''आग की लपटें किताबें जला सकती है, ज्ञान को नहीं..'' ; दशकों बाद पुनर्जीवित हुई भारत की ज्ञानस्थली नालंदा विश्वविद्यालय
19-जून-2024
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''नालंदा उद्घोष है इस सत्य का... कि आग की लपटों में पुस्तकें भलें जल जाएं... लेकिन आग की लपटें ज्ञान को नहीं मिटा सकतीं। नालंदा केवल भारत के ही अतीत का पुनर्जागरण नहीं है। इसमें विश्व के, एशिया के कितने ही देशों की विरासत जुड़ी हुई है। अपने प्राचीन अवशेषों के समीप नालंदा का नवजागरण ये नया कैंपस... विश्व को भारत के सामर्थ्य का परिचय देगा।'' ---
ये बयान है PM मोदी का, जगह थी नालंदा और समय था नालंदा विश्वविद्यालत के नए कैम्पस के उदघाटन का। PM मोदी ने आज यानि 19 जून को भारत के प्राचीन व ऐतिहासिक ज्ञानपीठ नालंदा विश्वविद्यालय के नए कैंपस का उद्घाटन किया। PM मोदी ने करीब 15 मिनट तक 1600 साल पुराने प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय के खंडहर का दौरा किया। इसके बाद प्रधानमंत्री प्राचीन नालंदा यूनिवर्सिटी पहुंचे। वहां उन्होंने नालंदा यूनिवर्सिटी के नए स्वरूप को देश को समर्पित किया। इस दौरान PM मोदी के साथ विदेश मंत्री एस जयशंकर, बिहार के राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ आर्लेकर, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार समेत करीब 17 देशों के राजदूत कार्यक्रम में शामिल हुए। भी नालंदा में मौजूद थे। इसके अलावा केंद्र और राज्य सरकार के कई मंत्री भी नालंदा पहुंचे थे। विश्वविद्यालय को प्रसिद्ध वास्तुकार पद्म विभूषण स्वर्गीय बी.वी. दोशी ने डिजाइन किया है। इसके बुनियादी ढांचे को नेट जीरो यानि शून्य कार्बन उत्सर्जन वाले कैंपस के रूप में बनाया गया है।
भारत के प्राचीनतम व ऐतिहासिक शिक्षा केंद्र नालंदा विश्वद्यालय को पुनर्जीवित करने का फैसला मूल रूप से 2010 में शुरू हुआ था। बिहार के राजगीर स्थित नालंदा विश्वविद्यालय को संसद द्वारा पारित एक विशेष अधिनियम, नालंदा विश्वविद्यालय अधिनियम के तहत स्थापित किया गया है। विश्वविद्यालय का पुनरुद्धार किए जाने से 3 साल पहले साल 2007 में यूनिवर्सिटी के गठन का मार्गदर्शन करने के लिए एक सलाहकार समूह बनाया गया था। अर्थशास्त्री और नोबेल पुरस्कार विजेता प्रो. अमर्त्य सेन इसके अध्यक्ष थे। बाद में सेन को विश्वविद्यालय का कुलपति यानि वाइस चांसलर नियुक्त किया गया। 1 सितंबर 2014 से एक अंडर कंस्ट्रक्शन बिल्डिंग में स्कूल ऑफ इकोलॉजी एंड एनवायर्नमेंट और स्कूल ऑफ हिस्टोरिकल स्टडीज की क्लासेज शुरू हो गई थी। उस वक्त 15 स्टूडेंट्स ने एडमिशन लिया था। जिनके लिए 11 टीचर्स अपॉइंट किए गए थे।
नए कैंपस की विशेषता
विश्वविद्यालय पुनर्जीवित करने के बाद अब तक पोस्ट ग्रेजुएट और डॉक्टरेट स्टूडेंट्स के लिए 7 स्कूल डिपार्टमेंट बनाए गए हैं। इसमें इकोनॉमिक्स एंड मैनेजमेंट, इन्फॉर्मेशन साइंस एंड टेक्नोलॉजी, लिंग्विस्टिक एंड लिटरेचर, इंटरनेशनल रिलेशन्स, पीस स्टडीज (शांति अध्ययन) एंड बुद्धिस्ट स्टडीज, फिलॉसफी एंड कंपेरेटिव रिलिजन, इकोलॉजी एंड एनवायर्नमेंट और हिस्टोरिकल स्टडीज शामिल हैं। इसके अलावा 2 डिपार्टमेंट और इस एकेडमिक सेशन से शुरू होने वाले हैं। नालंदा राजगीर शहर से लगभग 16 किलोमीटर उत्तर में और पटना से लगभग 90 किलोमीटर दक्षिण-पूर्व में है। ये NH 31, 20 और 120 के जरिए भारत के राजमार्ग नेटवर्क से जुड़ा हुआ है। यह बोधगया से लगभग 80 किलोमीटर उत्तर पूर्व में है, गया बिहार का एक और महत्वपूर्ण बौद्ध स्थल है।
नालंदा विश्वविद्यालय की पहचान
