क्यों ज़रूरी है आर्टिकल 35 A को हटाना ?
   25-फ़रवरी-2019

 
 
• 14 मई, 1954 को बिना संसद की मंजूरी के भारतीय संविधान में संशोधन कर कथित रूप से, सिर्फ राष्ट्रपति के एक आदेश द्वारा, अनुच्छेद 35A के नाम से एक नया अनुच्छेद जोड़ दिया गया, जो असंवैधानिक है और जिस का जन्म ही अवैध है l
 
• यह अनुच्छेद भारत के मूल संविधान में अनुछेद 35 के बाद नहीं मिलता है , बल्कि यह अनुच्छेद संविधान के साथ जोड़े गए एक अपेंडिक्स / परिशिष्ट में मिलता है l
 
• 35A भारत के संविधान में एक ऐसा अनुच्छेद है जो जम्मू कश्मीर राज्य सरकार / राज्य विधान सभा को भारत के उन नागरिकों को, जो जम्मू कश्मीर के स्थाई निवासी ( परमानेंट रेजिडेंट ऑफ़ जम्मू कश्मीर ) की श्रेणी में रखे गए हों ,जम्मू कश्मीर राज्य में विशेष अधिकार देने और अन्य को पूरी तरह से बाहर करने का अधिकार देता है l
 
• साथ ही राज्य की विधानसभा / सरकार को जम्मू कश्मीर के स्थायी निवासियों को परिभाषित कर, उन्हें परमनेंट रेसीडेंट सर्टिफिकेट यानी PRC देने का अधिकार भी देता है, परन्तु जो पीआरसी धारक नहीं है उन्हें सामान्य नागरिकों के अधिकार भी नहीं दिए जाते हैं l
 
• जम्मू कश्मीर की अब तक की सरकारों ने इस अनुच्छेद का प्रयोग इस राज्य के स्थाई निवासी कहे जाने वाले नागरिकों के हक़ में बहुत कम किया है, बल्कि इस अनुच्छेद का दुरुपयोग जम्मू कश्मीर राज्य को भारत से भिन्न बताने के लिय कुछ ज्यादा किया है l
 
• जम्मू कश्मीर के स्थाई निवासी कहे जाने वाले भारत के नागरिकों के भी मूल अधिकारों का हनन करने वाले कानून इस राज्य में बने हुए हैं और सुधार करने के लिए दिए गए सुझावों को भी यहाँ की सरकारें साल 2018 तक लगातार नकारती आई हैं l
 
• अनुच्छेद 35A के कारण जम्मू कश्मीर राज्य में रहने वाले इस राज्य के मूल निवासी की श्रेणी वाले भारत के नागरिकों के साथ दशकों से इस राज्य में रहनेवाले में कई अन्य समुदाय भी अपने मूलभूत अधिकारों से वंचित हैं और वंचित रखे जा रहे हैं l
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अनुछेद 35A की शिकार जम्मू कश्मीर की स्थाई निवासी महिलाएँ भी :
 
देश में महिलाओं और पुरुषों को समान अधिकार प्राप्त हैं लेकिन विडंबना यह है कि जम्मू कश्मीर में यहाँ की स्थाई निवासी महिला ( PRC रखने वाली महिला ) चाहे किसी भी धर्म से हो, यदि किसी बिना PRC वाले व्यक्ति से विवाह करती है तो अपने राजनीतिक, शैक्षणिक और सम्पत्ति के अधिकारों से वंचित हो जाती है एक तरह से जम्मू कश्मीर के स्थाई निवासियों की आधी अबादी अपने मानवाधिकारों से भी वंचित है l
 
इनके बच्चे , जम्मू कश्मीर में ही पैदा होने के बावजूद, अपनी माँ की संपत्ति के उत्तराधिकारी नहीं हो सकते हैं और सरकारी शैक्षणिक संस्थानों में,जैसे मेडिकल या इंजीनियरिंग कॉलेज में पढ़ नहीं सकते हैं l वे राज्य सरकार के अधीन किसी पद पर नौकरी नहीं कर सकते है और राज्य में विधानसभा और अन्य स्थानीय चुनाव ना तो लड़ सकते हैं और ना ही उनमे वोट कर सकते हैं l
 
