हजारों वर्षों से सनातनी परंपरा को अमरत्व प्रदान कर रही अमरनाथ यात्रा
   10-जुलाई-2019


 

 
भगवान अमरनाथ की यात्रा प्रतिवर्ष आयोजित होती है जो श्रावण मास तक चलती है। लाखों की संख्या में श्रद्धालु शिव के इस स्वरूप का दर्शन करने जाते हैं। यहाँ भगवान शिव कंदरा में ‘हिमलिंग’ अर्थात बर्फ के लिंग-विग्रह के रूप में विराजमान हैं।

अमरनाथ यात्रा के बारे में एक कहानी प्रचलित है कि आज से तीन सौ वर्ष पहले बूटा मलिक नामक एक मुस्लिम चरवाहे ने अमरनाथ गुफा की खोज की थी। कहानी इस प्रकार है कि बूटा मलिक को एक साधु मिलते हैं जो उसे कोयले से भरी एक कांगड़ी देते हैं। बूटा मलिक जब कांगड़ी को लेकर घर आता है तब वह कोयला सोने में परिवर्तित हो जाता है। आश्चर्यचकित होकर बूटा उस साधु को खोजने निकल पड़ता है तब उसे पवित्र गुफा मिलती है, जिसके बाद अमरनाथ यात्रा प्रारंभ हो गई।


यह कहानी रोचक तो है लेकिन ऐतिहासिक तथ्यों से मेल नहीं खाती। इतिहास हमें यह बताता है कि बाबा अमरनाथ गुफा की ‘खोज’ किसी ‘बूटा मलिक’ ने नहीं की थी। गुफा तो पहले से ही थी और बाबा अमरनाथ की तीर्थयात्रा भी हजारों वर्षों से होती रही है। इसलिए अमरनाथ गुफा को खोजना कोई ऐसा तथ्य नहीं है जैसा यह कि अमेरिका की खोज कोलंबस ने की थी। क्योंकि एक नहीं बल्कि कई लिखित प्रमाण हैं जो यह बताते हैं कि अमरनाथ यात्रा तीन सौ साल से भी पहले से चली आ रही है।


कश्मीर में हुए राजवंशों का इतिहास कल्हण ने राजतरंगिणी में लिखा है। राजतरंगिणी बारहवीं शताब्दी की रचना है। संस्कृत के विद्वान एस पी पंडित के अनुसार राजतरंगिणी ऐसी रचना है जिसे प्रामाणिक ‘इतिहास’ कहा जा सकता है। राजतरंगिणी की प्रथम तरंग के 267वें श्लोक में अमरनाथ यात्रा का उल्लेख है। ग्रंथ में अन्यत्र भी कल्हण भगवान शिव के अमरनाथ स्वरूप को अमरेश्वर के नाम से संबोधित करते हैं।

 

 
 

कल्हण के बाद आए जोनराज ने राजतरंगिणी की परंपरा को आगे बढ़ाया। जोनराज अपनी राजतरंगिणी में लिखते हैं कि सुल्तान ज़ैनुल अबिदीन ने अमरनाथ तीर्थ की यात्रा की थी। जोनराज के बाद प्रज्ञाभट के राजावलीपताका ग्रंथ में अमरनाथ तीर्थयात्रा का विस्तृत उल्लेख है। मुग़ल बादशाह अकबर द्वारा पूछे जाने पर कश्मीर के गवर्नर युसूफ खान ने अमरनाथ यात्रा के बारे में बताया था। उस जमाने में अमरनाथ यात्रा न केवल लोकप्रिय थी बल्कि हिमलिंग के जमने और पिघलने के बारे में भी लोग जानते थे। अमरनाथ यात्रा शाहजहाँ के जमाने में भी होती थी। पंडितराज कविराज ने शाहजहाँ के ससुर आसिफ खान की प्रशंसा में ‘आसिफ विलास’ नामक पुस्तक लिखी थी। उसमें उन्होंने बाबा अमरनाथ को अमरेश्वर कह उल्लेख किया है।


