J&K में राष्ट्रविरोधी गतिविधियों में शामिल सरकारी कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई की कवायद जारी, प्रोफेसर समेत 3 सरकारी कर्मचारी बर्ख़ास्त
    04-मई-2021

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फोटो में बर्खास्त असिस्टेंट प्रोफेसर अब्दुल बारी नाइक

  जम्मू-कश्मीर में राष्ट्रविरोधी गतिविधियों में शामिल सरकारी कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई का सिलसिला जारी है। उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने राज्य-विरोधी गतिविधियों के आरोपों में एक असिस्टेंट प्रोफेसर समेत तीन सरकारी कर्मचारियों को नौकरी से हटाने का आदेश दिया है। जम्मू-कश्मीर प्रशासन के अलग-अलग आदेशों के तहत उधमपुर गवर्नमेंट डिग्री कॉलेज के असिस्टेंट प्रोफेसर अब्दुल बारी नाइक, पुलवामा के तहसीलदार नजीर अहमद वानी और कुपवाड़ा के करालपोरा स्थित सरकारी मिडिल स्कूल के अध्यापक इद्रीस जान को तत्काल प्रभाव से बर्खास्त किया गया है। जम्मू-कश्मीर सामान्य प्रशासन विभाग के आदेश में कहा गया कि उपराज्यपाल ने तीनों व्यक्तियों के खिलाफ आरोपों के तथ्यों को जांचने के बाद उन्हें बर्खास्त करने का फैसला किया है। अधिकारियों के मुताबिक तीनों कर्मचारियों के खिलाफ अलग-अलग केस दर्ज हैं और उन्हें हिरासत में रखा गया है। इनके खिलाफ संविधान के अनुच्छेद-311 के खंड(2) के तहत यह फैसला लिया गया है।


बता दें कि कुलगाम के रहने वाले अब्दुल बारी नाइक को मार्च में उधमपुर में उनके किराए के मकान से गिरफ्तार किया गया था। अब्दुल बारी नाइक की गिरफ्तारी से 15 दिन पहले ही वहां पोस्टिंग हुई थी। उन्हें युवाओं को मिलिटेंसी को लेकर भड़काने के आरोप में गिरफ्तार किया गया गया था। वहीं कुपवाड़ा जिले के सरकारी सरकारी टीचर इद्रीस जान के खिलाफ भी दो एफआईआर दर्ज हैं। उनके खिलाफ 2010 और 2016 के में हिंसा भड़काने का आरोप है। उन्हें जन सुरक्षा कानून  के तहत चार महीने के लिए जेल में रखा गया है।
 
 
 
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महबूबा मुफ्ती ने बर्खास्तगी का किया विरोध
 
 

जानकारी के मुताबिक इदरीस जान बर्खास्त किए जाने वाले पहले कर्मचारी है। उन्हें 30 अप्रैल को बर्खास्त किया गया था। उससे पहले प्रशासन ने एक समिति बनाई थी जिसे सरकारी कर्मचारियों पर लगे राज्य-विरोधी गतिविधियों के आरोपों की जांच करने एवं दोषी पाए जाने पर उनकी बर्खास्तगी की सिफारिश करने का अधिकार दिया था। जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री और पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) की प्रमुख महबूबा मुफ्ती ने इद्रीस जान की बर्खास्तगी की आलोचना की और उन्होंने जम्मू कश्मीर सरकार के सामान्य प्रशासन विभाग के तीन दिन पुराने पत्र को भी पोस्ट किया है।
 

महबूबा मुफ्ती ने ट्वीट करते हुए लिखा है कि महामारी के बीच में भारत सरकार को कश्मीर में मामूली आधारों पर सरकारी कर्मचारियों को बर्खास्त करने के बजाय लोगों की जान बचाने पर ध्यान देना चाहिए। इसमें कोई आश्चर्य नहीं है कि उनकी गलत प्राथमिकताओं ने भारत को श्मशान घाट और कब्रिस्तान में बदल दिया है। जीवित व्यक्ति परेशान होता जा रहा है और मृत व्यक्ति को गरिमा से वंचित रखा जाता है।
 



गौरतलब है कि बीते 21 अप्रैल को जम्मू कश्मीर प्रदेश सरकार ने राष्ट्रविरोधी गतिविधियों में शामिल विभिन्न सरकारी विभागों में बैठ देश की एकता, अखंडता, सुरक्षा के खिलाफ काम करने वाले तत्वों को चिन्हित करने, उनसे संबंधित मामलों की जांच और उन्हें सेवामुक्त करने के लिए 5 सदस्यीय विशेष कार्यबल (एसटीएफ) का गठन किया था। अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक सीआईडी को इसका प्रमुख बनाया गया है एसटीएफ की सिफारिशों के आधार पर मुख्य सचिव की अध्यक्षता वाली समिति को राष्ट्रविरोधी तत्वों की संविधान की धारा 311 के तहत बिना किसी सुनवाई की सेवाएं समाप्त करने का अधिकार है। उच्च पदस्थ सूत्रों के मुताबिक जम्मू कश्मीर में सीआईडी ने ऐसे 500 के करीब अधिकारियों, कर्मचारियों की सूची बनाई है, जिनके खिलाफ देश विरोधी गतिविधियों में शामिल होने के पक्के सबूत हैं। उन्होंने बताया कि 21 अप्रैल 2021 को एसटीएफ के गठन से पूर्व प्रदेश सरकार ने 30 जुलाई 2020 इन तत्वों के खिलाफ कठोर कार्रवाई का संकेत देते हुए मुख्य सचिव की अध्यक्षता में समिति बनाई थी। इसके अलावा 2019 में केंद्र सरकार के निर्देशानुसार टेरर मानिटरिंग ग्रुप (टीएमजी) का गठन किया था। टीएमजी को सरकारी तंत्र में बैठे आतंकियों व अलगाववादियों के समर्थकों, उनके लिए काम करने वाले तत्वों की गतिविधियों और पृष्ठभूमि का पूरा ब्यौरा जमा करने का जिम्मा सौंपा गया था।