15 मई, 1993 पुण्यतिथि विशेष : फील्ड मार्शल के एम करिअप्पा भारतीय सेना का वह अफसर जो पाकिस्तानी तानाशाह अयूब खान का भी रह चुका था बॉस

फील्ड मार्शल के एम करिअप्पा का पूरा नाम था, कोडंडेरा मडप्पा करिअप्पा। एक ऐसा नाम है जिसका ज़िक्र किये बिना भारतीय सेना का इतिहास अधूरा है। करिअप्पा ने सेकेण्ड लेफ्टिनेंट के पद से सेना में अपना सफ़र शुरू किया। 1947 में उन्होंने जम्मू कश्मीर में भारत –पाकिस्तान युद्ध के दौरान पश्चिमी सीमा पर सेना का नेतृत्व किया था। 15 जनवरी 1949 को उन्हें भारतीय सेना का प्रमुख नियुक्त किया गया। इसी उपलक्ष्य में 15 जनवरी को सेना दिवस के रूप में मनाया जाता है। 1953 में करिअप्पा सेना से रिटायर हो गये थे। वो 15 मई 1993 को 94 साल की उम्र में दुनिया को अलविदा कह गए।
फील्ड मार्शल के. एम. करिअप्पा का जन्म 28 जनवरी 1899 को कर्नाटक में हुआ था और उन्होंने शुरुआती शिक्षा माडिकेरी के सेंट्रल हाई स्कूल में ली थी। साल 1917 17 में स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने मद्रास के प्रेसीडेंसी कॉलेज में एडमिशन ले लिया। उनका नाम उन दो अधिकारियों में से है, जिन्हें फील्ड मार्शल की पदवी दी गई थी। आपको बता दें, अमेरिका के राष्ट्रपति हैरी एस. ट्रूमैन ने उन्हें 'Order of the Chief Commander of the Legion of Merit' से सम्मानित किया गया था।
भारत पाकिस्तान युद्ध के हीरो – फील्ड मार्शल के एम करिअप्पा
आज़ादी के साथ ही भारत को पाकिस्तनी हमले का सामना करना पड़ा। 1947 के इस हमले में जम्मू कश्मीर का बड़ा हिस्सा पाकिस्तान के कब्जे में चला गया, जिसे आज पाकिस्तान अधिक्रांत जम्मू कश्मीर (POJK) के नाम से जाना जाता है। आज जो हिस्सा भारत के पास है उसमें से पुंछ , राजौरी , कारगिल और द्रास जैसे इलाके भी पाकिस्तान के कब्जे में चले गए थे। इन सारे हिस्सों को भारतीय सेना ने पाकिस्तान के कब्ज़े से वापस मुक्त कराया था। इसके लिए भारतीय सेना ने ऑपरेशन किप्पर , ईज़ी और बायसन चलाये। इन सभी ऑपरेशन का नेतृत्तव करिअप्पा खुद कर रहे थे। वे आगे बढ़ कर जम्मू कश्मीर के बाकी हिस्सों को भी पाकिस्तान के अवैध कब्जे से मुक्त करवाना चाहते थे, लेकिन उन्हें इसके लिए केंद्र से आदेश ही नहीं मिले।
बारामुला में फील्ड मार्शल करिअप्पा
1947 में पाकिस्तानी सेना ने राज्य के सबसे छोटे हिस्से कश्मीर संभाग के बारामुला शहर को पूरी तरह से तबाह कर दिया था। बारामुला में ऐसा कोई घर नहीं था जहाँ पाकिस्तानी सेना ने लूटपाट न की हो। वहाँ रहने वाला हिन्दू, मुसलमान और सिख सभी पाकिस्तानी सेना के शिकार बने। ऐसा कहा जाता है कि पाकिस्तानी सेना 300-400 ट्रको में लूट का सामान भरकर अपने साथ ले गए थे। करिअप्पा की अगुवाई में जब पाकिस्तानी सेना को मार पड़ी तो वो कश्मीर को छोड़ कर वापस भागने लगे। ऐसे ही एक दल का पीछा करते हुए करिअप्पा बारामुला पहुँचे और उन्हें वहाँ पाकिस्तानी आतंक और लूट का पता चला। उन्हें ऐसे लोग मिले जो कई दिनों से भूखे थे। करिअप्पा ने उन लोगों से वायदा किया कि वे इन लोगो के लिए ज़रूर कुछ करेंगे और उन्होंने अपना वायदा निभाया। वे एक दिन बार बारामुला वापस लौटे और इस बार वहाँ के लोगो के लिए आटा, दाल चावल लेकर पहुँचे। वहाँ के लोगों के मन में करिअप्पा के प्रति आदर का भाव उत्पन हुआ और बारामुला में बाद में करिअप्पा के नाम पर एक पार्क बनाया गया जो आज भी वहाँ है।
पाकिस्तानी राष्ट्रपति अयूब खान के बॉस रह चुके थे करिअप्पा
करिअप्पा 1947 के बाद पाकिस्तानी सेना के प्रमुख और बाद में राष्ट्रपति बने। वह जनरल अयूब खान के बॉस रह चुके थे। अयूब खान इस बात को आज़ादी के बाद भी नहीं भूले थे। फील्डमार्शल करिअप्पा के बेटे के सी करिअप्पा भारतीय वायुसेना में फ्लाइट लेफ्टिनेंट थे। 1965 के भारत –पाकिस्तान युद्ध में उनका विमान पाकिस्तान में गिर गया था। जूनियर करिअप्पा ने विमान से कूद कर अपनी जान बचायी थी। जब अयूब खान को पता चला कि करिअप्पा का बेटा पाकिस्तानी कैद में है तो वो खुद उनके बेटे से मिलने आया था। अयूब खान ने खुद करिअप्पा को फ़ोन कर उनके बेटे को छोड़े जाने का आफर दिया था। करिअप्पा ने उनके इस आफर को ठुकरा दिया और साफ़ शब्दों में कहा कि “वह केवल मेरा बेटा नहीं है वो भारत माँ का लाल है और उसके साथ भी बाकी के युद्धबंदियो जैसा व्यवहार किया जाए।“ हालाँकि युद्ध समाप्ति के बाद करिअप्पा के बेटे को रिहा कर दिया गया था।
