पाकिस्तान हमेशा, 1947 से ही भारत के विरुद्ध युद्ध की साजिश रचता आ रहा है। यह कोई नई बात नहीं, बल्कि हमारी राष्ट्रीय यात्रा का एक मूलभूत सत्य है। स्पष्ट करें कि यह पाकिस्तान-पोषित अलगाववाद व आतंकवाद के विरुद्ध भारत के लोगों के राष्ट्रवाद की लड़ाई है। श्रोताओं को याद दिलाएँ कि 1947 से लेकर अब तक हम भारतीय पाकिस्तान-प्रायोजित अलगाववाद, आतंकवाद और युद्ध के शिकार रहे हैं।
आप बताएँगे कि भारत ने चार युद्धों में पाकिस्तान को निर्णायक रूप से हराया है, लेकिन पाकिस्तान की शत्रुतापूर्ण मंशाएँ आज भी बनी हुई हैं, चाहे वह सीधे युद्ध के माध्यम से हो या फिर प्रॉक्सी वार/आतंकवाद के ज़रिये। इस परोक्ष युद्ध में, पाकिस्तान ने लगातार टारगेट किलिंग, सामूहिक नरसंहार और हमारी सेना व पुलिस पर हमले किए हैं। जम्मू-कश्मीर में, पाकिस्तान ने 1947 से अलगाववाद व आतंकवाद को निरंतर जारी रखा है, लेकिन जम्मू-कश्मीर के राष्ट्रवादी नागरिकों ने अपनी जान का बलिदान देकर भारत की अखंडता को बचाए रखा है।
अंत में, कारगिल विजय दिवस केवल कारगिल के बारे में नहीं है; यह हमारे सामूहिक बलिदान और प्रतिरोध की क्षमता को याद करने का दिन है। यह हमारे बलिदानियों के संघर्ष को याद करते हुए एक प्रण, एक प्रतिज्ञा लेने का दिन है कि हमें इस निरंतर थोपी गई लड़ाई में जीत हासिल करनी है।
विस्तृत नैरेटिव बिंदु
1. 1947 में जम्मू-कश्मीर पर पाकिस्तान का हमला एक सोची-समझी साजिश थी।
o 1947 में पाकिस्तान को जब ये समझा आया कि जम्मू-कश्मीर का अधिमिलन भारत में ही होगा, इसलिए पाकिस्तान सेना और जिन्ना ने सैन्यबल से जबरन जम्मू-कश्मीर पर कब्जा करने की योजना बनाई।
o हमले की योजना का मास्टरमाइंड पाकिस्तान सेना के वरिष्ठ अधिकारी लेफ्टिनेंट जनरल अकबर खान थे, जिन्होंने "कश्मीर मिशन" नाम से इसका ब्लूप्रिंट तैयार किया। हमलावरों को लाहौर, एबटाबाद, पेशावर, मरदान और कोहाट जैसे शहरों में प्रशिक्षण शिविरों में प्रशिक्षित किया गया। अकबर खान ने अपनी रिपोर्ट "रेडर्स इन कश्मीर" में खुद स्वीकार किया है कि लड़ाकों को कैसे हथियार प्रशिक्षण दिया गया और पाकिस्तानी सरकार ने कैसे वित्तीय, रसद और हथियारों की मदद की थी।
o सितंबर 1947 से, पाकिस्तानी हमलावरों ने सीमावर्ती हिंदू-सिख बहुल गाँवों पर हमले शुरू कर दिए थे।
o 18 अक्टूबर को, तत्कालीन सरसंघचालक गुरु गोलवलकर जी ने महाराजा हरि सिंह से मुलाकात की और उन्हें शेष भारत के साथ विलय के लिए राजी कर लिया।
o यह पाकिस्तानी सेना द्वारा सुनियोजित "ऑपरेशन गुलमर्ग" था, जिसकी योजना पाकिस्तान सेना के डायरेक्टर ऑफ वेपन्स एंड इक्विपमेंट मेजर जनरल अकबर खान ने बनाई थी।
o 20 सितंबर 1947 को रावलपिंडी में एक गुप्त बैठक हुई थी, जिसमें लियाकत अली खान और अन्य वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों ने हिस्सा लिया था।
o बाद में, भारतीय सेना ने बारामूला में जब्त किए गए दस्तावेजों में पाकिस्तानी सेना के रेडियो संदेश पाए, जो हमलावरों को निर्देश दे रहे थे। ब्रिटिश खुफिया रिपोर्ट (नवंबर 1947) ने पुष्टि की कि पाकिस्तान की 7वीं इन्फैंट्री डिवीजन और 9वीं फ्रंटियर फोर्स रेजिमेंट के सैनिक हमले में शामिल थे। हमलावरों के पास पाकिस्तानी सेना के मानचित्र और रसद योजनाएँ थीं। 1948 में, जब भारतीय सेना ने जवाबी कार्रवाई शुरू की, तो पाकिस्तान ने खुले तौर पर अपनी सेना को युद्ध में उतार दिया, जिसमें 15,000 से अधिक नियमित सैनिक शामिल थे।
