10 सितंबर 1965 का दिन भारत और पाकिस्ताुन के युद्ध इतिहास का बेहद खास दिन है। क्योंकि ठीक 55 साल आज ही के दिन भारतीय सेना ने “असल उत्तर” की लड़ाई में पाकिस्तानी सेना की साजिश को नाकाम करते हुये पाकिस्तान को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया था। भारत-पाकिस्तान बॉर्डर पर पंजाब राज्य में एक जगह है 'असल उत्तर'। यहां के मैदान में आज से ठीक 55 साल पहले 8 सितंबर, 1965 के दिन असल उत्तर की लड़ाई शुरू हुई थी। जो तीन दिनों तक चली थी और 10 सितंबर 1965 के दिन पाकिस्तान की पराजय के साथ खत्म हुई थी। हालांकि इस युद्ध में कई वीर शहीद जवानों ने अदम्य साहस और वीरता का परिचय दिया था। लेकिन इस युद्ध के नायक हवलदार अब्दुल हमीद ने अपनी सूझबूझ से अकेले 7 पाकिस्तानी पैटन टैंक को उड़ा दिया था। उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले के धामूपुर गांव में 1 जुलाई 1933 को एक साधारण परिवार में जन्मे अब्दुल हमीद ने 27 दिसंबर 1954 को भारतीय सेना के ग्रेनेडियर रेजीमेंट में भर्ती हुये थे। जिसके बाद उनकी तैनाती 4 ग्रेनेडियर बटालियन में कर दी गई थी।
1965 भारत-पाकिस्तान युद्ध
1965 के दौरान भारतीय सेना की टुकड़ियों को नियमित तौर पर देश में एक सेक्टर से दूसरे में भेजा जा रहा था। इन सभी कार्यक्रमों की रूपरेखा आर्मी हेडक्वार्टर में 'स्टाफ सेवा' निदेशालय द्वारा तय की जाती थी और इसकी खबर टुकड़ियों के स्थानांतरण से छह से आठ महीने पहले ही दे दी जाती थी। भारत-पाकिस्तान युद्ध 1 सितंबर, 1965 को शुरू हो चुका था। इस बात के मद्देनजर ग्रेनेडियर्स रेजीमेंट की चौथी बटालियन (4 ग्रेनेडियर्स) के सामने बड़ी गंभीर समस्या खड़ी थी। क्योंकि उनके कई महत्त्वपूर्ण ऑफिसर्स पहले से निर्धारित भारत-तिब्बत बॉर्डर की ओर स्थानांतरण की प्रक्रिया के सिलसिले में बाहर गये हुये थे। पहाड़ी घटक का हिस्सा होने के नाते बटालियन 106 एम.एम. की (आर.सी.एल.) शस्त्र के लिए अधिकृत नहीं थे, उनकी इस हथियार की ट्रेनिंग भी ना के बराबर हुई थी। इन सब परेशानियों के बावजूद कच्छ के रण में पाकिस्तान की आक्रामक कारवाई की शुरुआत से सेना के रणनीतिकारों को आनेवाले संकट की चेतावनी मिल चुकी थी। इस वजह से 4 ग्रेनेडियर्स को पंजाब में कुछ आर.सी.एल. गन देकर किसी भी भावी परिस्थिति का डटकर सामना करने के लिए तैनात किया गया था। हालांकि भारतीय तोपों के गोले दागने की स्पीड 530 मीटर प्रति सेकंड की थी, जो पाकिस्तानी एम 48-ए-5 टैंकों पर मौजूद 105 मिलीमीटर वाली तोपों की गोले दागने की 1,000 मीटर प्रति सेकंड की स्पीड के मुकाबले बहुत कम थी। वहीं इन तोपों को जीपो पर लगाया गया था, जो कि टैंकों का सामना करने के लिए काफी नहीं थे। साथ ही बटालियन के सामने सबसे बड़ी मुश्किल यह थी कि पिछले तीन सालों में इन हथियारों के इस्तेमाल की ट्रेनिंग