अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच बिगड़ते रिश्तों पर अब सरकारी स्वीकारोक्ति भी मिली है। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने पहली बार सार्वजनिक रूप से माना है कि तालिबान के साथ पाकिस्तान के संबंध अब पहले जैसे कभी भी सामान्य नहीं हो सकते। उनका यह बयान न सिर्फ कूटनीतिक हलकों में सनसनी पैदा करने वाला है बल्कि यह पाकिस्तान की विफल अफगान नीति का एक मौन स्वीकार भी माना जा रहा है।
तालिबान से दोस्ती की उम्मीद अब ख़त्म: ख्वाजा आसिफ
ख्वाजा आसिफ ने एक साक्षात्कार में कहा कि पाकिस्तान ने तालिबान के सत्ता में आने का स्वागत किया था, बल्कि उन्होंने स्वयं कई बार काबुल के दौरे भी किए। इस्लामाबाद को उम्मीद थी कि नई तालिबान सरकार उस पर निर्भर रहेगी और पाकिस्तान की ‘कूटनीतिक पकड़’ बनी रहेगी।
लेकिन, उन्होंने स्वीकार किया कि “तालिबान हमारी किसी उम्मीद पर खरा नहीं उतरा… अब कोई सकारात्मक बदलाव की गुंजाइश नहीं बची।” यह बयान ऐसे समय आया है, जब महीनों से दोनों देशों के बीच तनाव चरम पर है और सीमा पर झड़पें लगातार बढ़ रही हैं।
दरअसल बीते कुछ समय में पाकिस्तान और तालिबान-नियंत्रित अफगानिस्तान के रिश्तों में कड़वाहट बेतहाशा बढ़ी है। जैसे : सीमा पर हमले, पाकिस्तानी सेना का हमला, अफ़गान नागरिकों की मौत और दोनों देशों के बीच तीन दौर की विफल वार्ताएँ इन सबने मिलकर रिश्तों की नींव पूरी तरह हिला दी। पाकिस्तान अपने घरेलू हालात खासकर TTP (तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान) की बढ़ती आतंकी गतिविधियों का दोष अफगानिस्तान पर लगा रहा है। वहीं तालिबान इस आरोप को सिरे से नकारता है। अक्टूबर से शुरू हुआ तनाव अब एक तरह के ‘Cold War’ में बदल चुका है।
पाकिस्तान की निराशा के पीछे की असल वजहें
पाकिस्तान शुरू से यह उम्मीद लगाए बैठा था कि तालिबान उसकी नीति सुनेंगे, उसकी सुरक्षा चिंताओं का समाधान करेंगे और अफगानिस्तान इस्लामाबाद की 'रणनीतिक गहराई' बना रहेगा। लेकिन वास्तविकता इससे बिल्कुल उलट निकली।
तीन कारण विशेष रूप से उभरकर सामने आते हैं:
1. तालिबान अब पाकिस्तान के प्रभाव में नहीं। तालिबान काबुल पर नियंत्रण पाने के बाद अपने फैसले खुद ले रहा है। पाकिस्तान का उनपर प्रभाव सीमित होता जा रहा है।
2. अफगानिस्तान के भारत से बढ़ते संबंध: तालिबान प्रतिनिधियों के भारत दौरे और मानवीय सहायता में भारत की सक्रियता ने पाकिस्तान को अंदर तक झकझोर दिया है। पाकिस्तान को डर है कि भारत-अफगानिस्तान नजदीकी उसकी रणनीतिक स्थिति को कमजोर कर देगी।
3. घरेलू असंतोष और राजनीतिक दबाव: पाकिस्तान में आर्थिक संकट और बढ़ते आतंकी हमलों ने सरकार की छवि कमजोर की है। ऐसे में नेताओं की ओर से कटु बयान देना राजनीतिक ‘डैमेज कंट्रोल’ का हिस्सा भी माना जा रहा है।
