जो शहीद हुए हैं उनकी, ज़रा जान लो कहानी- पुलवामा हमले में शहीद जवानों की पूरी जानकारी
   15-Feb-2019
 
 
 
14 फरवरी, 2019 को पुलवामा में आत्मघाती हमले में अब तक कुल 49 जवान शहीद हो चुके हैं। पिछले 30 सालों में जम्मू कश्मीर में ये सबसे बड़ा आतंकी हमला था। ज्यादातर जवान छुट्टी मनाकर वापिस लौटे थे और कश्मीर में उन्हें अपने ड्यूटी पर तैनात होना था। पूरा देश आज उनके शौक में डूबा है, ये शहीद देश के तमाम हिस्सों से थे, वो सिख भी थे, मुस्लिम भी और हिंदू भी। लेकिन क्षेत्र और मजहब से ऊपर उठकर उन्होंने देश के लिए शहादत हासिल की। आगे पढ़िए इन शहीदों की कहानी... ताकि हमारे दिलों में ये शहीद हमेशा जिंदा रहें। 
 
 
रोहिताश लाम्बा (राजस्थान)
 
3 महीने की बेटी का चेहरा तक नहीं देख पाए शहीद रोहिताश लाम्बा। पुलवामा में हुए आतंकी हमले में शहीद होने वालों में राजस्थान निवासी जवान रोहिताश लांबा भी शहीद हो गए हैं. उनके घर पर मातम पसरा हुआ है. बताया जा रहा है कि करीब एक साल पहले ही रोहिताश शादी के बंधन में बंधे थे. तीन माह पहले ही उनकी पत्नी ने बच्ची को जन्म दिया था।
 
 
मनोज कुमार बेहरा (ओडिशा)
 
मनोज कुमार बहेरा ओडिसा के कटक जिले के नियाली इलाके के रतनपुर गाँव का था। बेहरा के परिवार द्वारा बेहरा की मौत के बाद राज्य भर में शोक मनाया जा रहा है। पुलवामा आतंकी हमले में शहीद हुए कांस्टेबल मनोज कुमार बेहरा की शादी दो साल पहल ही हुई थी। शहीद बेहेरा की पत्नी इतिलता बेहरा को अभी तक इस कठोर वास्तविकता को मानने से इंकार कर रही है कि उनके पति ने शहादत प्राप्त कर ली है।
 
 
2006 में सीआरपीएफ में शामिल हुए मनोज ने कल सुबह ही फोन पर अपनी पत्नी इतिलता से बात की थी। इसके बाद से वो सदमें में हैं। कईं घंटे बाद भी इतिलता विश्वास नहीं कर रही हैं कि कि उनका पति 45 सीआरपीएफ जवानों में से है, जो श्रीनगर से 30 किलोमीटर दूर पुलवामा में हुए सबसे भयानक आतंकी हमले में मारे गए हैं।
 
 
एच गुरु(कर्नाटक)
 
गुरु (33) मांड्या जिले के मद्दुर तालुक के गुडीगेरे गाँव से हैं। वह आत्मघाती हमले में जान गंवाने वाले 42 सुरक्षाकर्मियों में से एक था। वह सीआरपीएफ की 82 वीं बटालियन का सदस्य था और जम्मू से श्रीनगर का नेतृत्व कर रहा था।
 
उन्होंने गुडीगेरे के एक सरकारी स्कूल में पढाई की और एक औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान में टेक्निकल में कोर्स किया। उन्होंने अपना प्रशिक्षण तो पूरा किया लेकिन उन्होंने नौकरी नहीं की और लगभग पांच साल पहले भारतीय सशस्त्र बलों में शामिल हो गए।
 
वह झारखंड में 94 वीं बटालियन के साथ तैनात थे। लगभग छह महीने पहले, वह अपने गाँव में एक नए निवास स्थान पर चले गए थे और पास के सासापुर गाँव की रहने वाली कलावती से शादी कर ली थी। उनके घर में उनकी पत्नी, पिता होन्नाह, माँ चिककोलम्मा और दो छोटे भाइयों, मधु और आनंद रहते है।
 