ना के बराबर हुई थी। इसके बावजूद बटालियन के पास कुछ नॉन-कमीशंड ऑफिसर थे, जिनके पास इन्फैट्री स्कूल में या तो प्रशिक्षक या प्रशिक्षु के तौर पर इन हथियारों के इस्तेमाल का कुछ अनुभव था, कंपनी क्वार्टर मास्टर हवलदार अब्दुल हमीद भी उनमें से एक थे। अब्दुल हमीद कंपनी पार्टर मास्टर हवलदार के पद पर थे। जब पाकिस्तान के ऑपरेशन ग्रैंड स्लैम' की शुरुआत हुई थी। इस बटालियन को इच्छोगिल नहर के पास की निगरानी का जिम्मा सौंपा गया था। पाकिस्तानी हमले की खुफिया जानकारी पर 7-8 सितंबर की रात यह टुकड़ी पंजाब के खेमकरन सेक्टर की ओर बढ़ी। 8 सितंबर को पाकिस्तान की 1 आर्मर्ड और 11 आर्मर्ड डिविजन ने अंतरराष्ट्रीय सीमा पार करते हुये भारतीय कस्बे खेमकरन पर कब्जा कर लिया था। जिसके बाद भारतीय सेना की 4 डिविजन के जीओसी मेजर जनरल गुरबख्श सिंह ने तुरंत भारतीय सेना को पीछे हटने और असल उत्तर के पास दुश्मन को जवाब देने का आदेश दिया। युद्ध की रणनीति के मुताबिक भारतीय सेना ने घोड़े की नाल के आकार का एक फंदा तैयार करके भारतीय टैंक और जवान असल उत्तर के पास गन्ने के खेतों में इस आकार में मोर्चा जमाकर बैठ गये, जैसे की घोड़े की नाल होती है। उस वक्त पाकिस्तान तकनीकी रूप से मजबूत स्थिति में था उसके पास तीसरी पीढ़ी के अमेरिकी पैटन टैंक थे, जिन्हें अजेय समझा जाता था। वहीं भारत के पास इन पैटन टैंकों का मुकाबला करने के लिए सिर्फ सेंचुरियन टैंक थे। जो ना तो मजबूत थे और ना ही ज्यादा दूरी तक मार कर सकते थे। इसलिए यह जरूरी था कि भारतीय सेना पाकिस्तान से मुकाबले करने के लिए युद्ध की अच्छी रणनीति के साथ साम, दाम, दंड और भेद का इस्तेमाल करें। रणनीति के तहत भारतीय सेना असल उत्तर के पास बहने वाले नालों को तोड़कर उसका पानी खुले मैदान में बहा दिया। जिसके बाद असल उत्तर का मैदान दलदल जैसा हो गया था। जहां पर पाकिस्तानी टैंकों को रास्ता बनाने में काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा था। टैंकों को बर्बाद कर देने वाली माइंस और दलदल ने पाकिस्तानी टैंकों की रफ्तार पर ब्रेक लगा दिया था।

पानी में फंसे पाकिस्तानी टैंक
वहीं गन्ने के खेतों में मोर्चा संभाले भारतीय सैनिक दुश्मनों का इंतजार कर रहे थे। 8 सितंबर की सुबह पाकिस्तान अपने टैंकों के साथ असल उत्तर की तरफ बढ़ने लगा। पाकिस्तान का प्लान था कि वह ग्रांट ट्रंक रोड पर कब्जा करके अमृतसर पर भी अपना कब्जा जमा ले। लेकिन भारतीय सेना की रणनीति के मुताबिक दलदल ने पाकिस्तानी टैंकों की रफ्तार कम कर दी थी। 