अनुछेद 35A की शिकार जम्मू कश्मीर की स्थाई निवासी जनजातियाँ ( S.T) भी :
 
जम्मू कश्मीर के वे स्थाई निवासी जो S.T की श्रेणी में आते हैं और जिनकी संख्या राज्य में 10 % के आस पास है, उनको विधान सभा में आरक्षण प्राप्त नहीं है और अनुच्छेद 35 A के कारण वे अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ने न्यायालय भी नहीं जा सकते l
 
 
 
• अनुच्छेद 35A की शिकार जम्मू कश्मीर की स्थाई निवासी अनुसूचित जातियाँ ( S.C) भी :
 
जम्मू कश्मीर के स्थाई निवासी S.C भी अनुच्छेद 35A की वजह से अपने अधिकारों से वंचित हो रहे हैं क्योंकि राज्य में विधान सभा में अनुचित ढंग से अनुसूचित जाति के लिये सीटें बढ़ाने की प्रक्रिया को साल 2031 तक स्थगित कर दिया गया है जब कि साल 1987 के बाद कम से कम २ सीटें बढ़ाने की आवश्कता बन गई थी पर यहाँ भी न्यायलय कुछ नहीं कर सकता है l
 
• अनुच्छेद 35A की शिकार जम्मू कश्मीर की स्थाई निवासी आम जनता भी अपने वैधानिक अधिकार से वंचित है :
 
बड़े ही सुनियोजित तरीके से राज्य की विधान सभा ने साल 2002 में विधान सभा की सीटों के delimitation को 2031 के बाद तक टाल दिया था, जिससे पिछड़े इलाकों के जम्मू कश्मीर के स्थाई निवासियों के साथ घोर अन्याय हो रहा है, पर अनुच्छेद 35A के संरक्षण में इस कानून को चुनौती नहीं दी जा सकती है l
 
 
जम्मू कश्मीर के 1947 से पहले के कुछ स्टेट- सब्जेक्ट ( state सब्जेक्ट) परिवार भी अनुच्छेद 35A के शिकार :
 
अनुचित ढंग से जम्मू कश्मीर की सरकार ने 1947 में पाकिस्तान अधिक्रान्त जम्मू कश्मीर के कुछ इलाकों से आ कर भारत के अन्य राज्यों में रह रहे 5300 परिवारों और उन के वंशजों को जम्मू कश्मीर का स्थाई निवासी मानने से इंकार कर दिया है l
 
जब कि इस राज्य के कानून के अनुसार 1947 में जो लोग जम्मू कश्मीर से पाकिस्तान चले गए थे वे आज भी आकर अपनी ज़मीन वापस ले सकते हैं l यहाँ तक की प्रधानमंत्री विकास - PM Development पैकेज २०१५ के अंतर्गत दी गई सहायता राशि भी POJK के इन विस्थापितों को नहीं दी गई l
 
• शिक्षा के क्षेत्र में राज्य के स्थाई निवासियों की भी हानि -
 
35A के तहत चूँकि जम्मू कश्मीर राज्य के बाहर के भारतीय नागरिकों को यहाँ सरकारी सेवा में नहीं लिया जा सकता l इसलिय सरकारी मेडिकल व इंजीनियरिंग कॉलेजो में अच्छे प्रोफेशनल्स की कमी को पूरा नहीं किया जा सकता, जिस कारण यहाँ के बच्चों की पढ़ाई का बहुत नुकसान हो रहा है ।
 
• स्वास्थ्य सेवाओं में नुकसान -
 
35A के कारण यहाँ बाहर से बड़े डॉक्टर और रिसर्चर या शोधकर्ता नहीं आते है। यहाँ सरकारी सुपर- स्पेशलिटी प्राइवेट हॉस्पिटल्स और मेडिकल कॉलेज में डॉक्टरों की बड़ी कमी है ।
 