गुरु हर छह महीने में एक बार अपने घर जाते थे। वह 10 फरवरी को गुडीगेरे अपने घर से निकले और जम्मू पहुंचे और फिर वहां से श्रीनगर में अपनी बटालियन में शामिल होने के लिए 2500 जवानों के साथ निकल गए। रास्ते में ही सीआरपीएफ के काफिले पर हमला हुआ।
 
 
मानेश्वर बासुमतारी (असम)
 
सीआरपीएफ -98 बटालियन के शहीद हेड-कांस्टेबल मानेश्वर बासुमतारी की बेटी ने कहा कि पुलवामा आतंकी हमले के लिए जिम्मेदार लोगों को भारत सरकार जवाब दें, भले ही सीमा पार सर्जिकल स्ट्राइक को अंजाम दें।
 
बासुमतारी, जो असम के बक्सा जिले के तामुलपुर के कोलबारी गाँव के मूल निवासी थे। उन्होंने शहादत तब हासिल की जब 14 फरवरी, 2019 को जम्मू-कश्मीर में आतंकवादी ने सीआरपीएफ के काफिले पर हमला किया था। पूरे क्षेत्र में निराशा की लहर उमड़ पड़ी है। बसुमतारी के [परिवार में उनकी पत्नी सुनमती बासुमतारी और दो बच्चों - धनंजय और दिद्मेश्वरी हैं।

जयमल सिंह(पंजाब)
 
 
मोगा जिले के कस्बा कोट इसे खां के रहने वाले सीआरपीएफ जवान जयमल सिंह आतंकी हमले में शहीद हो गए। सीआरपीएफ की जिस बस को फिदायीन आतंकी ने निशाना बनाया उस बस को जयमल चला रहे थे। परिजनों ने बताया कि आमतौर पर जयमल की ड्यूटी ऑफिस में रहती थी, गुरुवार को उन्होंने लंबे अरसे बाद बस की स्टेयरिंग थामी थी। जयमल के शहादत की खबर जब गांव पहुंचीं तो उस वक्त उनकी पत्नी सुखजीत मायके में थी। शुक्रवार सुबह वह 6 साल के बेटे के साथ घर पहुंचीं। 26 अप्रैल 1974 को जन्मे जयमल सिंह 19 साल की उम्र में सीआरपीएफ में भर्ती हुए थे। जयमल सिंह अक्सर फोन कर अपने बेटे से काफी देर तक बात करते थे।
 
 
सुखजिंदर सिंह(पंजाब)
 
तरनतारन जिले के गंडीविंड धात्तल गांव के रहने वाले सुखजिंदर सिंह ने भी इस आतंकी हमले में शहीद हो गए। सुखजिंदर ने 17 फरवरी 2003 को 19 साल की उम्र में सीआरपीएफ ज्वाइन की थी। 8 महीने पहले ही वह प्रोमोट होकर हेडकांस्टेबल बने थे। पूरे परिवार की जिम्मेदारी उन पर थी। बड़े भाई जंटा सिंह ने बताया कि गुरुवार सुबह 10 बजे भाई ने फोन करके अपना हाल-चाल बताया और परिवार के बारे में पूछा था। सुखजिंदर ने यह भी पूछा कि वह उनकी पत्नी सर्बजीत कौर को मायके छोड़ आए हैं या नहीं? फोन रखने से पहले सुखजिंदर सिंह ने बताया था कि उनका काफिला कश्मीर जा रहा है और वह शाम को फोन करेंगे। शाम 6 बजे शहादत की सूचना आ गई। 2010 में शादी होने के 7 साल की मन्नतों के बाद 2018 में सुखजिंदर सिंह को बेटे की खुशी मिली, जिसका नाम उन्होंने बड़े चाव से गुरजोत सिंह रखा। अब 7 महीने बाद ही मासूम के सिर से पिता का साया उठ गया।
 
कुलविंदर सिंह (पंजाब).
 