o जम्मू-कश्मीर का भारत के साथ विलय लगभग तय होने की स्थिति में, 22 अक्टूबर 1947 को छद्मवेश में पाकिस्तानी सशस्त्र सेना ने मुज़फ्फराबाद के रास्ते जम्मू-कश्मीर में प्रवेश किया। हमलावर हजारों की संख्या में थे, जो आधुनिक लाइट मशीन गन, 3-इंच मोर्टार, और ली-एनफील्ड राइफलों से लैस थे, जो उस समय केवल नियमित सेनाओं के पास उपलब्ध थे। हमलावरों के पास सैकड़ों ट्रक, जीप और पर्याप्त गोला-बारूद था, जिनका मुकाबला करने के लिए महाराजा की सेना तैयार नहीं थी।
o पाकिस्तानी हमलावरों ने 48 घंटों में 70 किलोमीटर की दूरी तय की, मुज़फ्फराबाद, डोमेल और उरी पर कब्ज़ा किया, और बारामूला तक पहुँच गए, जो श्रीनगर से केवल 1.5 किलोमीटर दूर था।
o इस बीच, 26 अक्टूबर 1947 को महाराजा हरि सिंह ने शेष भारत के साथ अधिमिलन पत्र पर हस्ताक्षर कर दिए। जिसके बाद 27 अक्टूबर 1947 को भारतीय सेना हवाई जहाज से श्रीनगर उतरी और कुछ ही समय दूर तक पहुँचे दुश्मन को पीछे धकेलना शुरू किया।
o 15 दिनों के भीतर, भारतीय सेना ने श्रीनगर, बारामूला और उरी को मुक्त करा लिया। युद्ध में 1,547 भारतीय सैनिकों ने सर्वोच्च बलिदान दिया, और 2,614 घायल हुए। भारतीय वायु सेना ने 200 उड़ानें भरीं, जिसमें 500 टन हथियार और रसद पहुँचाई गई।
2. मीरपुर-मुज़फ़्फ़राबाद में हिंदू-सिखों का नरसंहार, मंदिरों-गुरुद्वारे ध्वस्त
o अपने शहर और परिवार को बचाने के लिए हर शहर-गाँव में स्थानीय लोगों ने जमकर हमलावरों का मुकाबला किया। मुज़फ्फराबाद में 700 स्थानीय हिंदू-सिख युवाओं ने हथियार उठाए, अंत तक दुश्मन से लड़े। जिसके चलते हजारों हिंदू-सिख लोगों को जम्मू की ओर बचकर निकलने का समय मिल गया।
o मुज़फ्फराबाद के कलेक्टर-मजिस्ट्रेट दुनीचंद मेहता की पत्नी कृष्णा मेहता ने अपने दो बच्चों के साथ हमले का सामना किया। उन्होंने एक स्थानीय मुस्लिम परिवार की मदद से 3 दिन तक जंगल में शरण ली। बाद में, उन्होंने "कश्मीर 1947: अ सर्वाइवर स्टोरी" लिखी।
o मीरपुर त्रासदी (25 नवंबर 1947): स्वतंत्रता के बाद पूरा देश पहली दिवाली धूमधाम से मना रहा था, लेकिन मीरपुर में दिवाली के दिन 24-25 नवंबर को 20,000 हिंदू और सिखों का नरसंहार किया गया। मीरपुर के 500 युवाओं ने 3 दिन तक हमलावरों का सामना किया और दो दिनों तक हमलावरों को शहर से बाहर रोके रखा।
o एक स्थानीय व्यापारी रघुनाथ सिंह 250 परिवारों को जम्मू की ओर ले गए, इस कोशिश में रास्ते में रघुनाथ सिंह ने 27 नवंबर 1947 को हमलावरों से लड़ते-लड़ते अपनी जान का बलिदान दिया। लेकिन वह सैकड़ों परिवारों को बचाने में कामयाब रहे। इसी तरह, एक 26 वर्षीय महेश चंद्र शर्मा ने 180 परिवारों को मीरपुर से जम्मू तक पहुँचने में मदद की। महेश ने भी पाकिस्तानी हमलावरों से लड़ते हुए 26 नवंबर 1947 को अपनी जान का बलिदान दिया।
o मीरपुर शहर की 60% गैर-मुस्लिम आबादी थी, 3,000 महिलाओं और बच्चों को बंधक बनाया गया, जिनमें से 1,200 की बाद में हत्या कर दी गई। मीरपुर के 17वीं शताब्दी में स्थापित भव्य श्री राम मंदिर और गुरुद्वारा को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया गया। 15,000 से अधिक हिंदू-सिख इस नरसंहार से बचकर जम्मू की ओर भागे। लगभग 4000 जम्मू पहुँचने में कामयाब हुए। बाकियों को हमलावरों ने रास्ते में ही पकड़ लिया और मीरपुर के पास कीर्तनगढ़ गुरुद्वारे में एक कैंप बनाकर कैद कर दिया। कई महीनों बाद जब रेड-क्रॉस के अधिकारी यहाँ पहुँचे, तब तक मात्र 3 हजार के आसपास ही हिंदू-सिख इस कैंप में बचे थे। तब तक 7-8 हजार विस्थापित हिंदू-सिखों को यहाँ मार डाला गया था।