8 सितंबर सुबह दुश्मन के टैंकों की गड़गड़ाहट सुनाई दी। इन टैंकों की दिशा उन्हीं गने के खेतों की ओर थी, जहाँ ग्रेनेडियर्स बटालियन छुपी हुई थी। ग्रेनेडियर्स खामोशी से उन टैंकों के अपने और नजदीक आने का इंतजार कर रहे थे। अचूक निशाने के लिए जरूरी था कि टैंकों पर बेहद नजदीक से वार किया जाये,वरना हथियार और उन्हें चलाने वाले दोनों ही खतरे में पड़ सकते थे। लेकिन यह तय था कि अगर इन टैंकभेदी तोपों का सही से इस्तेमाल किया जाए तो टैंकों के जत्थे में भारी हड़बड़ी फैलाई जा सकती थी। पाकिस्तानी जत्थे के आगे का टैंक जो सिर्फ 50-60 गज की दूरी पर ही था। तभी हवलदार अब्दुल हमीद ने अपनी टैंक रोधी तोप से हमला बोल दिया और टैंक को उड़ा दिया। वहीं पीछे आ रहे दो टैंकों पर सवार सैनिक पहले टैंक का ऐसा बुरा हाल देखकर डरकर अपने टैंक छोड़कर भाग खड़े हुये। करीब दो घंटे बाद पाकिस्तानी सेना खुद संभालते हुये फिर आगे बढ़ी। लेकिन अब्दुल हमीद ने एक और टैंक को धराशायी कर दिया और फिर से पिछले दोनों टैंकों के सवार टैंक छोड़कर अपनी जान बचाते हुये वापस भाग निकले। अब तक अब्दुल हमीद दो पैटन टैंकों को ध्वस्त कर चुके थे और दुश्मन चार अन्य टैंकों को पीछे छोड़कर भाग चुका थे। इतनी देर में भारतीय सेना के जवान टकों के रास्ते में कुछ बारूदी सुरंगें भी बिछा दिये थे। 9 सितंबर, 1965 की सुबह 9 बजे पाकिस्तानी एयरफोर्स के चार सेवरजेट विमानों ने ग्रेनेडियर्स के ठिकानों पर हवाई हमला किया और 9.30 बजे दुश्मन की जमीनी टुकड़ी ने अगला हमला बोला। अपने हमले को जारी रखते हुए पाकिस्तानी फौज ने पहले 11.30 और फिर 14.30 बजे दो बार धावा बोला। अब्दुल हमीद ने दुश्मन के दो और टैंकों को उड़ा दिया और कुछ टैंक बारूदी सुरंगों की चपेट में आकर उड़ गये थे। 9 सितंबर को शाम तक अब्दुल हमीद चार पैटन टैंकों को ध्वस्त कर चुके थे, जबकि बटालियन कुल तेरह टैंकों को उड़ा चुकी थी और कुछ टैंक बारूदी सुरंगों के बीच ही उड़ गये थे। 10 सितंबर की सुबह 8.30 बजे टैंकों के अगले जत्थे ने भयानक गोलाबारी करते हुये बटालियन पर फिर हमला बोला। जिसके बाद अब्दुल हमीद ने फिर अपनी आर.सी.एल. गन का मुंह खोला और अपना ठिकाना बदलते हुये एक और टैंक को उड़ा डाला। दुश्मन ने और ज्यादा गोलाबारी करते हुये फिर से हमला बोला। आर.सी.एल. गन खुली हुई बिना छत की जीपों पर लगी हुई थी, इसलिए गोलियों की चपेट में आने का खतरा ज्यादा था। इसी खतरे के मद्देनजर अब्दुल हमीद ने अपनी सुऱक्षा में लगे सैनिकों को अपनी सुरक्षा से हटाते हुए उन्हें दूसरे ठिकाने पर ले जाने की कोशिश की। इस वजह से अब्दुल हमीद और दुश्मन का टैंक एक-दूसरे के ठीक सामने आ गये। पाकिस्तानी टैंक और अब्दुल हमीद की आर.सी.एल. का गोला एक साथ एक-दूसरे के ऊपर गिरा। जिससे पाकिस्तानी टैंक बर्बाद हो गया। लेकिन पाकिस्तानी गोले का शिकार होने की वजह से अब्दुल हमीद भी शहीद हो गये। 10 सितंबर, 1965 की तारीख 4 ग्रेनेडियर्स के लिए बहुत महत्वपूर्ण थी वीर अब्दुल हमीद की शहादत के अतिरिक्त एक अन्य महत्वपूर्ण घटना उसी तारीख में हुई थी। सुबह 11 बजे के करीब पाकिस्तानी सेना की पहली आर्मर डिवीजन के जनरल कमांडिंग ऑफिसर मेजर जनरल नासिर अहमद के नेतृत्व में उनका सर्वेक्षक दस्ता (आर. ग्रुप) स्थिति का जायजा लेने के लिए खेमकरन-भिखीविंड रोड पर 37 मील के क्षेत्र में आ पहुँचा था। 