डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार जी को अधिकांश लोग मातृभूमि की आराधना करने और भारत की सुरक्षा तथा मान के लिए अपना सर्वस्व जीवन समर्पित करने, विख्यात संगठन 'राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ' (RSS) के संस्थापक और कुशल संगठनकर्ता के रूप में तो जानते हैं। किन्तु वह एक उद्भट क्रांतिकारी ,स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, ओजस्वी वक्ता और विचारक भी थे। ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के दौरान हेडगेवार जी को देश द्रोह के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया था। जज ने हेडगेवार जी को 1 साल कैद की सजा सुनाई थी। जिसके बाद हेडगेवार जी ने एक वर्ष की सजा काटकर 12 जुलाई 1922 को कारावास से बाहर आए। लिहाजा कल यानी 12 जुलाई को नागपुर में डॉ. हेडगेवार कारावास मुक्ति स्मरण दिवस कार्यक्रम के रूप में मनाया जाएगा।
दरअसल इस तथ्य से बहुत कम लोग परिचित हैं। नागपुर के एक गरीब ब्राह्मण परिवार में 1 अप्रैल 1889 को जन्मे डॉ. हेडगेवार जी बचपन से ही क्रांतिकारी प्रवृति के थे और उन्हें भारत में अंग्रेजों के शासन से बहुत घृणा थी। उनके पिता का नाम पं. बलीराम पंत हेडगेवार था और माता का नाम रेवतीबाई था। उनका का बचपन बड़े लाड-प्यार से बीता। उनके दो बड़े भाई भी थे, जिनका नाम महादेव और सीताराम था। केशव राव बलीराम जी के मानस-पटल पर बाल्यकाल से ही क्रान्तिकारी विचारों का प्रभाव था।
“यूनियन जैक” फहरता देख आत्मसम्मान होता था आहत
उनकी जीवनी के लेखक पालकर लिखते हैं कि नागपुर के सीताबर्डी किले पर ब्रिटिश शासन का प्रतीक “यूनियन जैक” फहरता देख बालक हेडगेवार और उनके दोस्तों का आत्मसम्मान आहत होता था। हेडगेवार जी और उनके मित्रों ने योजना बनाई कि अगर यूनियन जैक को हटाकर वहां भगवा ध्वज फहरा दिया जाए तो किला फतह हो जाएगा। उन सबने तय किया कि पाठशाला से किले तक एक सुरंग बनायी जाएगी और उसके रास्ते अंदर घुसकर ब्रिटिश झंडा हटा दिया जाएगा। योजना के अनुरूप पढ़ाई के कमरे से कुदाल-फावड़े द्वारा सुरंग खोदने का काम शुरू कर दिया गया, किन्तु इसी बीच अपने अध्यापक नानाजी वझे द्वारा एक दिन रेंज हाथों पकड़ लिए गए। उनके शिक्षक नानाजी वझे ने उन्हे दंडित करने के बजाय समझाकर छोड़ दिया किन्तु मन ही मन अपने शिष्यों के अंदर पल रहे देशभक्ति की भावना देखकर बहुत खुश हुए।
1910 में सुप्रसिद्ध क्रांतिकारी संस्था अनुशीलन समिति से जुड़े
हेडगेवार जी 1910 में डॉक्टरी पढ़ने के लिये कोलकाता गये तो उन्होंने वहां देश की एक सुप्रसिद्ध क्रांतिकारी संस्था “अनुशीलन समिति” से जुड़ गये। कलकत्ता मेडिकल कॉलेज से प्रथम श्रेणी में डॉक्टरी की परीक्षा उत्तीर्ण करके 1915 में कोलकाता से जब वह नागपुर लौटे तो वह कांग्रेस के साथ स्वाधीनता आंदोलन में सक्रिय हो गये और कुछ समय में ही कांग्रेस के विदर्भ प्रांतीय सचिव बन गये। 1920 में जब नागपुर में कांग्रेस का राष्ट्रीय अधिवेशन हुआ तो उन्होंने कांग्रेस में पहली बार पूर्ण स्वतंत्रता को लक्ष्य बनाने के बारे में प्रस्ताव प्रस्तुत किया जो पारित नहीं हो सका।