 
35 A का शिकार वाल्मीकि समुदाय:
 
जम्मू कश्मीर के वाल्मीकि समुदाय के सफाई कर्मचारी जो सबकी गन्दगी साफ करते हैं, वे खुद कानूनी गंदगी का शिकार हैं।
लगभग शरणार्थियों जैसा जीवन जीने को मजबूर वाल्मीकि समुदाय के लोग जिन को सरकार द्वारा पंजाब से 1957 जम्मू कश्मीर में बुलाया गया था, आज 60 साल के बाद भी मूलभूत स्थानीय अधिकारों से से वंचित हैं। इनके बच्चे उच्च स्तर तक शिक्षा प्राप्त तो कर सकते हैं, परन्तु अनुच्छेद 35A की आड़ में बनाये गए नियमों की वजह से उनके पास सफाई कर्मचारी बनने के अलावा और कोई चारा नहीं।
 
गाँधी और आंबेडकर के इस देश में, दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में आज भी एक सफाईकर्मी का बेटा चाहे कितना भी पढ़ ले, जम्मू कश्मीर राज्य में उसको सरकार सिर्फ झाड़ू उठाकर जम्मू की सड़कें और गन्दगी साफ़ करने की नौकरी ही दे सकती है l ये लोग न तो सरकारी नौकरी कर सकते और न ही किसी सरकारी उच्च शिक्षा या प्रोफेशनल कोर्स, जैसे मेडिकल या इंजीनियरिंग कोर्स में एडमिशन ले सकते और न ही विधान सभा में चुनाव लड़ सकते हैं और वोट भी नहीं डाल सकते हैं । 
 
 
 
• पश्चिमी पाक शरणार्थी:
 
1947 के विभाजन में पश्चिमी पाकिस्तान से आए कुछ शरणार्थी जम्मू आकर बसे, क्योंकि इनमे भाषा का , रीति रिवाज़ का और संस्कृति का परस्पर ताल मेल था l
 
परन्तु 6 दशक बीतने के बावजूद आज भी ये लोग पश्चिमी पाकिस्तानी शरणार्थी के नाम से जाने जाते हैं । इनकी कुल आबादी में से 80% लोग अनुसूचित जाति से है।
 
इनके पास न तो खुद के स्वामित्व वाली जमीनें हैं और न ही मकान क्यों कि ७० साल बाद भी इन को जम्मू कश्मीर के स्थाई निवासी का दर्जा नहीं दिया गया है ।
 
ये लोग भी न तो सरकारी नौकरी कर सकते और न ही किसी सरकारी उच्च शिक्षा या प्रोफेशनल कोर्स, जैसे मेडिकल या इंजीनियरिंग कोर्स में एडमिशन ले सकते और न ही विधान सभा में जा सकते हैं ।
 
 
 • गोरखाओं के साथ विश्वासघात:
 
देश की आजादी से पहले जम्मू कश्मीर के महाराजा की सेना में गोरखा सैनिकों ने राज्य की सुरक्षा के लिए अनेक लड़ाईयाँ लड़ीं और अद्वितीय बलिदान दिए। किन्तु गोरखा भी अन्य पीड़ित वर्गो की तरह भेदभाव का शिकार है।
इन में से भी अधिकाँश परिवारों को स्थाई निवासी का दर्जा (PRC) नहीं दिया गया है और ये लोग भी सरकारी विभागों में केवल चौकीदारी कर सकते है
 
वे किसी सरकारी उच्च शिक्षा या प्रोफेशनल कोर्स, जैसे मेडिकल या इंजीनियरिंग कोर्स में एडमिशन नहीं ले सकते और न ही विधान सभा में जा सकते हैं ।
 
वीर गोरखा समाज के बच्चें ‘मोमोस’ (Momos) की रेहड़िया लगाने को मजबूर हैं ।
आज देशभर में एस. सी. और ओ बी सी के लोगों के लिए आरक्षण का प्रावधान है परन्तु इनको इस आरक्षण का लाभ भी नहीं मिल पाता। लोकसभा चुनाव में तो ये वोट डाल सकते है परन्तु पंचायती और विधानसभा चुनावों में उन के पास वोट डालने का भी अधिकार नहीं है।
 