रोपड़ जिले के गांव रौली निवासी दर्शन सिंह के इकलौता बेटा कुलविंदर सिंह भी पुलवामा हमले में शहीद हो गए। कुलविंदर का जन्म 24 दिसंबर 1992 को हुआ था। 2014 में वह सेना में भर्ती हुआ था। हाल ही में उसकी मंगनी हुई थी। नवंबर में शादी तय की थी। कुछ दिन पहले ही ड्यूटी पर वापस लौटा। गुरुवार को हमले के बाद उसकी यूनिट के एक जवान ने फोन किया था, पर उसने सही से जानकारी नहीं दी। शाम को मोबाइल पर शहीदों की लिस्ट आई तो उन्हें बेटे की शहादत का पता चला। इकलौते बेटे की शहादत के बाद अंदर से टूट चुके पिता ने कहा, 'मैं बर्बाद हो गया, पर इस बात पर गर्व है कि बेटा देश के काम आया।'
 
मनिंदर सिंह(पंजाब)
 
एक साल पहले ही सीआरपीएफ में भर्ती हुए दीनानगर के रहने वाले मनिंदर सिंह भी इस हमले में शहीद हो गए। 37 साल के मनिंदर दो दिन पहले ही छुट्टी से ड्यूटी पर लौटे थे। उनके पिता को बेटे की शहादत पर गर्व भी है और गम भी। साथ ही इस घटना के लिए जिम्मेदार लोगों पर गुस्सा भी उनकी आंखों में है। वह कहते हैं- भारत सरकार को पाकिस्तान से शहीदों के खून का बदला जल्द से जल्द लेना चाहिए। उसके बाद ही उनके बेटे की आत्मा और परिवार को इंसाफ मिल पाएगा। देश के वीरों का सही मायने में सम्मान हो पाएगा।
 
 
अश्विनी कुमार काछी(मध्यप्रदेश)
 
अश्विनी बचपन से सेना में भर्ती होकर देश सेवा करना चाहता था। राजस्थान में ट्रेनिंग पूरी होने के बाद छह महीने पहले ही वे जम्मू-कश्मीर में तैनात हुए थे। घर में इकलौते अश्वनी को ही सरकारी नौकरी मिली थी।
 
शहीद अश्विनी अपने परिवार में सबसे छोटे थे। अश्विनी के घर में माता-पिता के अलावा पांच भाई-बहन हैं। वह सीआरपीएफ की 35वीं बटालियन में पदस्थ थे। शहादत की खबर गुरुवार रात पिता को फोन पर मिली। पिता ने अपने बेटे के शहीद होने की खबर परिवार वालों को दी। अपना दुख भूलकर उन्होंने परिवार का हौसला बढ़ाया। पुलवामा हमले को लेकर परिवार सहित पूरा गांव आक्रोशित है।
 
 
तिलकराज(हिमाचल प्रदेश)
 
पुलवामा में गुरुवार को हुए फिदायीन हमले में कांगड़ा के सिपाही तिलकराज शहीद हो गए। इस हमले में सीआरपीएफ के कुल 40 जवान शहीद हुए। तिलक कांगड़ा के गांव धेवा के रहने वाले थे। तिलकराज तीन दिन पहले ही गांव से छुट्टी पूरी करके ड्यूटी पर पहुंचे थे। वह अपने नवजात बेटे को देखने आए थे। उसे पहली और आखिरी बार दुलार करके वह देश के लिए शहीद हो गए।
 
ग्रामीणों ने बताया कि तिलक ने जाने से पहले अपने नवजात बेटे को खूब प्यार किया था। हर समय खुश रहने वाले और मिलनसार तिलकराज गांव से निकले तो उन्होंने अपने दोस्तों और परिजनों से कहा था कि जल्द ही वापस आउंगा।11 फरवरी को घर से ड्यूटी जाने के मात्र 3 दिन के बाद उसके शहीद होने की खबर गांव में पहुंच गई।
 