तालिबान–पाकिस्तान रिश्तों में ऐतिहासिक मोड़
ख्वाजा आसिफ का बयान सिर्फ गुस्से में दिया गया वक्तव्य नहीं, बल्कि यह संकेत है कि:
पाकिस्तान तालिबान को नियंत्रित करने में विफल रहा है
तालिबान अब स्वतंत्र कूटनीति चलाना चाहता है
अफगानिस्तान क्षेत्रीय राजनीति में अपनी अलग पहचान बनाना चाहता है
पाकिस्तान का रणनीतिक ‘बफर ज़ोन’ सिद्धांत अब अप्रासंगिक हो रहा है। इस स्थिति ने पाकिस्तान को कूटनीतिक बैकफुट पर धकेल दिया है।
तालिबान की ओर से ‘विरोध’ और पाकिस्तान की ‘आक्रामकता’
पाकिस्तान की ओर से कभी सीमा पर हमले, कभी चेतावनियाँ, कभी हवाई कार्रवाई ये सब तालिबान को झुकाने के प्रयास हैं। लेकिन तालिबान भी अब वैसा नहीं है जो पाकिस्तान के कहने पर कदम पीछे खींच ले।
पिछले एक वर्ष में:
पाकिस्तान ने कई बार अफगान इलाकों पर हमले किए।
तालिबान ने बदले में सीमा पर पाकिस्तानी चौकियों को निशाना बनाया
निर्दोष नागरिक कई बार इन झड़पों का शिकार बने
यह सब दिखाता है कि स्थिति अब नियंत्रण के दायरे से बाहर जा रही है।
ख़्वाजा आसिफ़ के बयान के मायने?
ख्वाजा आसिफ का बयान महज़ एक शिकायत नहीं यह पाकिस्तान की कूटनीतिक हार की आधिकारिक स्वीकारोक्ति है। वह भी ऐसे समय में जब देश आर्थिक, राजनीतिक और सुरक्षा संकटों से जूझ रहा है।
1. पाकिस्तान की ‘अफगान नीति’ बुरी तरह असफल रही है
जिस तालिबान को पाकिस्तान ने दशकों तक समर्थन दिया, वही अब उसके लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गया है।
2. क्षेत्रीय शक्ति-संतुलन बदल रहा है
भारत–अफगानिस्तान रिश्तों की गर्माहट और पाकिस्तान–अफगानिस्तान रिश्तों की ठंडक ये दोनों मिलकर दक्षिण एशिया की राजनीति को नए सिरे से परिभाषित कर रहे हैं।
3. पाकिस्तान की निराशा स्पष्ट दिख रही है:
ख्वाजा आसिफ की भाषा—“अब कोई गुंजाइश नहीं”-उस झल्लाहट का संकेत है, जो पाकिस्तान को तब महसूस होती है जब उसे लगता है कि उसकी रणनीतिक पकड़ हमेशा के लिए खत्म हो रही है।
4. आने वाले महीनों में तनाव और बढ़ सकता है
अगर दोनों देश ठोस बातचीत नहीं करते, तो: सीमा संघर्ष बढ़ेगा, आतंकी गतिविधियाँ तेज होंगी, क्षेत्रीय शांति को बड़ा खतरा होगा
निष्कर्ष
तालिबान-पाकिस्तान रिश्तों पर छाया यह नया संकट सिर्फ एक द्विपक्षीय विवाद नहीं है—यह दक्षिण एशिया की कूटनीति, सुरक्षा और भविष्य के संदर्भ में एक बड़ा मोड़ है। ख्वाजा आसिफ का बयान यह साफ कर देता है कि पाकिस्तान की अफगान नीति चरमराकर ढह गई है, और अब इस्लामाबाद को अपने पुराने ‘रणनीतिक भ्रम’ से बाहर निकलकर नई वास्तविकताओं को स्वीकार करना पड़ेगा।