ब्रिटिश औपनिवेशिक सरकार ने देशद्रोह के आरोप में किया गिरफ्तार
1921 में कांग्रेस के असहयोग आन्दोलन में सत्याग्रह के दौरान मई 1921 में उनके द्वारा कटोल तथा भरतवाड़ा में दिए गए आक्रामक भाषणों के लिए उन्हे ब्रिटिश औपनिवेशिक सरकार ने ‘देशद्रोह’ का आरोप लगाकर गिरफ्तार कर लिया, उन्हें एक वर्ष की जेल हुई। जुलाई 1922 में जब उनकी कारावास से मुक्ति हुई तो उक्त अवसर पर उनके स्वागत के लिए आयोजित सभा को मोतीलाल नेहरू और हकीम अजमल खां जैसे कांग्रेस के दिग्गज नेताओं ने संबोधित किया था।
विस्तृत विवेचना
मई 1921 में डॉ हेडगेवार जी द्वारा कटोल तथा भरतवाड़ा में दिए गए आक्रामक भाषणों के कारण ब्रिटिश औपनिवेशिक सरकार द्वारा उन पर ‘देशद्रोह’ का आरोप लगाकर गिरफ्तार कर लिया गया। 14 जून, 1921 को अदालत में इस मामले की सुनवाई शुरू हुई और इस मामले को स्मेली नाम के एक ब्रिटिश जज देख रहे थे। कुछ दिनों की सुनवाई के बाद डॉ. हेडगेवार ने इस अवसर का उपयोग राष्ट्र के जागरण के लिए करने का विचार किया और उन्होंने अपनी पैरवी खुद करने का निर्णय लिया।
उन्होंने 5 अगस्त, 1921 के दिन अपना लिखित वक्तव्य पढ़ा, जिसमें कहा गया था —
1 : मुझ पर यह आरोप है कि मेरे भाषणों ने भारतीयों के मस्तिष्क में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध असंतोष, घृणा तथा राष्ट्रद्रोह की भावना भर दी है तथा भारतीय एवं यूरोपियन लोगों के बीच दुश्मनी का बीज बो दिया है और मुझसे इसका उत्तर माँगा गया है। मैं इसे अपने महान् देश का अपमान समझता हूँ कि एक विदेशी सरकार यहाँ के एक स्थानीय नागरिक (भारतीय) से कुछ पूछताछ करे और उसका न्याय करने के लिए बैठे।
2 : मैं यह नहीं मानता कि आज भारत में कोई विधिसम्मत सरकार है। अगर कोई ऐसा दावा करता है तो यह आश्चर्य का विषय है। आज जो भी सरकार है, वह एक छीनी हुई सत्ता है, जिसमें से एक दमनकारी शासन शक्ति निकलकर आती है। आज जो कानून और अदालतें हैं, वे इस अनधिकृत शासन द्वारा बनाए गए कृत्रिम साधन हैं। दुनिया के किसी भी हिस्से में, लोगों की चुनी हुई सरकार होती है, जो लोगों के लिए बनती है और यही सरकार कानूनों का निर्वाह भी कर सकती है। शासन के अन्य सभी प्रकार केवल धोखा मात्र हैं, जो धोखेबाज छीना-झपटी करने वाले लोगों ने असहाय देशों को लूटने के लिए अपनाए हैं।
3 : मैंने जो करने का यत्न किया, वह इतना भर था कि मैं अपने देशवासियों के हृदयों में अपनी मातृभूमि के प्रति श्रद्धा का भाव जगा सकूँ, जो आज मैं समझता हूँ कि शोचनीय स्थिति में है। मैं लोगों के मस्तिष्क में विश्वास डालने की कोशिश कर रहा हूँ कि भारत भारतवासियों के लिए है। अगर कोई भारतीय, जो अपने देश के लिए और राष्ट्रभाव को फैलाने के उद्देश्य से कुछ बोल रहा है, को देशद्रोही कहा जाए और अगर वह बिना भारतीय और यूरोपीय लोगों में दुश्मनी बढ़ाने के सत्य न बोल पाए तो यूरोपीय तथा वे लोग, जो स्वयं को भारत सरकार मानते हैं, उनके लिए मैं कहना चाहूँगा कि वे यह समझ लें कि वह दिन अब दूर नहीं, जब सभी विदेशियों को मजबूर होकर भारत छोड़ना पड़ेगा।