 
प्रसन्ना साहू (ओडिशा) 
 
शहीद प्रसन्ना साहू जगतसिंहपुर जिले के शिखर गांव का निवासी था, साहू की शहादत के बारे में जब गाँव वासियों ने सुना तो छोटा सा शिखर गांव शोक में डूब गया। शाम को दुःखद समाचार सुनकर उनकी माँ और पत्नी गहरे सदमे में थे।
 
सीआरपीएफ की 61 बटालियनों में कांस्टेबल के रूप में तैनात पिछले साल नवंबर में अपने घर आए थे।
 
उनकी बेटी सोनी, जो त्रासदी के बाद टूट गई है, ने कहा, “मेरे पिता ने राष्ट्र के लिए अपना जीवन लगा दिया। मुझे और मेरे परिवार को उस पर गर्व है। उनका हमेशा से देश के लिए कुछ करने का सपना था। लेकिन एक बेटी के रूप में, मैंने अपने पिता को खो दिया, जो अब वापस नहीं आ सकते।
 
 
नितिन राठौर (महाराष्ट्र)
 
मारे जाने के कुछ घंटे पहले शुक्रवार सुबह 10 बजे, 35 वर्षीय केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के सिपाही नितिन राठौड़ ने अपनी पत्नी से आखिरी बार बात की थी। राठौड़ उन 45 सीआरपीएफ जवानों में शामिल थे, जो कल जम्मू-कश्मीर के पुलवामा जिले में हुए घातक आतंकी हमले में मारे गए थे।
 
महाराष्ट्र के बुलढाणा जिले के चौरपंगरा गाँव के एक मूल निवासी, राठौड़ 2005 में सीआरपीएफ में शामिल हुए थे। वह इस साल पदोन्नति होने वाले थे। वह CRPF की G कंपनी की 03 बटालियन में थे।
 
राठौड़ के बहनोई अशोक चव्हाण बताया, "वह अपने परिवार के साथ छुट्टियां बिताने के बाद 9 फरवरी को कश्मीर के लिए रवाना हुए थे। वह एक महीने के लिए यहां थे। मैं उन्हें अकोला स्टेशन पर छोड़ने गया था। गुरुवार को, लगभग। सुबह मेरी बहन ने उनसे बातचीत की। "
 
चूँकि उसने अपने पति की शहादत के बारे में सुना, वंदना गहरे सदमे में है, दंपति के दो बच्चे हैं: एक 7 साल की बेटी, प्राची और एक 9 साल का बेटा, पीयूष।
 
राम वकील (उत्तरप्रदेश)
 
मैनपुरी राम वकील भी इस आंतकी हमले में शहीद हुए हैं। विनायकपुर गांव के रहने वाले जवान राम वकील की पत्नी की मौत हो चुकी है। उनके तीन बच्चे हैं जिनकी देखरेख उनकी बूढ़ी मां करती हैं। तीनों बच्चों के सिर से मां के बाद अब पिता का साया भी उठ गया है।
 
संजय राजपूत (महाराष्ट्र)
 
शहीद संजय सिंह 1996 में सीआरपीएफ में शामिल किये गए। पहली पोस्टिंग त्रिपुरा में थी। 11 साल तक देश की सेवा करने के बाद उन्हें जम्मू-कश्मीर में पोस्टिंग मिली,मलकापुर के शहीद जवान संजय राजपूत के दो बेटे जय (12 वर्ष की आयु) और शुभम (8) हैं, और उनकी पत्नी सुषमा परिवार के साथ नागपुर में रहती हैं। 10 फरवरी को संजय राजपूत से मलकापुर आए थे, नागपुर में छुट्टियां बिता लेने के बाद जम्मू के लिए निकल गए। यह उनकी अंतिम यात्रा थी।
नसीर अहमद (जम्मू-कश्मीर)
 