ये ज़मीन नहीं खरीद सकते है, अपना घर नहीं बना सकते है, जिस ज़मीन पर सत्तर साल से खेती कर रहे हैं, वो इनकी अपनी नहीं हो सकती है l
 
अनुच्छेद 35 A उपरोक्त लिखित तीनों वर्गो के मानवाधिकार, आर्थिक, लोकतान्त्रिक और सामाजिक अधिकारों का हनन ही नहीं करता बल्कि इन लोगों को दोयम दर्जे का जीवन यापन करने के लिए मजबूर करता है।
 
केन्द्रीय सेवाओं से सेवा निवृत्त भारत के नागरिक :
 
जो आई ए एस अधिकारी जम्मू कश्मीर में 30 -32 वर्षों तक नौकरी कर राज्य का प्रशासन सुचारु रूप से चलाते है. वे यहाँ अपना स्थायी घर नहीं बना सकते, यही नहीं उनके बच्चे यहाँ सरकारी शैक्षणिक संस्थानों में पढ़ नहीं सकते है और राज्य सरकार की किसी भी नौकरी के हक़दार नहीं होते हैं l
 
 
• सेना के जवानों के बलिदान की अनदेखी :
 
जम्मू कश्मीर में पकिस्तान एवं चीन के साथ सटी सीमाओं पर और इस राज्य में हो रही आतंकवादी गतिविधियों के परिणाम स्वरूप देश में सबसे अधिक सैनिक / सुरक्षा कर्मी यहाँ शहीद होते हैं l
 
भारत की सीमाओं पर लड़ने वाले वीर सैनिकों में से 21 को परम वीर चार से सम्मानित किया गया है जिन में 16 ने जम्मू कश्मीर में सीमा पर लड़ा है और उन में 15 जम्मू कश्मीर के बाहर के राज्यों से हैं l
 
दुर्भाग्यपूर्ण सच ये है की देश की एक-एक इंच ज़मीन की रक्षा करते अपने प्राणो की आहुति देने वाले भारत के अन्य राज्यों में रहने वाले जवानों के परिवारों के नाम ज़मीन का एक टुकड़ा भी जम्मू कश्मीर में नहीं किया जा सकता है और ना ही किया गया है l
 
• इसके आलावा जम्मू कश्मीर के आम आदमी के लिए भी अनुच्छेद 35 A एक अभिशाप है क्योंकि :
 
यह आर्थिक विकास में रुकावट है, राज्य में देश के बड़े उद्योगपति किसी प्रकार का व्यापार , फैक्ट्री , इंडस्ट्री लगाने से कतराते हैं l परिणामस्वरूप राज्य का आर्थिक विकास न के बराबर है ।
 
इसी कारण 70 सालों में इस राज्य में कोई विशेष प्रगति नहीं हुई है l पूरे देश में मल्टी नेशनल कम्पनीज अपने ऑफिस खोले रहे हैं, पर जम्मू-कश्मीर में न तो कोई मल्टी नेशनल कंपनी ऑफिस खोलती है और न ही पढ़े लिखे युवाओं को नौकरी मिलती है।
 
जम्मू कश्मीर के चौतरफ़ा विकास का रास्ता खोलने और राज्य के जनसाधारण को आधुनिक सुविधाओं और तरक़्क़ी के सभी लाभ दिलवाने के लिए ज़रूरी है कि भारतीय संविधान में अवैध तरीके से जोड़े गए अनुच्छेद 35A को उखाड़ फेंका जाए।
 
इसकी की आड़ में यहाँ सत्ता में रहने वाले लोग अब तक राज्य की बहुत हानि कर चुके है और अनुच्छेद 35A को एक तरह से पृथकतावाद के निशान की तरह इस्तमाल करते रहे l
 
सही तो ये होगा की इस अनुच्छेद को अस्तित्वहीन घोषित कर दिया जाए क्योंकि तकनीकी रूप से इसका भारत के संविधान में कोई अस्तित्व ही नहीं है l
 
आर्टिकल 35A हटे इसी में जम्मू कश्मीर के स्थाई निवासियों का भी हित है।
 
अभी नहीं तो कभी नहीं।