o कोटली, भिंबर में भी पाकिस्तानी हमलावरों ने हजारों हिंदू-सिखों का नरसंहार किया। बाग में 1,800 हिंदू और सिख मारे गए; 15 मंदिर और 3 गुरुद्वारे नष्ट किए गए। पलंदरी में 1,200 लोग मारे गए; 5,000 लोग विस्थापित हुए। दोनों शहरों में 70% संपत्तियाँ लूट ली गईं।
3. अली बेग कैंप: नरसंहार
• मीरपुर, बाग, पलंदर, आदि क्षेत्रों से बचे हुए हिंदू-सिख नागरिकों को जबरन पकड़कर मीरपुर के पास कीर्तनगढ़ गुरुद्वारे (जिसे बाद में "अली बेग कैंप" कहा गया) में ठूंस दिया गया।
• यह गुरुद्वारा, एक धार्मिक स्थल होने की बजाय, हजारों कैदियों के लिए अमानवीय यातनाओं और मृत्यु का केंद्र बन गया।
• पाकिस्तानी हमलावरों और कबायलियों ने पुरुषों, महिलाओं और बच्चों को बिना भोजन, पानी और चिकित्सा सुविधा के भीड़-भाड़ में बंद कर दिया। भीषण सर्दी, भीड़ व बिना किसी मानवीय सुविधा के कारण हजारों लोग बीमार पड़ गए।
• जीवित बचे लोगों के अनुसार, प्रतिदिन चुन-चुनकर बंदियों को मार दिया जाता था या उनके साथ क्रूरता की जाती थी। बच्चों को भी नहीं बख्शा गया।
• विभिन्न प्रत्यक्षदर्शी, रेड-क्रॉस रिपोर्ट और ऐतिहासिक दस्तावेज़ों के अनुसार, अली बेग कैंप में 7,000–8,000 से अधिक हिंदू-सिख बंदियों का निर्मम नरसंहार हुआ।
महिलाओं और लड़कियों का अपहरण, धार्मिक अपमान (बाल जबरन कटवाना, धर्मांतरण) और हत्या इस नरसंहार का हिस्सा थी।
• महीनों बाद जब रेड-क्रॉस के प्रतिनिधि वहां पहुँचे, तब तक केवल कुछ हजार बीमार, घायल और मानसिक रूप से टूटे लोग ही जीवित पाए गए।
बाकी लगभग सभी मारे जा चुके थे या उनका कोई पता नहीं था।
• अली बेग कैंप की घटना 1947 के मीरपुर नरसंहार का सबसे भयानक अध्याय थी, जिसने साफ संदेश दिया कि पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित यह हमला religious cleansing और मानवता के खिलाफ सुनियोजित अपराध था।
• अली बेग कैंप में जो हुआ, वह इतिहास का सबसे वीभत्स नरसंहारों में शुमार है, जहां धार्मिक पहचान के नाम पर सुनियोजित हत्या, अपमान व अमानवीयता का चरम दिखा।
• यह घटना कश्मीर के हजारों विस्थापित परिवारों के लिए आज भी पीड़ा और न्याय की प्रतीक बनी हुई है।
4. आम लोगों ने हमलावरों से लोहा लिया और भारतीय सेना के साथ मिलकर पाकिस्तानियों का मुकाबला किया।
• UNCIP का मिशन, पाकिस्तान का इनकार और स्वीकारोक्ति, और "Aggressor" का लेबल
1. UNCIP का गठन और पाकिस्तान ने शुरू में सैन्य उपस्थिति से इनकार किया
◦ जनवरी 1948 में, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने प्रस्ताव 47 पारित किया, जिसने कश्मीर विवाद में मध्यस्थता के लिए संयुक्त राष्ट्र आयोग (UNCIP) का गठन किया। आयोग ने जमीनी स्थिति का आकलन करने और संघर्ष विराम समझौते पर बातचीत करने के लिए 1948 के मध्य में उपमहाद्वीप का दौरा किया।
◦ जब UNCIP पाकिस्तान पहुंचा, तो इस्लामाबाद ने दावा किया कि उसकी नियमित सेना कश्मीर में तैनात नहीं थी, उसने दावा किया कि केवल कबाइली हमले में शामिल थे।