इसी प्रकार पुराणों में भी बाबा अमरनाथ का उल्लेख आया है। स्कन्द पुराण में भैरव भैरवी संवाद में अमरनाथ यात्रा के फल के बारे में बताया गया है। अमरनाथ माहात्म्य और भृंगी संहिता जैसे ग्रंथों में विस्तार से अमरनाथ गुफा की भौगोलिक परिस्थितियों का वर्णन है। चौथी-पाँचवीं शताब्दी में रचे गए नीलमत पुराण (श्लोक 1321) में भगवान अमरनाथ का उल्लेख मिलता है।


पुराणों में वर्णित कथा के अनुसार एक बार माता पार्वती ने भगवान शिव से अमरत्व का रहस्य पूछा। यह रहस्य बताने के लिए शिव ने ऐसे स्थान का चुनाव किया जहाँ जीवन का अस्तित्व कठिन हो। चूँकि अमरत्व का रहस्य सुनने मात्र से कोई भी जीव अमर हो जाता इसलिए शिव ने समुद्रतल से 3800 मीटर ऊपर ऐसा स्थान चुना जहाँ कोई भी जीव जंतु न रहता हो।


गुफा में जाने से पहले शिव ने सभी परिजनों का त्याग कर दिया। जहाँ नंदी बैल को छोड़ा वह स्थान बैलगाँव कहलाया जिसका अपभ्रंश आज का पहलगाम हो गया। गणेश जी जहाँ रुक गए वह गणेशबल कहलाया। गुफा के भीतर जाने से पहले शिव ने अमरावती नदी को प्रकट किया जो आज नाला बन चुकी है।


जब गुफा में एकांत में शिव पार्वती को अमरत्व का रहस्य बता रहे थे तब माता को नींद आ गई। वह ‘हाँ-हाँ’ कहते हुए सो गईं। उस समय गुफा में शिव पार्वती का संवाद कोई और भी सुन रहा था। भगवान की बातें दो कबूतर सुन रहे थे। उन्होंने माता के मुख से ‘हाँ हाँ’ सुना और वही शब्द दोहराने लगे। इस प्रकार वे भी अमर हो गए। आज भी अमरनाथ तीर्थयात्रा पर जा रहे श्रद्धालुओं को वे पक्षी दिखाई पड़ते हैं।


अमरनाथ तीर्थयात्रा मुगलों के बाद भी जारी रही। औरंगज़ेब के डॉक्टर फ्रांस्वा बर्नियर ने 1663 में गुफा में जमते पिघलते पवित्र हिमलिंग का वर्णन किया है। सन 1840 में विग्ने नामक यात्री ने Travels in Kashmir, Ladkah and Iskardu में लिखा कि सावन महीने के 15वें चन्द्रमा वाले दिन से अमरनाथ यात्रा प्रारंभ होती थी। विग्ने के अनुसार इस पवित्र यात्रा में प्रत्येक जाति पंथ के लोग भाग लेते थे। प्रसिद्ध कश्मीरी विद्वान संसार चंद कौल ने अपनी पुस्तिका में उल्लेख किया है कि 1819 में जब अफ़ग़ान शासन का अंत हुआ तब पंडित हरदास टिकू ने श्रीनगर के रामबाग में छावनी अमरनाथ की स्थापना की जहाँ साधु इकट्ठे होते थे। उनके लिए हरदास टिकू राशन समेत सभी प्रकार की व्यवस्था करते थे।


बाद में सन 1900 में स्टेइन ने भी इस तीर्थयात्रा के बारे में लिखा कि यह बड़ी प्रसिद्ध यात्रा है जिसमें हजारों की संख्या में भारत के कोने कोने से लोग भाग लेते हैं। इस प्रकार हम देखते हैं कि अमरनाथ यात्रा का इतिहास हजारों वर्ष पुराना है। अमरनाथ तीर्थ की यह यात्रा अनवरत चली आ रही है इसमें कोई संदेह नहीं। इतिहास में कोई ऐसा लंबा कालखंड नहीं मिलता जब यह यात्रा रुकी हो। हाँ कुछ वर्षों के लिए इसकी प्रसिद्धि कम हुई होगी अथवा स्थानीय लोग ही जाते रहे होंगे। यह इस तथ्य का भी द्योतक है कि भगवान की ‘खोज’ का कोई श्रेय नहीं ले सकता और न ही किसी को दिया जा सकता है। तीर्थयात्राएँ मानव इतिहास की जननी रही हैं। यात्राओं से ही इतिहास बना है और उसी इतिहास ने मानव सभ्यता में भगवान को स्थापित किया है।