1990 Kashmiri Hindu Genocide : 14 सितंबर 1989 को प्रसिद्ध समाजसेवी और राष्ट्रवादी नेता टीका लाल टपलू की सरेआम हत्या के बाद पूरी कश्मीर घाटी में कश्मीरी हिंदुओं के बीच भय का माहौल फैल चुका था। जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (JKLF) जैसे इस्लामिक आतंकी संगठन खुलेआम घाटी के हिंदुओं को घर छोड़ने की धमकियाँ दे रहे थे। हालात भयावह थे, लेकिन कश्मीरी हिंदू समाज पूरी तरह टूटने को तैयार नहीं था।
इसी दौर में पंडित प्रेमनाथ भट्ट जैसे साहसी और प्रतिबद्ध समाजसेवी, इस्लामिक आतंक के आगे झुकने से साफ इंकार कर रहे थे। उनके नेतृत्व और वैचारिक दृढ़ता ने आतंकियों को और अधिक बौखला दिया। परिणामस्वरूप, JKLF ने कश्मीरी हिंदुओं पर हमले तेज़ करने की साजिश रची।
पंडित प्रेमनाथ भट्ट एक अत्यंत शिक्षित और प्रतिष्ठित व्यक्तित्व थे। उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से पॉलिटिकल साइंस और इकॉनोमिक्स में डबल मास्टर्स डिग्री प्राप्त की, इसके बाद एलएलबी की पढ़ाई पूरी की। अनंतनाग में वकालत करते हुए वे अपनी तेज़, निर्भीक और तर्कपूर्ण लेखनी के कारण श्रीनगर तक प्रसिद्ध थे।
वे केवल एक वकील या लेखक ही नहीं, बल्कि एक संवेदनशील समाजसेवी भी थे। अपनी आय का बड़ा हिस्सा वे समाजसेवा में खर्च करते थे। विवेकानंद केंद्र के माध्यम से उन्होंने अपने साथियों के सहयोग से लगभग 150 जरूरतमंद परिवारों के भोजन की नियमित व्यवस्था कर रखी थी।
27 दिसंबर 1989 की शाम पंडित प्रेमनाथ भट्ट जब अनंतनाग स्थित अपने घर लौट रहे थे, तभी उनके घर के पास दासी मोहल्ला में JKLF के आतंकियों ने उन्हें प्वाइंट ब्लैंक रेंज से सिर में गोली मार दी। यह हत्या पूरी चहल-पहल के बीच, एक मुस्लिम-बहुल इलाके में की गई।
हत्या के बाद आतंकी जश्न मनाते हुए बोले- “एक और (मारा) गया…” एक जानी-मानी और सम्मानित शख्सियत की सरेआम हत्या के बाद भी आतंकियों को रोकने वाला कोई नहीं था। वे बेखौफ फरार हो गए, और आसपास मौजूद भीड़ में से किसी ने एक शब्द तक नहीं कहा।
पंडित प्रेमनाथ भट्ट की हत्या के बाद भी मानवता की कोई आवाज़ नहीं उठी। मोहल्ले से कोई भी व्यक्ति उनके परिवार की मदद के लिए आगे नहीं आया, न ही किसी ने पुलिस को कोई जानकारी दी। अगले दिन उनके पैतृक गांव नरबल में उनका अंतिम संस्कार किया गया। लेकिन आतंक यहीं नहीं रुका। उनकी दशमी के दिन भी आतंकियों ने उनके घर पर बम से हमला करने की कोशिश की। यह स्पष्ट हो चुका था कि इस्लामिक आतंकी उनके परिवार को भी खत्म करना चाहते थे।
लगातार दबाव के बाद पुलिस ने JKLF के एक आतंकी मंजूर-उल-इस्लाम को गिरफ्तार तो किया, लेकिन इससे हालात नहीं बदले। पंडित प्रेमनाथ भट्ट के परिवार को लगातार धमकियाँ मिलती रहीं, और भय का साया उनके जीवन से कभी दूर नहीं हुआ।