4 : मेरे भाषण का सरकार द्वारा दिया गया संस्करण न तो सच्चा है और न ही पूर्ण। कुछ इधर-उधर के शब्दों तथा बेतुके वाक्यों को मेरे विरुद्ध खड़ा कर दिया गया है, परंतु मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। ब्रिटिश और यूरोपीय लोगों से व्यवहार करते हुए मैंने केवल मूल सिद्धांतों को मस्तिष्क में रखा है, जिनसे दो देशों के बीच के संबंध चलते हैं। जो भी मैंने कहा, वह इस विचार को दृढ़ करने के लिए कहा कि यह देश भारतीयों का है और हमें हमारी स्वतंत्रता की प्राप्ति अत्यावश्यक है। मैं अपने कहे गए प्रत्येक शब्द के लिए जिम्मेदारी लेने के लिए तैयार हूँ।
हालाँकि मेरे ऊपर लगाए गए आरोपों के प्रति मैं और कुछ नहीं कहना चाहता, परंतु मैं अपने भाषण में कहे गए प्रत्येक शब्द के औचित्य को बताने के लिए तैयार हूँ और मैं घोषणा करता हूँ कि जो कुछ भी मैंने कहा, वह न्यायपूर्ण है। जज ने उनका बयान सुनकर आश्चर्य से कहा, “इनका अपने बचाव का वक्तव्य तो इनके मूल भाषण से भी अधिक देशद्रोही है।” इस वक्तव्य पाठन के समय अदालत द्वेष और घृणा भरी थी। इस बयान के बाद डॉ. हेडगेवार ने एक छोटा सा संबोधन किया।
“भारत भारतीयों का है इसलिए हम स्वतंत्रता की माँग करते हैं''- हेडगेवार
उन्होंने कहा, “भारत भारतीयों का है। इसलिए हम स्वतंत्रता की माँग करते हैं। मेरे सभी भाषणों का सार केवल यही है। लोगों को बताना पड़ेगा कि स्वतंत्रता कैसे प्राप्त करनी है और यह भी कि जब यह मिल जाए तो आगे हमारा व्यवहार कैसा होना चाहिए। नहीं तो यह काफी संभव है कि आजाद भारत में लोग ब्रिटिश लोगों की नकल करने लगेंगे। हालाँकि अंग्रेज अन्य देशों पर आक्रमण कर रहे हैं और दमनकारी कृत्यों के माध्यम से उन पर शासन कर रहे हैं, परंतु जब उनकी अपने देश की स्वतंत्रता पर कोई खतरा पैदा होता है तो वे खून बहाने के लिए भी तैयार हो जाते हैं।
हाल ही के युद्ध में यह साबित हो चुका है। इसलिए यह हमारा कर्तव्य बन जाता है कि हम अपने लोगों से कहें, प्रिय देशवासियो, अंग्रेजों की रोषपूर्ण हरकतों की नकल मत करो। अपनी स्वतंत्रता को शांतिपूर्ण तरीकों से हासिल करो और किसी की जमीन आदि हथियाए बिना केवल अपने ही देश से खुश और संतुष्ट रहो।”
ब्रिटिश हुक्मरानों के साथ हेडगेवार जी के तीखे नोक-झोक
“इस बात को समझाने के लिए मैं वर्तमान राजनीतिक मुद्दों को उठाने का त्याग नहीं कर सकता। यह कि ब्रिटिश अपना दमनकारी शासन हमारे प्रिय देश में चला रहे हैं, यह सभी को स्पष्ट है। ऐसा कौन सा कानून है, जो एक देश को कहता है कि तुम दूसरे पर शासन करो ? मैं आपसे पूछ रहा हूँ, सरकारी अधिवक्ता, यह सरल और सीधा प्रश्न है। क्या आप इसका उत्तर दे सकते हैं ? क्या यह स्वाभाविक न्याय के विरुद्ध नहीं है ?
उन्होंने कहा कि अगर यह सच है कि कोई भी देश दूसरे पर शासन नहीं कर सकता, तो ब्रिटिश लोगों को किसने यह अधिकार दिया कि वे भारत के लोगों को अपने पैरों तले कुचलें ? क्या अंग्रेज इस धरती के हैं, तो फिर वे कैसे हमें गुलाम बनाकर रख सकते हैं और घोषणा कर सकते हैं कि वे इस देश के स्वामी हैं ? क्या यह न्याय, नैतिकता और धर्म की सर्वाधिक मुखर हत्या नहीं है ?”