प्राचीन भारत में शिक्षा का केंद्र कहे जाने वाले नालंदा विश्वविद्यालय की 9 मंजिला लाइब्रेरी में 90 लाख किताबें रखी गई थीं। यहां पूर्वी और मध्य एशिया के करीब 10 हजार छात्र शिक्षा ग्रहण करने आया करते थे। जिनके लिए 1500 अध्यापक हुआ करते थे। यहां मेडिसिन, लॉजिक और मैथ्स के अलावा बुद्धिस्ट प्रिंसिपल्स पर स्टडी और रिसर्च की जाती थी। नालंदा को लेकर दलाई लामा ने कहा था, 'हमारे संपूर्ण ज्ञान (बुद्धिस्ट नॉलेज) का स्त्रोत नालंदा ही है।' इसकी नींव गुप्त राजवंश के कुमार गुप्त प्रथम ने रखी थी। लेकिन 12वीं शताब्दी में इस्लामिक आक्रमणकारी बख्तियार खिलजी द्वारा इसे ध्वस्त कर दिया गया था। आज करीब 1600 साल बाद एक बार फिर PM मोदी ने राज्य सरकार के साथ मिलकर उस प्राचीन ऐतिहासिक धरोहर का पुनरुद्धार किया है। इस समय विश्वविद्यालय में कुल 17 देश के 400 स्टूडेंट पढ़ाई कर रहे हैं। वहीं, डिप्लोमा और सर्टिफिकेट कोर्स के लिए यहां 10 विषयों में पढ़ाई कराई जा रही है। इसके अलावा कैंपस में एशिया की सबसे बड़ी लाइब्रेरी भी बनाई जा रही है।
पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम की सलाह
पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम 28 मार्च, 2006 को अपने बिहार दौरे पर अंतरराष्ट्रीय पर्यटन स्थल राजगीर आए हुए थे। उसी दौरान उन्होंने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय को पुर्नजीवित करने की सलाह दी थी। इसके बाद मुख्यमंत्री ने उनकी सलाह पर तत्काल विधानमंडल के संयुक्त अधिवेशन को संबोधित करते हुए इसे पुनर्जीवित करने की घोषणा की थी। हालाँकि नीतियों को बनाने में कुछ विलंभ हुआ लेकिन वर्ष 2014 के बाद इसका काम तेज गति से शुरू हुआ। अंततः केंद्र और राज्य सरकार की मेहनत से आज यह नया कैंपस बनकर तैयार हो चुका है। UNESCO ने 15 जुलाई 2016 को नालंदा विश्वविद्यालय के पुरातात्विक अवशेष को वर्ल्ड हेरिटेज साइट यानी वैश्विक धरोहर स्थल का दर्जा दिया था।
तीन महीने तक जलता रहा नालंदा
सन 1193 ई. में तुर्की शासक कुतुबुद्दीन ऐबक के सेनापति बख्तियार खिलजी के नेतृत्व में आक्रमणकारियों की सैन्य टुकड़ी ने नालंदा विश्वविद्यालय में आग लगा दी थी। यहाँ मजूद लाइब्रेरी को भी आग के हवाले कर दिया। नालंदा यूनिवर्सिटी का परिसर इतना विशाल था कि कहा जाता है कि हमलावरों के आग लगाने के बाद परिसर तीन महीने तक जलता रहा। आज नजर आने वाली 23 हेक्टेयर की साइट मूल यूनिवर्सिटी कैंपस का एक हिस्सा भर है। भारत के पुरातत्वविद HD शांकलिया ने 1934 की किताब 'द यूनिवर्सिटी ऑफ नालंदा' में लिखा 5वीं शताब्दी में मिहिरकुल के नेतृत्व में हूणों ने आक्रमण किया। 8वीं शताब्दी में बंगाल के गौड़ राजा ने आक्रमण किया। 1190 के दशक में तुर्क अफगान बख्तियार खिलजी की सेना ने यूनिवर्सिटी को खत्म करने की कोशिश की। एचडी शांकलिया की किताब के मुताबिक बख्तियार खिलजी के आक्रमण का कारण बौद्ध धर्म को उखाड़ फेंकने के साथ ही ईर्ष्या भी थी।
प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय
यह प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय तीसरी से छठी शताब्दी ईसवी के बीच में गुप्त काल के दौरान अस्तित्व में आया था। साल 427 में सम्राट कुमार गुप्त ने इसकी स्थापना की थी। 13वीं शताब्दी यानी 800 से अधिक वर्षों तक यहां विश्वविद्यालय संचालित होता रहा। नालंदा प्राचीन और मध्यकालीन मगध काल में एक प्रसिद्ध बौद्ध महाविहार यानी महान मठ हुआ करता था। ये दुनियाभर में बौद्ध धर्म का सबसे बड़ा शिक्षण केंद्र था। नालंदा विश्वविद्यालय में करीब 10 हजार स्टूडेंट्स पढ़ते थे, जिनके लिए 1500 अध्यापक हुआ करते थे। अधिकतर स्टूडेंट्स एशियाई देशों जैसे चीन, कोरिया, जापान, भूटान से आने वाले बौद्ध भिक्षु थे। ये छात्र मेडिसिन, तर्कशास्त्र, गणित और बौद्ध सिद्धांतों के बारे में अध्ययन करते थे।
प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेन त्सांग ने 7वीं शताब्दी में नालंदा की यात्रा की थी। त्सांग ने 630 और 643 ईसवी के बीच पूरे भारत की यात्रा की। उन्होंने 637 और 642 ई. में नालंदा का दौरा और अध्ययन किया। बाद में त्सांग ने इस विश्वविद्यालय में एक विशेषज्ञ प्रोफेसर के रूप में काम किया। यहीं उन्हें मोक्षदेव का भारतीय नाम मिला। त्सांग 645 ईसवी में चीन लौटे। वे अपने साथ नालंदा से 657 बौद्ध धर्मग्रंथों को लेकर गए थे। ह्वेन त्सांग को दुनिया के सबसे प्रभावशाली बौद्ध विद्वानों में से एक माना जाता है। इनमें से कई ग्रंथों का उन्होंने चीनी भाषा में अनुवाद किया।