7 जून 1994 : भद्रवाह में पनपते आतंक के विरुद्ध आम लोगों में आन्दोलन खड़ा करने वाले वीर सपूत रुचिर कुमार कौल को नमन
   07-जून-2022

Ruchir Kumar Kaul
 
 
जम्मू कश्मीर के जम्मू में आतंकवादियों को अपनी जड़ें जमानी थीं और साथ ही वहाँ बसे हिन्दुओं को डरा कर भगाना भी था। इसके लिए उन्हें डोडा ज़िले का भद्रवाह उपयुक्त लगा क्योंकि यहाँ के लोग राष्ट्रवादी थे और आतंकवादियों ने सोचा कि यदि इन राष्ट्रवादियों को उखाड़ फेंक दिया जाए तो बाकी जगहों से आतंक और अलगाववाद का ज़्यादा विरोध नहीं होगा ।
 
 
इसकी शुरुआत उन्होंने 15 अगस्त 1992 को बेक़सूर लोगों पर ग्रेनेड से हमला और गोलियों की बौछार से की। धीरे-धीरे इस तरह की घटनाएँ बढ़ने लगीं और लोगों में आतंक फैलने लगा। आतंकवादियों के बढ़ते दुस्साहस का सामना करने के लिए रुचिर कुमार कौल आगे आये। 4 जुलाई 1958 को जन्मे रुचिर कुमार बचपन से ही आरएसएस से जुड़े थे।
 
41 दिनों तक चलता रहा जन-आंदोलन
 
उन्होंने आम नागरिकों में इतनी हिम्मत पैदा कर दी कि वे तलवार और कुल्हाड़ों से भी आतंकवादियों का सामना करने को तैयार थे। आतंकवाद की बढ़ती घटनाओं की ओर राज्य और केंद्र सरकार का ध्यान आकर्षित करने के लिए रुचिर कुमार ने एक जन-आंदोलन शुरू किया जो 41 दिनों तक चलता रहा।
 
दुकानदार भी हड़ताल में शामिल हो गए और सरकारी कर्मचारी 28 दिनों तक काम पर नहीं गए। फलस्वरूप स्कूल, कॉलेज, बैंक, पोस्ट ऑफिस आदि लगातार बंद रहे। आतंकवादियों को पता चल गया कि उनके नापाक मंसूबों पर पानी फेरने वाले रुचिर कुमार हैं और अब वे आतंकवादियों की हिट-लिस्ट में आ गए। आतंकियों द्वारा कई बार रुचिर कुमार की हत्या की कोशिश की गयी, लेकिन हर बार नाकाम रहे।
 
 7 जून 1994 को आतंकियों ने घात लगाकर रुचिर कुमार पर किया हमला 
 
लेकिन अंततः 7 जून 1994 को जब रुचिर कुमार अपने घर के पास, खेत में काम कर रहे थे आतंकवादियों ने उन पर घात लगाकर हमला किया और गोलियां बरसाकर उनकी हत्या कर दी । अपने देश को समर्पित रुचिर कुमार वीरगति को प्राप्त हुए । आरएसएस के जिला कार्यवाह बन चुके रूचि कुमार की जब हत्या की गयी तब वे बीजेपी के मंडल प्रधान थे ।
 
लोगों के लिए सदैव प्रेरणा स्रोत रहेंगे रुचिर कुमार 
 
उनका जीवन हमेशा लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत रहेगा क्योंकि बिना किसी सहायता के उन्होंने आम लोगों को आतंकवादियों का सामना करना सिखाया और डोडा ज़िले में आतंकवाद को पनपने नहीं दिया। करीब ३ दशक बाद भी रुचिर कौल स्थानीय लोगों में आतंक का मुकाबला करने के साहस का स्रोत बने हुए हैं, ऐसी हुतात्मा को हमारा कोटि कोटि नमन।