'संपूर्ण स्वतंत्रता’ से कम कुछ भी स्वीकार्य नहीं
“हमें ब्रिटेन को छीन लेने और वहाँ पर शासन करने की कोई इच्छा नहीं है। जैसे ब्रिटिश लोग ब्रिटेन में और जर्मन लोग जर्मनी में स्वयं पर शासन करते हैं, ठीक वैसे ही यहाँ भारत में हम भारतीय स्वयं शासन का अधिकार चाहते हैं और अपने कार्य खुद करना चाहते हैं। हमारे मस्तिष्क ब्रिटिश साम्राज्य की गुलामी के विचार से ही विद्रोह करते हैं और इस कलंक को और नहीं सह सकते। हमें ‘संपूर्ण स्वतंत्रता’ से कम कुछ भी स्वीकार्य नहीं है।
19 अगस्त को अदालत ने सुनाया अपना निर्णय
जब तक हम यह प्राप्त नहीं कर लेते, हमें शांति प्राप्त नहीं होगी। क्या हमारी यह इच्छा कि हम अपने ही देश में स्वतंत्र महसूस करें, नैतिकता और कानून के विरुद्ध है ? मेरा मानना है कि कानून नैतिकता तथा विधान को तोड़ने के लिए नहीं होता। मैं मानता हूँ कि कानून इसलिए नहीं होता कि इसे तोड़ें, बल्कि इसलिए होता है कि इसका निर्वाह करें। यही कानून का मुख्य उद्देश्य होना चाहिए।” 19 अगस्त को अदालत ने अपना निर्णय सुनाया कि हेडगेवार अदालत को लिखित में एक शपथ-पत्र दें कि वे अगले एक वर्ष तक देशद्रोही भाषण नहीं देंगे और इसके साथ 3000 रुपयों की जमानत राशि जमा करें।
डॉ. हेडगेवार की प्रतिक्रिया थी
“मेरी आत्मा कहती है कि मैं बिल्कुल निर्दोष हूँ। दमन करने की नीति सिर्फ उस आग में घी डालने का काम करेगी, जो सरकार की वहशी नीतियों के कारण पहले से ही धधक रही है। मुझे पूरा विश्वास है कि अब वह दिन दूर नहीं, जब विदेशी शासन अपने पापों का फल भोगेगा। मुझे सर्वव्यापी ईश्वर के न्याय पर पूर्ण भरोसा है। इसलिए मैं मना करता हूँ कि मैं अदालत के आदेश का पालन नहीं करूँगा।”
जज ने सुनाई एक वर्ष के कठोर कारावास की सजा
जैसे ही उन्होंने अपना उत्तर पूरा किया, जज ने उन्हें एक वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुना दी। डॉ. हेडगेवार अदालत परिसर से बाहर आए, जहाँ असंख्य लोगों की भीड़ इकट्ठा हो गई थी। उनको संबोधित करते हुए उन्होंने कहा, “जैसा कि आप लोग जानते हैं, मैंने देशद्रोह के आरोप के इस मामले में खुद ही अपनी पैरवी की है, लेकिन आजकल लोगों में एक भ्रम उपजा है कि अपने पक्ष में अगर कोई व्यक्ति तर्क-वितर्क करता है तो यह भी राष्ट्रीय आंदोलन के प्रति एक धोखाधड़ी का कार्य है; लेकिन मैं मानता हूँ कि यह एक बेवकूफी की बात होगी, अगर कोई व्यक्ति सिर्फ कीड़े की भाँति स्वयं को मसले जाने के लिए छोड़ दे, जब उस पर झूठा मुकदमा कायम कर दिया जाए।
विदेशी शासकों के प्रपंच को दुनिया के सामने करे उजागर
