जम्मू कश्मीर पर पाकिस्तानी हमले की कहानी : 9 नवंबर 1947, जब भारतीय सेना के बहादुर सैनिकों ने पाकिस्तानी सैनिकों के कब्जे से बारामुला को कराया मुक्त

    09-नवंबर-2023
Total Views |
 
Baramulla Recapture Story 1947 :
 

Baramulla Recapture Story 1947 :

 
9 नवंबर 1947, ये वो दिन था जब भारतीय सेना के वीर जवानों ने अपनी बहादुरी का परिचय देते हुए कबाइलियों की भेष में जम्मू कश्मीर में घुसी पाकिस्तानी सेना को श्रीनगर से पीछे खदेड़ते हुए बारामुला (Baramulla Recapture)  को पाकिस्तानी हमलावरों से मुक्त कराया था। बारामुला पर पुनः नियंत्रण किए जाने की चर्चा करने से पूर्व एक बार इससे पहले की घटनाओं पर नजर डालना जरुरी है। दरअसल श्रीनगर पर कब्ज़ा करने की नियत से पाकिस्तानी सेना जब गुलमर्ग होते हुए 4 नवंबर 1947 को बडगाम आ पहुंची और बडगाम को अपने कब्जे में लिया, तो उस वक्त 4 कुमाऊं रेजिमेंट की कमांड समभाल रहे मेजर सोमनाथ शर्मा ने अपने जवानों के साथ दुश्मनों को बडगाम से आगे बढ़ने से रोका। हालाँकि इस युद्ध के अंत में मेजर सोमनाथ शर्मा और उनके 22 जवान वीरगति को प्राप्त हो गए। लेकिन उनकी बहादुरी के चलते दुश्मन श्रीनगर की ओर बढ़ने में नाकामयाब रहे और अगली सुबह 5 नवंबर 1947 को सेना की 1 पंजाब रेजिमेंट बडगाम पहुंची और दुश्मनों को पीछे खदेड़ते हुए बडगाम पर पुनः कब्ज़ा किया। इसके अतिरिक्त वीरगति को प्राप्त हुए अपने जवानों के पार्थिव शरीर को भी बरामद कर लिया।
 
Baramulla Recapture story
 
 
9 नवंबर से पूर्व घटनाक्रम 
 

इस बीच भारतीय सेना पाकिस्तान के हर उन नापाक चाल को अपनी बहादुरी से नाकामयाब कर रही थी। 161 इन्फेंट्री ब्रिगेड के कमांडर ब्रिगेडियर LP सेन (Brig. LP Sen) के समक्ष एक नई चुनौती कड़ी हो गई थी। दरअसल पट्टन हाईवे पर 1 सिख रेजिमेंट की कार्रवाई से दुश्मनों को बहुत नुक्सान पहुंचा था, लिहाजा अब दुश्मनों ने जंगलों को अपना रास्ता बनाना शुरू किया। वे पूरी तरह से जंगलों में बिखर चुके थे। पाकिस्तानी सैनिक 1 पंजाब रेजिमेंट से तो सीधी टक्कर ले नहीं सकते थे लिहाजा उन्होंने गुरिल्ला युद्ध की नीति बनाई। इधर श्रीनगर पहुंचने का एकमात्र रास्ता हवाई मार्ग ही था, लिहाजा सेना की अतिरिक्त टुकड़ी को अभी पहुंचने में वक्त था। तभी ब्रिगेडियर LP सेन ने एक नई योजना बनाई। पट्टन हाईवे पर तैनात 1 सिख और 1 पंजाब के जवानों को ब्रिगेडियर LP सेना ने पीछे हटने का आर्डर दे दिया। LP सेन के इस कदम ने बड़े अफसरों को भी कुछ देर के लिए हैरान कर दिया। दूसरी तरफ तो LP सेन को इस ऑपरेशन से हटाने की मांग भी उठने लगी। लेकिन इन सब के बावजूद सैनिकों की टुकड़ी पट्टन हाईवे से पीछे हटकर शालाटेंग (ShalaTeng) में आकर तैनात हो गई।

 
Brigd LP Sen
 
 

ब्रिगेडियर LP सेन पाकिस्तानी सेना को बहुत बड़ी चोट देने की योजना बना बैठे थे, जिससे दुश्मन पूरी तरह अंजान थे। 6 नवंबर को 7 लाइट कैवेलरी की 2 बख्तरबंद गाड़ियाँ रायफल इन्फेंट्री के ट्रूप के साथ जम्मू से श्रीनगर में 161 ब्रिगेड हेडक्वार्टर पहुँच चुकी थी। इधर कबाइली और पाकिस्तानी सेना बारामुला में अमानवीयता की सारी सीमाओं को लांघ चुके थे। बारामुला में हजारों हिन्दू सिखों की नृशंस हत्याएं बहन बेटियों के साथ बलात्कार जैसी जघन्य घटनाओं को अंजाम देने में जुटे थे। 6 नवंबर 1947 की रात आर्मी इंटेलिजेंस ने ब्रिगेड हेडक्वार्टर को सूचना दी कि पाकिस्तानी हमलावर बारामुला से शालाटेंग (ShalaTeng) की ओर बढ़ रहे हैं। पट्टन हाईवे खाली होने के कारन जंगलों में छिपे कबाइली और पाकिस्तानी सेना भी बाहर निकल कर शालाटेंग (ShalaTeng) की ओर से बढ़ने लगे।

