं। उनके घर सस्ते दामों में स्थानीय मुसलमानों को बेच दिए गए। मसलन जिस हिन्दू के घर को 2.5 लाख में बेचा गया अगर उसकी जगह वह किसी मुसलमान का होता तो उसकी कीमत 8 लाख होती।
 
यह आतंकवाद के साथ साम्प्रदिकता का विचलित करने वाला एक उदाहरण हैं। शारीरिक, मानसिक और आर्थिक असंवेदनशीलता का यह वह रूप है जिसकी कोई कल्पना नहीं कर सकता। जम्मू-कश्मीर जिसे धरती का स्वर्ग कहा गया वह आज हिन्दूओं के लिए नरक बन गया हैं। खुले तौर पर वहां एक नहीं बल्कि कईं नरसंहारों को अंजाम दिया गया। इन मामलों पर कभी कोई कार्रवाई नहीं की गयी। जिन परिवारों ने नाड़ीमर्ग नरसंहार का दर्द झेला वह किन स्थितियों में हैं इसकी कोई जानकारी नहीं हैं। उम्मीद हैं कि लगभग बंद हो चुके न्याय के रास्ते एक दिन खुलेंगे और जम्मू-कश्मीर फिर से हिंदूओं से आबाद होगा।