यह हमारा कर्तव्य बनता है कि हम विदेशी शासकों के प्रपंच को सारी दुनिया के सामने उजागर कर दें। यह वास्तव में एक प्रकार की राष्ट्र-भक्ति ही कही जाएगी और दूसरी ओर, अगर हम स्वयं की रक्षा नहीं करते, तो यह एक प्रकार से आत्महत्या करने जैसा होगा। आप अगर चाहें तो स्वयं को भले ही सुरक्षित न करें, परंतु भगवान् के लिए उन्हें, जो आपसे सहमत नहीं हैं, कम देशभक्त न मानें। अगर हमें हमारी राष्ट्रभक्ति के कर्तव्य के निर्वहन में जेल जाने को कहा जाए या अंडमान भेजे जाने की सजा दी जाए या फिर फाँसी के तख्ते पर ही क्यों न झूलने दिया जाए, हमें ऐसा करने के लिए अपनी इच्छा से तैयार रहना चाहिए, लेकिन कोई भी इस भ्रम में न रहे कि केवल जेल जाना ही सब कुछ है, यही एक रास्ता है, जिससे स्वतंत्रता प्राप्त की जा सकती है।
वास्तव में देशसेवा के अन्य कई कार्य हमारे समक्ष हैं, जो जेल के बाहर रहकर किए जा सकते हैं। मैं एक वर्ष के बाद आप लोगों के बीच फिर लौटूँगा। तब तक निश्चित तौर पर मैं आप सब के संपर्क में न होऊँगा, परंतु मुझे विश्वास है कि तब तक ‘संपूर्ण स्वतंत्रता’ के आंदोलन को और अधिक गति प्राप्त हो चुकी होगी। अब यह संभव नहीं है कि हिंदुस्तान विदेशी औपनिवेशिक शासन के पैरों तले रह सकेगा। मैं आप लोगों को अपना आभार व्यक्त करता हूँ और आपसे विदा चाहता हूँ।”
19 अगस्त, 1921 हेडगेवार जी को अजानी जेल ले जाया गया
शुक्रवार, 19 अगस्त, 1921 के दिन उन्हें अजानी जेल ले जाया गया। शेषाद्रिजी के अनुसार, “उसी शाम टाउनहाल के मैदान में उनकी गैर मौजूदगी में उन्हें सम्मानित करने के लिए एक सार्वजनिक सभा आयोजित की गई। बैरिस्टर गोविंदराव देशमुख ने सभा की अध्यक्षता की। डॉ. मुंजे, नारायणराव हरकारे और विश्वनाथ राव केलकर—सभी ने भरे गले से अपनी-अपनी बात कही। नारायणराव हरकारे ने कहा “अपने त्याग तथा राष्ट्र के प्रति गहन चिंतन के साथ डॉ. हेडगेवार बिना किसी शंका के आने वाली पीढ़ियों के नेता होंगे।” उन सबने डॉ. हेडगेवार का स्वतंत्रता के प्रति संपूर्ण समर्पण भावना के लिए प्रशंसा की झड़ी लगा दी। सबसे अंत में बोलते हुए विश्वनाथ राव केलकर ने लोगों का ध्यान डॉक्टरजी के उस संदेश की ओर दिलाया, जो उन्होंने जेल जाने से पूर्व दिया था।
जेलर भी हेडगेवार जी के व्यक्तित्व से हुआ प्रभावित
जब डॉ. हेडगेवार जेल में पहुँचे तो उसी दौरान जाथड़ नाम का एक नया जेलर, जेल में नियुक्त किया गया था। डॉ. हेडगेवार ने ही उसे जेल मैनुअल समझने में उनकी सहायता की। सर जाथड़ ने बाद में एक अवसर पर कहा, “डॉक्टरजी के मन में कोई लाभ उठाने का परोक्ष भाव न था या वे कोई छिपी हुई व्यवस्था नहीं चाहते थे।” जेलर इस कैदी से इतना अधिक प्रभावित हुआ कि उसने बाद में कहा, “हालाँकि हम सरकारी कर्मचारी थे, हम डॉक्टरजी के अनुकरणीय व्यवहार से इतने अधिक प्रभावित हुए कि उनके रिहा होने के बाद हम जब भी शहर गए, तो हमारे कदम स्वयमेव उनके घर की दिशा की ओर मुड़ गए।”
12 जुलाई 1922 को जेल से हुई हेडगेवार जी की रिहाई
डॉक्टर जी की कारागार से मुक्ति दिनांक 12 जुलाई 1922 को प्रात: काल हुई I बाहर आते समय जब वह अपने घर के कपड़े पहनने लगे, तो उनका बंद गले का कोट तथा आँगरखा उन्हें तंग होने लगाI डॉक्टर जी का वजन 25 पौंड बढ़ गया था I यह उनके प्रत्येक परिस्थिति में हंसते-हंसते जीवन व्यतीत करने का उनका स्वभाव का स्वाभाविक परिणाम थाI इसी कारण जेल भी उनके लिए स्वास्थ्यकर सिद्ध हुई I