शहीद नशीर अहमद, राजौरी जिले के डोडासन-बाला गाँव का निवासी था। 46 वर्षीय अहमद सेना में हेड कांस्टेबल के रूप में काम कर रहे थे और 22 साल की सेवा पूरी कर चुके थे। नशीर अहमद शहादत से पहले उस बस के कमांडर थे जिसे आत्मघाती हमले में निशाना बनाया गया।
 

अधवेश यादव (उत्तरप्रदेश)
 
पुलवामा के आतंकी हमले में चंदौली का लाल अवधेश यादव भी शहीद हो गए. अवधेश यादव 45वीं बटालियन में तैनात थे। रेडियो आपरेटर सिग्नल पद पर तैनात थे. जवान के शहीद होने की सूचना के बाद गांव मे मातम पसरा हुआ है. शहीद की मां कैंसर से पीड़ित हैं, जिसकी वजह से सूचना नहीं दी गई है. अवधेश मुगलसराय कोतवाली के बहादुरपुर गांव के रहने वाले थे.
 
 
श्याम बाबू (उत्तरप्रदेश)
 
पुलवामा में आतंकी हमले में जनपद कानपुर देहात का भी एक लाल शहीद हुआ है. कानपुर देहात के डेरापुर थाना के रैगवा के रहने वाले श्याम बाबू शहीद हो गए. जवान के शहीद होने की सूचना के बाद घर में मातम पसरा हुआ है. मौत की सूचना मिलते ही परिजन बेसुध हो गए. बीए प्रथम वर्ष की पढ़ाई करते हुए ही 2007 में उन्होंने सीआरपीएफ ज्वाइन की थी. श्याम लाल के दो बच्चे हैं. एक लड़का 4 वर्ष का और एक लड़की 5 माह की है.
 
 
अजीत कुमार आज़ाद(उत्तरप्रदेश)
 
शहीद होने वालों में उन्नाव शहर कोतवाली के लोकनगर मोहल्ला के रहने वाले प्यारेलाल भी उसी बस में सवार थे, 35 वर्षीय अजीत कुमार आजाद 115वीं बटालियन में सीआई के पद पर तैनात थे. देर शाम मौत की खबर मिलते ही मां राजवती, पत्नी मीना व दो बेटियों ईशा और श्रेया का रो-रोकर बुरा हाल है।
 
कौशल कुमार रावत(उत्तरप्रदेश) 
 
आगरा के कइरई गांव के जवान कौशल कुमार रावत भी हमले में शहीद हो गए. कौशल की शहादत की खबर आई तो पूरा गांव रो उठा. मां धन्नो देवी, भाई कमल किशोर और पूरा परिवार बेहाल हो गया.
 
प्रदीप सिंह (उत्तरप्रदेश)
 
कन्नौज के तिरवां के सुखसेनपुर निवासी जवान प्रदीप सिंह यादव भी उस बटालियन में शामिल थे, जिसे आतंकियों ने अपना निशाना बनाया. मौत की खबर मिलते ही परिवार पर गम का पहाड़ टूट पड़ा. प्रदीप अपने पीछे पत्नी नीरज और दो बेटी सुप्रिया यादव और सोना यादव छोड़ गए हैं.
 
 
अमित कुमार (उत्तरप्रदेश)
 
शामली के एक और जवान अमित कुमार के भी शहीद होने की सूचना है. अमित कुमार शामली के रेलपार कॉलोनी के निवासी थे।
 
 
विजय मौर्य (उत्तरप्रदेश)
 
देवरिया के भटनी थाना क्षेत्र के छपिया जयदेव गांव के विजय मौर्या भी हमले में शहीद हुए हैं. वे CRPF के 82वीं बटालियन में कॉन्स्टेबल पद पर तैनात थे।
 
 
रमेश यादव (उत्तरप्रदेश)
 
बनारस का सपूत शहीद, डेढ़ साल के बेटे को नहीं पता, कहां चले गए पिता। जम्मू कश्मीर के पुलवामा में आतंकी हमले में बनारस निवासी जवान रमेश यादव भी शहीद हो गए हैं। रमेश चौबेपुर थाना क्षेत्र के तोफापुर गांव के रहने वाले थे। उनके पिता का नाम श्याम नारायन है।
 