◦ पाकिस्तान के इनकार के बावजूद, UNCIP ने मौके पर निरीक्षण किए और खुफिया जानकारी जुटाई। अगस्त 1948 तक, UNCIP ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद को बताया कि कश्मीर में "पाकिस्तानी सैनिकों की उपस्थिति" उजागर हुई है, इस स्थिति में इसे "Material Change" माना गया।
◦ पाकिस्तान को UNCIP के सामने तथ्यों को स्वीकार करने के लिए मजबूर होना पड़ा: उसने अनिच्छा से स्वीकार किया कि उसकी नियमित सेना की कम से कम दो इन्फैंट्री बटालियनें कश्मीर के अंदर काम कर रही थीं, जो पाकिस्तान के शुरुआती दावे के ठीक विपरीत था।
◦ UNCIP के सदस्य पाकिस्तान की इस दोमुंहे दावों और सच न बताने से नाराज थे। सुरक्षा परिषद को UNCIP की आधिकारिक रिपोर्ट में, आयोग ने पाकिस्तान को स्पष्ट रूप से हमलावर (Aggressor) घोषित किया। यूएन ने अगस्त 1948 में पारित प्रस्ताव में सबसे पहली शर्त ही यही रखी थी कि पाकिस्तान जम्मू कश्मीर के अवैध कब्जे वाले हिस्से से अपनी सेना को हटायेगा। जिसको पाकिस्तान ने कभी नहीं माना।
• 1 जनवरी 1949: संयुक्त राष्ट्र की मध्यस्थता से संघर्ष विराम प्रभावी हुआ। तब से जम्मू-कश्मीर का लगभग 35% हिस्सा पाकिस्तान के अवैध कब्जे में है।
मेजर सोमनाथ शर्मा: 3 नवंबर 1947 को, बडगाम में उनके दस्ते में 50 सैनिक थे, जिन्होंने 700 हमलावरों का सामना किया। शर्मा ने रेडियो पर अंतिम संदेश भेजा: "दुश्मन मेरे से 50 गज दूर है, लेकिन मैं आखिर गोली तक लडूंगा"। जब तक कि भारतीय सैनिक वहाँ तक नहीं पहुँचे, मेजर सोमनाथ ने दुश्मन को आगे नहीं बढ़ने दिया। मरणोपरांत मेजर सोमनाथ शर्मा को भारत के पहले परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया।
जम्मू-कश्मीर की भूमि को मुक्त कराने के लिए भारतीय सेना के 1,547 सैनिकों ने बलिदान दिया और 2,614 घायल हुए।
5. पाकिस्तान के अवैध कब्जे में POJK & POTL-
o जनवरी 1949 के बाद से कुल 86,268 वर्ग किलोमीटर जम्मू-कश्मीर की भूमि पाकिस्तान के अवैध कब्जे में है।
o इसमें लगभग 13,297 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र (मुज़फ्फराबाद, मीरपुर, बाग, पलंदरी), जो भौगोलिक दृष्टि से और भारतीय मानचित्र के मुताबिक जम्मू संभाग का हिस्सा है। इस क्षेत्र को पाकिस्तान अधिक्रांत जम्मू-कश्मीर (POJK) कहा जाता है।
o तत्कालीन जम्मू-कश्मीर का एक बड़ा हिस्सा, गिलगित-बल्तिस्तान है, जो आज लद्दाख केंद्र शासित प्रदेश का हिस्सा है, 72,971 वर्ग किलोमीटर का क्षेत्र भी पाकिस्तान के अवैध कब्जे में है। इसे आज हम पाकिस्तान अधिक्रांत लद्दाख क्षेत्र (Pakistan Occupied Territories of Ladakh - POTL) कहते हैं।
o 1947-48 में पाकिस्तानी हमले के चलते लगभग 43 हजार हिंदू-सिख परिवार जम्मू क्षेत्र या शेष भारत के कई शहरों में विस्थापित हुए, जो आज भी अपने पूर्वजों की भूमि को मुक्त कराने के इंतजार में हैं।
6. 1965 का भारत-पाकिस्तान युद्ध
1965 भारत-पाकिस्तान युद्ध: पाकिस्तान ने अगस्त 1965 में "ऑपरेशन जिब्राल्टर" शुरू किया, जिसके तहत हजारों सैनिकों ने जम्मू-कश्मीर में घुसपैठ की। इसके बाद भारत ने पंजाब (अमृतसर, फिरोजपुर) और राजस्थान (बाड़मेर) में सीमा पार करके पाकिस्तान पर हमला बोल दिया। भारत ने एक जोरदार जवाबी हमला किया, और 22-23 सितंबर को संयुक्त राष्ट्र द्वारा युद्धविराम की घोषणा से पहले पाकिस्तान के 1,800 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर कब्जा कर लिया। दोनोंतरफ भारी नुकसान हुआ, जिसमें लगभग 3,000 भारतीय और 3,800 पाकिस्तानी सैनिक मारे गए।