 
Pakistani Invaders Jammu Kashmir 1947
 
 
शालाटेंग में पाकिस्तानी हमलावरों पर हमला 
 

ब्रिगेडियर सेन की योजना अब काम कर गई थी। उनकी योजना के तहत अब दुश्मन खुद ब्रिगेडियर LP सेन की जाल में फंस रहा था। शालाटेंग (ShalaTeng) में पहले से ही जवानों की टुकड़ी हमला करने के लिए तैयार थी। 1 सिख बटालियन जिसकी कमांड संभाल रहे थे मेजर सम्पुरण बच्चन सिंह, उन्हें निर्देश मिला था कि वे पाकिस्तानी हमलावरों को शालाटेंग (ShalaTeng) में उलझाए रखें। दूसरी तरफ 1 कुमाऊं की कमांड लेफ्टिनेंट कर्नल प्रीतम सिंह के हाथों में थी। उन्हें रायफल रेंज से गुजरते हुए हमलावरों को दक्षिण की ओर से घेर कर हमला बोलना था। इसके अलावा 1 कुमाऊं की पोजीशन को सुरक्षित रखने की लिए 4 कुमाऊं की टुकड़ी को भी वहां तैनात किया गया था। इसके अलावा 7 कैवेलरी की कमांड संभाले थे लेफ्टिनेंट नावेल डेविड जिनकी बख्तरबंद गाड़ियों और रायफल टुकड़ियों को गान्दरबल और सुम्बल के रास्ते बारामुला श्रीनगर हाईवे पर दुश्मन को पीछे से घेरने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। 7 नवंबर की दोपहर तक भारी संख्या में कबाइली और पाकिस्तानी सेना गुलमर्ग और बारामुला से ट्रकों से शालाटेंग (ShalaTeng) पहुँच गए। 7 नवंबर तक करीब 3 हजार पाकिस्तानी हमलावर शालाटेंग (ShalaTeng) में आकर इकठ्ठा हो गए। 

 
Shalateng war 1947
 
 
Pakistani Invadors
 
 कबाइलियों की भेष में पाकिस्तानी सेना 
 
 
शालाटेंग और पट्टन पर पुनः कब्ज़ा 
 

शालाटैंग पहुंचकर पाकिस्तानी हमलावर एक बार फिर बारामुला की ही तरह श्रीनगर में नरसंहार की तैयारी कर रहे थे। इस बीच दोपहर करीब डेढ़ बजे तक 7th लाइट कैवेलरी दुश्मन को पीछे से घेरते हुए अपनी पोजीशन संभाल चुकी थी। 1 कुमाऊं तक दुश्मनों की जानकारी पहुंची और जैसे ही हमला करने का आदेश मिला इस टुकड़ी के जवानों ने इतना भीषण हमला बोला कि पाकिस्तानी हमलावरों के राईट फलैंग को पूरी तरह से तबाह कर दिया। कुमाऊं रेजिमेंट के हमले से अभी हमलावर खुद को संभाल पाते कि तभी पीछे से 7th लाइट कैवेलरी ने दुश्मन पर एक जोरदार हमला बोलकर भारी तबाही मचाई। इसके अलावा 1st सिख बटालियन और 4 कुमाऊं रेजिमेंट ने भी हमलावरों पर बिना रुके ताबड़तोड़ फायरिंग शुरू कर दी। पाकिस्तानी हमलावर इन हमलों से अंजान थे, वे अपने वाहन, हथियार छोड़कर अपनी जान बचाकर वापस बारामुला की तरफ भागने लगे। इस दौरान शाम 5 बजे तक शालाटैंग और शाम 8 बजे तक पट्टन को पुनः भारतीय सेना ने अपने कब्जे में ले लिया। 

 
Baramulla Recapture 1947
 
 
बारामुला पर पुनः कब्जा
 

अब बारी थी बारामुला और उरी को हमलावरों से मुक्त कराने की। बारामुला पर पुनः कब्ज़ा हवाई हमले की मदद संभव हुआ। 8 नवंबर को भारतीय सेना की टुकड़ी पट्टन, एनकुट रेंज को अपने कब्जे में लेने के बाद अब बारामुला के करीब पहुंची। जान बचाकर भागते कबाइली और पाकिस्तानी सेना बारामुला में लुटपाट करना जारी रखा था। 8 नवंबर को आगे बढ़ते हुए देर शाम तक 161 ब्रिगेड ने बारामुला में अपना मुख्यालय स्थापित कर लिया था। वायुसेना के हमलों ने बारामुला से पाकिस्तानी हमलावरों को पीछे भागने पर मजबूर कर दिया। 9 नवंबर 1947 तक बारामुला पूरी तरह से भारतीय सेना के कब्जे में था। बारामुला से दुश्मनों का सफाया करने के बाद 10 नवंबर को भारतीय सेना का आक्रमण फिर से शुरू हुआ, लेकिन जान बचाकर भागते हमलावरों ने महुरा पुल को नष्ट कर दिया था। जिसके कारण कुछ समय के लिए हमले को रोकना पड़ा। रॉयल इंडियन एयर फोर्स (आरआईएएफ) ने बारामुला, मुजफ्फराबाद रोड पर हवाई फायरिंग करके दुश्मन को निशाना बनाना जारी रखा। महुरा के आस पास की बाधा को पार कर लिया गया और 12 नवंबर को भारतीय सेना महुरा से आगे MS-79 तक पहुंच गई। उस दिन दोमेल, कोटली, मीरपुर और उरी पर बमबारी करने के लिए 9 स्पिटफायर और 2 हार्वर्ड उड़ानें भरी गईं। 12 नवंबर की सुबह तक महुरा पर कब्ज़ा कर लिया गया। महुरा से आगे बढ़ते हुए 1st सिख बटालियन और 1 कुमाऊं के जवान आगे बढ़े और 13 नवंबर की शाम तक उरी पर पुनः अपना कब्जा कर लिया।  

Story Of Baramulla 1947
 
 
 
 Written By : @Arnav Mishra