 
महेश कुमार (उत्तरप्रदेश)
 
प्रयागराज के मेजा के महेश कुमार भी शहीद हुए जवानों में शामिल हैं. महेश 118 बटालियन में तैनात थे. इससे पहले उनकी पोस्टिंग बिहार में थी।
 
 
प्रदीप कुमार (उत्तरप्रदेश)
 
शामली के बनत गांव के लाल प्रदीप भी इस हमले में शहीद हो गए. उनके घर में कोहराम मचा हुआ है. डीएम और एसपी ने मौत की पुष्टि की है।
 

पंकज त्रिपाठी(उत्तरप्रदेश)
 
महराजगंज के हरपुरा गांव के रहने वाले पंकज त्रिपाठी भी शहीद हुए हैं. चार दिन पहले ही छुट्टी खत्म कर ड्यूटी ज्वाइन की थी। थाना प्रभारी विश्वनाथ प्रताप सिंह ने घर वालों की सूचना के आधार पर मौत की पुष्टि की है। रमेश दो भाइयों में छोटे थे और उनके बड़े भाई गुड्डू कर्नाटक में दूध का कारोबार करते हैं। रमेश का डेढ़ साल का एक बेटा है।
 
 
हेमराज मीणा (राजस्थान)
 
कोटा जिले में विनोद कलां गांव के हेमराज मीणा (43) सीआरपीएफ की 61वीं बटालियन में थे। वे 18 साल से फौज में थे। बड़े भाई रामबिलास ने बताया कि हेमराज नागपुर (महाराष्ट्र) में ट्रेनिंग पर गए हुए थे। वहां से लौटते वक्त इसी सोमवार रात को कुछ देर के लिए गांव आए थे और मंगलवार सुबह साढ़े 6 बजे गांव से रवाना होकर बुधवार को ही जम्मू-कश्मीर पहुंचे थे। दोपहर बाद जैसे ही हमले की खबरें आई तो बेटियों की फौज के अफसरों से बात हो गई थी, इसके बाद मेरी भी कमांडर से बात हुई, तब जाकर उनकी शहादत की पुष्टि हुई। जाते वक्त हेमराज मीणा ने पत्नी से 20 दिन बाद ही वापस लौटने का वादा किया था एवं कहा था कि आने के बाद परिवार के साथ घूमने जाएंगे।
 
 
भागीरथ सिंह (राजस्थान)
 
राजाखेड़ा विधानसभा क्षेत्र के जैतपुर गांव निवासी भागीरथ सिंह सीआरपीएफ की 45 वीं बटालियन में तैनात था। गुरुवार को हुए आतंकी हमले में वे शहीद हो गए। भागीरथ के दो बच्चे हैं। इसमें एक बेटा और एक बेटी है। बताया गया है कि भागीरथ 17 जनवरी को छुट्टी पर आए थे और 11 फरवरी को ही छुट्टी समाप्त होने पर ड्यूटी पर चले गए थे। 4 वर्ष पूर्व ही उनकी शादी हुई थी। वह 2013 में सीआरपीएफ में भर्ती हुए थे। भागीरथ के बचपन में ही उसकी मां का देहांत हो गया था।
 
 
जीतराम (राजस्थान)
 
भरतपुर नगर क्षेत्र के गांव सुन्दरावली निवासी जवान जीतराम भी इस आतंकी हमले में शहीद हो गए। शहीद जीतराम घर से 2 दिन पहले ही पुलवामा गए थे। गांव मे जीतराम के शहीद होने की सूचना पर मातम का माहौल छाया हुआ है।
 
 
नारायण गुर्जर (राजस्थान)
 
राजसमंद के बिनोल गांव के निवासी थे नारायण गुर्जर। 12 फरवरी को ही वह ड्यूटी पर लौटे थे। पुलवामा आतंकी हमले में उनकी शहादत की खबर से पूरे गांव में सन्नाटा पसर गया।