असल उत्तर की पैटन टैंक लड़ाई में भारतीय सेना का शौर्य:
1965 के भारत-पाक युद्ध के दौरान, असल उत्तर की लड़ाई (8-10 सितंबर) में भारतीय सैनिकों ने पाकिस्तान के तकनीकी रूप से श्रेष्ठ M47 और M48 अमेरिकी पैटन टैंकों का सामना करते हुए असाधारण शौर्य और रणनीति का प्रदर्शन किया। भारत के पुराने टैंक बेड़े, (जिसमें शेरमैन, एएमएक्स-13 और सीमित संख्या में सेंचुरियन टैंक शामिल थे) होने के बावजूद, भारतीय सैनिकों ने खेमकरण के पास गन्ने के खेतों में पानी भरकर एक शानदार जाल बिछाया, जिससे इलाका दलदल में बदल गया। इस रणनीति ने कई भारी बख्तरबंद पैटन टैंकों को दलदल में रेंगने पर मजबूर कर दिया, जिससे पैटन टैंकों की स्पीड और मारक क्षमता कमजोर हो गई
भारतीय सेना ने गन्ने के खेतों में भीतर छिपी एक मजबूत घोड़े की नाल के आकार की रक्षा पंक्ति बनाई ताकि फंसे हुए पाकिस्तानी टैंकों पर घात लगाकर हमला किया जा सके। यह लड़ाई द्वितीय विश्व युद्ध के बाद सबसे बड़ी टैंक लड़ाइयों में से एक बन गई, जिसके परिणामस्वरूप लगभग 97 पाकिस्तानी टैंक, जिनमें 72 पैटन टैंक शामिल थे, नष्ट हो गए या पकड़ लिए गए, जिसके कारण इस क्षेत्र को "पैटन नगर" (टैंकों का कब्रिस्तान) कहा जाने लगा।
एक असाधारण नायक हवलदार अब्दुल हमीद थे, जिन्होंने पानी भरे खेतों से जीप चलाते हुए एक रिकॉइललेस राइफल से कई पैटन टैंकों को नष्ट करके उल्लेखनीय साहस का प्रदर्शन किया। उनके कार्यों ने पाकिस्तानी बख्तरबंद इकाइयों को भारी नुकसान पहुंचाया और उन्हें भारत के सर्वोच्च सैन्य सम्मान, परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया।
इस लड़ाई ने निर्णायक रूप से भारत के पक्ष में पासा पलट दिया, जिसने न केवल भारतीय सैनिकों की बहादुरी बल्कि एक बेहतर सुसज्जित दुश्मन पर काबू पाने में उनकी सामरिक सरलता को भी प्रदर्शित किया।
1971 भारत-पाकिस्तान युद्ध
• 1971 के युद्ध में भारत ने पूर्वी और पश्चिमी दोनों मोर्चों पर पाकिस्तान को हराया, जिससे बांग्लादेश का निर्माण हुआ। यह युद्ध 3 दिसंबर 1971 को पाकिस्तान द्वारा भारत पर पूर्व-नियोजित हवाई हमलों के साथ शुरू हुआ था।
• भारत ने मुक्ति बाहिनी गुरिल्लाओं का समर्थन करते हुए पूर्वी पाकिस्तान में तेज़ी से सैन्य कार्रवाई की और 16 दिसंबर तक ढाका पर कब्ज़ा कर लिया। उसी दिन लगभग 93,000 पाकिस्तानी सैनिकों ने आत्मसमर्पण किया, जो कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद सबसे बड़ा सैन्य आत्मसमर्पण था।
• जुलाई 1972 में हुए शिमला समझौते के तहत भारत और पाकिस्तान ने सभी विवादों को द्विपक्षीय बातचीत के माध्यम से सुलझाने पर सहमति जताई। इसके तहत जम्मू-कश्मीर में युद्धविराम रेखा को नियंत्रण रेखा (LoC) में बदला गया। इसके बावजूद पाकिस्तान ने बार-बार कश्मीर मुद्दे का अंतरराष्ट्रीयकरण करने की कोशिश की।
7. 1980-90 का दशक: पाकिस्तान का परोक्ष युद्ध और इस्लामी आतंकवाद के ज़रिए साज़िश
o 1947, 1965 और 1971 के युद्धों में करारी हार के बाद पाकिस्तान को यह स्पष्ट हो गया कि वह पारंपरिक युद्ध में भारत को हरा नहीं सकता। इसलिए 1980 के दशक में पाकिस्तानी फौज और ISI ने "ब्लीड इंडिया विद ए थाउज़ेंड कट्स" (Bleed India with a thousand cuts) नीति को अपनाया। जिसका मकसद था कि भारत को इस्लामी आतंकवाद, अलगाववाद के ज़रिए अस्थिर करके तोड़ना था।