4 ग्रेनेडियर्स ने उनके करीब आते ही सटीक फायरिंग से उनके दस्ते को बुरी तरह से नष्ट कर दिया। हालांकि बचकर भागते हुये पाकिस्तानी सैनिक अपने जनरल कमांडिंग ऑफिसर के शव को साथ ले जाने में सफल हुये थे। लेकिन फिर भी उस दस्ते के जवानों की तमाम लाशें उसी जगह छूट गई थी। पाकिस्तान की पहली आर्मर डिवीजन की आर्टिलरी ब्रिगेड के कमांडर ब्रिगेडियर ए.आर. शम्मी समेत तमाम अन्य ऑफिसरों की लाशें भी वहाँ पड़ी थीं, जिन्हें बाद में दफना दिया गया था।
खेमकरण में पाकिस्तानी हमला 11 सितंबर को रूक गया था। इसी के साथ पाकिस्तान की सारी रणनीति नाकाम हो गई और पाकिस्तान को पराजय मिली। युद्ध विराम के बाद सेना ने पाकिस्तानी टैंकों को एक जगह इकट्ठा करने के लिए उन्हें टो करके भिकीविंड ले गये थे। बाद में भिकीविंड का नाम पैटन नगर पड़ा था। इस जगह को पैटन टैंकों की दुनिया में सबसे बड़ी कब्रगाह भी कहा जाता है।

भिकीविंड पैटन नगर में पाकिस्तानी टैंकों के साथ राष्ट्रपति राधाकृष्णन
पाकिस्तानी अधिकारियों के कब्जे से बरामद कागजात से यह साबित हुआ कि दुश्मन का इरादा फर्स्ट आर्मर डिवीजन और पैटन टैंक की पाँच रेजीमेंट 4 कैविलरी, 5 हॉर्स, 5 लैंसर्स, 19 लैंसर्स, 24 कैविलरी और 1 शैफी टैंक रेजीमेंट 12 कैविलरी रेजीमेंट्स के साथ भारतीय क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ते हुये हरिके पुल और फिर अमृतसर तक कब्जा कर लेने का था। पाकिस्तान की 24 कैविलरी के मेजर जॉन हैमिल्टन गार्डनर की डायरी भी एक टैंक से बरामद हुई थी। लेकिन पाकिस्तानी साजिश को 4 ग्रेनेडियर्स ने नाकाम कर दिया था। जिसमें सबसे बड़ी भूमिका हवलदार अब्दुल हमीद की थी। दुश्मन का सामना करते हुये असाधारण पराक्रम और बहादुरी का प्रदर्शन करने के लिए अब्दुल हमीद को मरणोपरांत 'परम वीर चक्र से सम्मानित किया गया गया था।
वीर अब्दुल हमीद का परिचय
वीर अब्दुल हमीद का जन्म उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले के धामूपुर गांव में 1 जुलाई 1933 में हुआ था। उनके पिता दर्जी थे, इसलिए फौज में भर्ती होने से पहले उन्हों ने भी इसी काम से अपना गुजारा किया था। 27 दिसंबर 1954 को हामिद भारतीय सेना के ग्रेनेडियर रेजीमेंट में भर्ती हुये थे। इसके बाद उनकी तैनाती 4 ग्रेनेडियर बटालियन में कर दी गई। उन्होंने अपनी इस बटालियन के साथ आगरा, अमृतसर, जम्मू-कश्मीर, दिल्ली, नेफा और रामगढ़ में अपनी सेना दी थी। हामिद चीन के साथ हुये युद्ध के दौरान 7वीं इंफेंट्री ब्रिगेड का हिस्सा थे। इस ब्रिगेड ने ब्रिगेडियर जॉन दलवी के नेतृत्व में नमका-छू के युद्ध में चीन की सेना से लड़ाई लड़ी थी।