1952-53, जब आज़ाद भारत तिरंगा फहराने वालों पर शेख़ अब्दुल्ला ने चलवायीं थी गोलियाँ #EkVidhanEkNishan
   23-जून-2020

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1950 में भारत में भारत के संविधान में आर्टिकल 370 जोड़ा गया और ये आर्टिकल परिणाम था शेख अब्दुल्ला की विभाजनकारी नीतियों का और नेहरू द्वारा शेख को अंध-समर्थन देने का। 1947 में जब जम्मू कश्मीर भारत में मिल गया और भारत का पूरा संविधान जब वहाँ लागू करने की बात आयी तब शेख अब्दुल्ला ने इसे अपनी कुटिल चालों से रोकने का प्रयत्न किया। शेख की कुनीतियों का विरोध करने के लिए जम्मू कश्मीर में एक आंदोलन शुरू हुआ- प्रजा परिषद् आंदोलन। आर्टिकल 370 की आड़ में जम्मू कश्मीर में दो विधान, दो निशान, दो प्रधान की नीति अपनायी जा रही थी साथ ही ऐसी कई नीतियाँ बनाई जा रही थीं जो देश के संविधान के विरुद्ध थी। ज़रा सोचिये की देश आज़ाद हो गया था, जिस तिरंगे को हाथ में लेकर स्वतंत्रता संग्राम हुआ, उसी तिरंगे को जम्मू कश्मीर में फहराने पर लोगों को गोली मार दी गयी !! प्रजा परिषद् आंदोलन में जम्मू कश्मीर की दमनकारी सरकार ने यह कुकृत्य किया।
 
 
 
शेख अब्दुल्ला ने महाराजा हरिसिंह के ध्वज को हटाकर, नॅशनल कॉन्फ्रेंस के झंडे में थोड़े परिवर्तन कर उसे जम्मू कश्मीर राज्य का झंडा घोषित कर दिया। प्रजा परिषद् ने इसका विरोध किया और जम्मू कश्मीर के नौजवानों ने तिरंगे को फहराना शुरू कर दिया। नेहरू से अभयदान पाए हुए शेख अब्दुल्ला और उसकी सरकार के अत्याचार का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि जम्मू कश्मीर के अलग अलग हिस्सों में 16 नौजवानों को गोलियों से भून दिया गया, क्योंकि उन्होंने अपने ही देश में तिरंगा फहराने का दुस्साहस किया था !!
 
 
 
पहला तिरंगा हत्याकांड हुआ 14 दिसंबर 1952 को, जब छम्ब में मेला राम नमक युवा की पुलिस ने तिरंगा फहराने पर गोली मार कर हत्या कर दी। सरकार विरोधी आंदोलन वहाँ इतना बढ़ गया की अंतिम संस्कार के लिए मेला राम का पार्थिव शरीर जम्मू लाना पड़ा।
 
 
सरकार द्वारा दूसरा हत्याकांड किया गया 11 जनवरी 1953 को कठुआ ज़िले के हीरानगर में। छान मोरियाँ गाँव के बिहारी लाल और गढ़ मुंडियां के भीकम सिंह की तिरंगा फहराने का दुस्साहस करने पर पुलिस ने नृशंस हत्या कर दी। इस गोलीबारी में कई और लोग भी बुरी तरह घायल हुए और एक व्यक्ति ज्ञानचंद संग्रा की आँखों की रौशनी चली गयी। पुलिस की बर्बरता का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि, हत्याकांड के बाद पुलिस दोनों का शव अपने साथ ले गयी, बाद में उनके अधजले शरीर एक सुनसान इलाके से द्वारका नाथ को मिले, जो प्रजा परिषद् आंदोलन में शामिल थे।

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कठुआ ज़िले के हीरानगर में स्थित भीख्म सिंह की स्माधी स्थल
 
 
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 कठुआ ज़िले के हीरानगर में स्थि  बिहारी लाल जी की स्माधी स्थल
 
 
तीसरा हत्याकांड - जोरियाँ हत्याकांड - 30 जनवरी 1953 को अखनूर तहसील से 55 कि मी दूर जोरियाँ कस्बे में तिरंगा फहराने लोग एकत्रित हो गए। राज्य की फ़ोर्स के साथ आयी पुलिस ने पहले आंसू गैस छोड़ी और फिर फायरिंग शुरू कर दी, जिसमें 7 युवा वीरगति को प्राप्त हुए और कई लोग बुरी तरह घायल हो गए। दिवंगत लोगों में नानक चाँद , बसंत राम , बलदेव सिंह राठी , सैन सिंह, वर्यम सिंह और त्रिलोक सिंह प्रग्वाल शामिल थे। लोगों को आतंकित करने के लिए पुलिस ने आस पास के गावों में जाकर लोगो के घर उजाड़ दिए और उनको बेरहमी से पीटा।
 
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जोरियाँ में स्थित अमर शहीद स्मारक
 
 
चौथा हत्याकांड- सुंदरबनी हत्याकांड- यहाँ एक सरकारी इमारत पर तिरंगा फहराने पर तीन लोगों की, जिनके नाम थे , किशन लाल, बाबा रामजी और बेली राम, पुलिस ने गोली मार कर हत्या कर दी।
 

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सुंदरबनी में स्थित किशन लाल, बाबा रामजी और बेली राम की स्माधी स्थल
 
पाँचवाँ हत्याकांड- रामबन हत्याकांड- 1 मार्च 1955 में पुलिस ने एक बार फिर तीन युवाओं, शिब राम, देवी शरण और भगवान दास की तिरंगा फहराने का दुस्साहस करने पर हत्या कर दी।
 

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रामबन में स्थित शिब राम, देवी शरण और भगवान दास की स्माधी स्थल
 
 
इन सभी वीरगति को प्राप्त बलिदानियों की स्मृति में इन स्थानों पर स्मारक बने हुए हैं
 
 
आज से सत्तर साल पहले देश की अखंडता और सम्प्रभुता के लिए और शेख अब्दुल्ला की विभाजन कारी नीतियों के विरुद्ध जो प्रजा परिषद् आंदोलन शुरू हुआ जिसमें कई लोगों की जाने गयीं, जिनकी याद में ये स्मारक बने हैं, उनकी आत्मा को शांति अब मिली होगी जब आर्टिकल 370 में संशोधन किया गया और आर्टिकल 35 A हटाया गया, इसका सारा श्रेय जाता है, प्रजा परिषद् आंदोलन के जनक श्यामा प्रसाद मुखर्जी और पंडित प्रेमनाथ डोगरा को। देश में 'एक निशान, एक विधान , एक प्रधान ' का नारा बुलंद कर जनजागृति फ़ैलाने वाले श्यामा प्रसाद मुखर्जी की पुण्यतिथि के अवसर पर हम सभी दिवंगतों को नमन करते हैं।