o अफगान जिहाद: 1979 में अफगानिस्तान में सोवियत संघ के विरुद्ध जो "मुजाहिदीन" तैयार किए गए थे, उन्हें अमेरिका और पाकिस्तान ने प्रशिक्षित और हथियारबंद किया। जब 1989 में सोवियत वापस चले गए, तो पाकिस्तान ने इन्हीं जिहादियों को कश्मीर में भेजने का फैसला किया। ISI ने इनका इस्तेमाल भारत के खिलाफ "इस्लामी जिहाद" के नाम पर करना शुरू किया।
o जम्मू-कश्मीर के अंदर भी पाकिस्तान ने इस्लामी कट्टरपंथ की खाद से कई आतंकी संगठन खड़े कर दिए। JKLF (जम्मू एंड कश्मीर लिबरेशन फ्रंट) और बाद में हिज़बुल मुजाहिदीन, लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद जैसे संगठन पाकिस्तान ने कश्मीर में स्थापित किए।
o 1984-85 में कश्मीर में हिंदुओं और भारत के खिलाफ कई हिंसक घटनाएँ हुईं, 1987 के जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनाव में कथित धाँधली के बहाने, कश्मीर में भारत-विरोधी आग को और भड़का दिया।
o सीमा पार से ट्रेनिंग लेकर आए आतंकियों ने घाटी में अलगाववादी हिंसा और टारगेटेड किलिंग शुरू कर दीं। इस्लामी आतंकवाद की शुरुआत के दौरान टीका लाल टपलू, जस्टिस नीलकंठ गंजू और कई अन्य प्रमुख हिंदू नेताओं, बुद्धिजीवियों और न्यायधीशों की सुनियोजित टारगेट किलिंग की गई। ये दौर दरअसल "रिलीजियस क्लींजिंग" (Religious Cleansing) की शुरुआत थी, जिसमें भय पैदा करके कश्मीरी हिंदुओं को घाटी से भगाने की साज़िश की गई।
टीका लाल टपलू: एक वरिष्ठ वकील, RSS से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ता और भारतीय जनता पार्टी (BJP) के कश्मीरी पंडित नेता थे। वे घाटी में खुलेआम आतंकवाद और अलगाववाद का विरोध कर रहे थे। 13 सितंबर 1989 को उन्हें उनके श्रीनगर स्थित घर के पास दिनदहाड़े गोली मार दी गई। यह घाटी में किसी प्रमुख हिंदू नेता की पहली हत्या थी, जिसने पूरे समुदाय में भय का वातावरण पैदा कर दिया। हत्या के बाद घाटी में आतंकियों द्वारा खुलेआम जश्न मनाया गया, पुलिस कोई ठोस कार्रवाई नहीं कर सकी।
जस्टिस नीलकंठ गंजू: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट के न्यायाधीश रह चुके थे। उन्होंने आतंकी मकबूल भट्ट (JKLF संस्थापक) को हत्या के केस में फाँसी की सज़ा सुनाई थी। आतंकवादियों ने 4 नवंबर 1989 को, श्रीनगर के हरि सिंह स्ट्रीट पर दिनदहाड़े उन्हें गोली मार दी। यह हमला न केवल कश्मीरी हिंदुओं पर था, बल्कि भारत के न्यायिक प्रणाली पर भी हमला था। आतंकियों का संदेश था कि कोई सुरक्षित नहीं।
o इसके बाद 1990 में आतंकियों ने सरकारी अधिकारियों और शिक्षाविदों को निशाना बनाना जारी रखा। गिरजा टीकू, एक लैब असिस्टेंट, को बर्बरता से मारा गया। एक-एक करके हिंदू शिक्षकों, इंजीनियरों, प्रशासनिक अधिकारियों को उनकी धार्मिक पहचान के कारण निशाना बनाया गया।
o अक्टूबर-नवंबर 1989 के दौरान मस्जिदों से रात में ऐलान किए गए: "रालिव, चालिव, या गालिव" (Raliv, Chaliv, ya Galiv) — यानि "धर्म परिवर्तन करो, घाटी छोड़ दो, या मरने को तैयार रहो"। दीवारों पर लिखा गया: "कश्मीर छोड़ो, या मारे जाओ" (Leave Kashmir, or get killed)। महिलाओं को हिजाब पहनने और हिंदू परिवारों को 'सूचीबद्ध' (listed) करने की धमकियाँ दी गईं।