डॉक्टर जी सब कारागृह से बाहर आए तो मूसलाधार वर्षा हो रही थीI उस अवस्था में भी डॉक्टर मुंजे, डॉक्टर परांजपे, डॉक्टर नारायण भास्कर खरे, तथा अनेक मित्र बाहर बाट देख रहे थेI उनके द्वारा अर्पित पुष्पहारों को सहर्ष स्वीकार करते हुए डॉक्टर जी सबके साथ घर को चलेI रास्ते में स्थान- स्थान पर रोककर उनका स्वागत किया गयाI साप्ताहिक पत्र ‘महाराष्ट्र’ ने भी उसी दिन ‘छपते छपते’ में डॉक्टर जी के स्वागत का अवसर हाथ से नहीं जाने दियाI ‘महाराष्ट्र’ ने लिखा था कि “डॉ. हेडगेवार देशभक्ति, नि:स्वार्थवृत्ति तथा उत्कटता के संबंध में किसी के भी मन में शंका नहीं थी: परंतु वह अब उनके ये गुण स्वार्थत्याग की भट्टी में से निखरकर बाहर निकल रहे हैंI उनके इस गुणों का इसके आगे राष्ट्रकार्य के लिए सौ गुना उपयोग हो, यही हमारी कामना हैI”
सार्वजनिक स्वागत सभा का हुआ आयोजन
जब 12 जुलाई 1922 को उनको अजानी जेल से रिहा किया गया तो उसी शाम एक सार्वजनिक स्वागत सभा का आयोजन किया गया था , जिसमें उस समय के एक वरिष्ठ कांग्रेसी नेता मोतीलाल नेहरू तथा हकीम अजमल खाँ ने जैसे लोगों को संबोधित किया।
अपने स्वागत समारोह में बोलते हुए डॉ. हेडगेवार ने कहा, “यह तथ्य कि मैं एक वर्ष से सरकार का ‘मेहमान’ था, मेरी योग्यता में कुछ नया नहीं जोड़ते; और अगर वास्तव में इससे वह बढ़ गई है, तो इसका श्रेय केवल सरकार को देना होगा। आज हमें अपने देश के सामने उच्चतम और महानतम विचार रखने होंगे।
कोई भी आदर्श, जो संपूर्ण स्वतंत्रता से कम है, वह हमें कहीं भी नहीं लेकर जाएगा। आपको वे तरीके बताना कि कैसे हमें अपना लक्ष्य प्राप्त करना है, आपकी बौद्धिकता की तौहीन करना होगा, क्योंकि आप सब लोग इतिहास के सबक से निस्संदेह भली-भाँति परिचित हैं। अगर कभी मृत्यु भी हमारे सम्मुख खड़ी हो, तो भी हमें अपने मार्ग से भ्रमित नहीं होना है; हमें अपने मस्तिष्क में उस अंतिम लक्ष्य के दीये को निरंतर जलाए रखना है तथा अपनी शांतिपूर्ण यात्रा जारी रखनी है।”
कोई भी व्यक्ति अपने हृदय और मस्तिष्क में हिंसा या घृणा का भाव न पाले
एक और विचार-बिंदु, जो उन्होंने अपने संबोधन में स्पष्ट किया, उस अवसर और अन्य स्थानों पर भी, वह अहिंसा के प्रति था। उन्होंने दृढ़ता से कहा, “वास्तविक अहिंसा हमारे मन-मस्तिष्क से संबंध रखती है। अपने हृदय में कोई भी व्यक्ति हिंसा या घृणा का भाव न पाले। कोई व्यक्ति ऊपरी तौर पर भले ही कुछ ऐसे कृत्य करे, जिनमें शारीरिक हिंसा की झलक दिखाई पड़े, परंतु यदि यह त्याग की भावना से बिना स्वार्थ या नफरत से किया गया कार्य है, तब हम इसे हिंसा नहीं कह सकते। श्रीकृष्ण ने ‘भगवद्गीता’ में भी यही उपदेश दिया है।” नागपुर के बाद यवतमाल, वानी, आरबी, बढ़ोना, मोहापा और अन्य कई स्थानों पर भी उनका स्वागत हुआ, लेकिन ये स्वागत-उत्सव कहीं से भी देश की गंभीर स्थिति के प्रति उनके चिंतन को कम न कर सके।
स्रोत : अरुण आनंद (2020)