o पुलिस और प्रशासन की निष्क्रियता के बाद जनवरी 1990 के बाद से कश्मीर से 3-4 लाख कश्मीरी हिंदुओं को पलायन पर मजबूर होना पड़ा। सैकड़ों की हत्या की गई, संपत्तियों पर कब्जा कर लिया गया, किसी भी हत्या में तत्काल कोई गिरफ्तारी या न्याय नहीं हुआ।
o कश्मीरी हिंदुओं के पलायन के बाद, पाकिस्तान-पोषित इस्लामी आतंकवाद घाटी से निकलकर जम्मू क्षेत्र में भी फैलने लगा। इसी दौरान वैली में 1995 में अल-फ़ारन ग्रुप द्वारा 6 विदेशी पर्यटकों का अपहरण किया गया, जिससे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत को अस्थिर दिखाने की कोशिश की गई।
o इस दौरान पाकिस्तान, ISI खुलेआम इन आतंकियों को ट्रेनिंग, हथियार, फंडिंग, टेक्निकल और टैक्टिकल सपोर्ट दे रहा था। पीओजेके के मुज़फ्फराबाद, बालाकोट, बहावलपुर में ट्रेनिंग कैंप चलाए जा रहे थे, आतंकियों को गुरिल्ला युद्ध, IED, स्नाइपर टैक्टिक्स, टनल युद्ध की तकनीकें सिखाई जा रही थीं। पूरी दुनिया चुप थी। अंतर्राष्ट्रीय मीडिया भी भारत-विरोधी नैरेटिव को आगे बढ़ा रहा था।
o परोक्ष युद्ध के इस दौर को पाकिस्तान की आंशिक सफलता का दौर माना जा सकता है। मजहबी कट्टरता से कश्मीर को अस्थिर करके, वैश्विक स्तर पर कश्मीर के मुद्दे पर 'ह्यूमन राइट्स' के बहाने भारत पर चौतरफा दबाव बनाया गया। लेकिन भारतीय सेना ने मजबूती से आतंक को कुचला।
8. आम नागरिकों द्वारा आतंकवाद का सामना
o साल 1995 में जब जम्मू क्षेत्र के डोडा, किश्तवाड़ और भद्रवाह के पहाड़ी क्षेत्रों में आतंकवादियों की घुसपैठ बढ़ने लगी। घाटी में फैले आतंकवाद ने जब धीरे-धीरे जम्मू के सीमावर्ती और पर्वतीय क्षेत्रों में पैर पसारने शुरू किए, तब यह साफ़ हो गया कि सेना और पुलिस हर गाँव की रक्षा नहीं कर सकती, तब आम लोगों ने आत्मरक्षा और देश की अखंडता को सुरक्षित रखने का बीड़ा उठाया। इसमें सबसे बड़ा नाम है रूचिर कौल का।
रूचिर कुमार कौल की कहानी साहस, राष्ट्रवाद और लोगों को एकजुट करने की उनकी असाधारण क्षमता की एक अद्धुत गाथा है।
उनका जन्म 04/07/1958 को एक मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ था, जिसकी गहरी धार्मिक और राष्ट्रवादी पृष्ठभूमि थी। बचपन से ही, वह एक आरएसएस स्वयंसेवक थे और बाद में इसके ज़िला कार्यवाह के रूप में सेवा की। बलिदान के समय, वे भाजपा के मंडल प्रधान थे।
तत्कालीन डोडा जिले में आतंकवाद की स्थिति गंभीर थी। पाकिस्तान पोषित आतंकियों ने कश्मीर घाटी में हिंदूओं का नरसंहार कर, उन्हें पलायन को मजबूर करने के बाद उन्होंने डोडा जिले पर अपनी नज़र डाली। पहाड़ी, बीहड़, घने जंगल और प्राकृतिक गुफाओं के कारण आतंकी हमले करने के बाद छिपने के लिए भी सबसे उपयुक्त क्षेत्र था। उन्होंने भद्रवाह को चुना क्योंकि वे जानते थे कि वहां के लोग प्रबल राष्ट्रवादी थे और यदि उन्हें वहां से उखाड़ा गया, तो बाकी से हिस्सों से हिंदू-सिखों का पलायन करना आसान हो जायेगा।
अगस्त 1992 को भद्रवाह में हमले शुरु किये, आतंकियों द्वारा निहत्थे स्थानीय लोगों पर गोलीबारी और ग्रेनेड से हमले आम बात हो गई थी। आतंकवादियों ने 15 अगस्त 1992 को जंगल में अपने मवेशियों को वापस लाने गए दो निर्दोष 9वीं कक्षा के छात्रों की हत्या कर दी, उनकी आँखें निकाल लीं और उनके जिगर और दिल भी बाहर निकाल दिए। ये आतंकवादी मिलिट्री ग्रेड प्रशिक्षित और अत्याधुनिक हथियारों से लैस थे। इस क्षेत्र में सेना या सुरक्षा बल के जवान तैनात नहीं थे; केवल कम-प्रशिक्षित और छोटे हथियारों से लैस साधारण पुलिसकर्मी थे जो खुद की या अपने पुलिस स्टेशन की भी रक्षा करने में असमर्थ थे।
इस भयावह स्थिति से निबटने के लिए रूचिर कुमार कौल सामने आए। उन्होंने लोगों से आव्हान किया, उसको लीड किया। लोगों को इस हद तक उत्साहित किया कि वे आश्वस्त हो गए कि वे अपनी तलवारों, कटारों, देसी बंदूकों और दोहरी बैरल वाली बंदूकों से दुश्मनों की एके-47, यूएमजी और ग्रेनेड लॉन्चर को हरा सकते हैं।
रूचिर कौल ने आम लोगों, नौजवानों को लेकर एक सिविल फोर्स तैयार की। पहली बार, आम लोग हर गाँव, मोहल्ले, पहाड़ों की चोटियों और घाटियों और गुफाओं में आतंकवादियों का विरोध कर रहे थे। उनके अद्वितीय शौर्य का पहला उदाहरण तब देखा गया जब सर्टिंगल गाँव पर आतंकवादियों के एक ग्रुप ने यूएमजी, ग्रेनेड लॉन्चर और एके-47 बंदूकों से हमला किया। राष्ट्रवादी लोगों ने जवाबी कार्रवाई की, जिसके नतीजा ये हुआ कि आतंकवादियों को जान-माल का भारी नुकसान हुआ। इसके अलावा भी रूचिर कौल के नेतृत्व में लोगों ने जगह-जगह आतंकियों को जवाब देना शुरु किया।
इससे, रूचिर कुमार कौल पाकिस्तान और जम्मू-कश्मीर के आतंकवादियों टारगेट लिस्ट में सबसे ऊपर आ गये। इस बीच केंद्र और राज्य सरकार को गहरी नींद से जगाने के लिए, रूचिर कुमार ने 41 दिनों का जन आंदोलन शुरू किया। दुकानदारों ने लगातार हड़ताल रखी और राष्ट्रवादी कर्मचारियों ने 28 दिनों तक हड़ताल की, जिसके परिणामस्वरूप बैंक, ट्रेजरी, डाकघर, स्कूल, कॉलेज और अन्य कार्यालय बंद रहे।
रूचिर कुमार कौल को रास्ते से हटाने के कई प्रयास किए गए, लेकिन सभी विफल रहे। लेकिन अंततः 7 जून 1994 को आतंकवादी सफल हो गए, जब वो अपनी पत्नी के साथ अपने घर के पास अपने खेत में काम कर रहे थे, तब आतंकियों ने हमला किया और रूचिर कुमार जी वीरगति प्राप्त की।
अमर बलिदानी रूचिर कुमार कौल देशभक्त लोगों के मन और दिलों में आज भी जीवित हैं, उन्होंने दिखाया कि कैसे निहत्थे, हतोत्साहित और असंगठित लोगों को एक अभेद्य शक्ति में ढाला जा सकता है और युद्ध जीते जा सकते हैं।
o रूचिर कौल के साहस और बलिदान का नतीजा था कि, यहीं से विलेज डिफेंस कमेटियों की शुरुआत हुई। हर VDC में गाँव के 10-15 विश्वसनीय, निडर और देशभक्त नागरिक शामिल किए गए। इन्हें .303 राइफल्स, गोला-बारूद और बेसिक मिलिट्री ट्रेनिंग दी गई।
o डोडा, किश्तवाड़, भद्रवाह, पुंछ, राजौरी के दूरदराज के गाँवों में VDC के सदस्य रातों को गश्त लगाते, पहाड़ी क्षेत्रों में पोस्ट बनाकर निगरानी करते और संदिग्ध गतिविधियों की जानकारी सुरक्षाबलों को देते थे। कई बार आतंकियों के साथ सीधे मुठभेड़ भी हुई, जिसमें VDC के सदस्य वीरगति को प्राप्त हुए लेकिन आतंकियों को भी मार गिराया।
o कई जगहों पर महिलाएँ भी VDC में शामिल हुईं, और हथियार चलाना सीखा। VDC की ये कोशिश एक क्रांतिकारी कदम साबित हुआ, नतीजा ये हुआ कि आतंकी घाटी से बाहर कभी भी जम्मू संभाग के इन पहाड़ी क्षेत्र में पैर पसार ही नहीं पाए।
9. कारगिल युद्ध (1999): परवेज़ मुशर्रफ की साज़िश, भारत का जवाब
o 1998 में भारत और पाकिस्तान दोनों ने परमाणु परीक्षण किए, जिसके बाद दोनों देशों में कूटनीतिक बातचीत फिर शुरू हुई थी। फरवरी 1999 में अटल बिहारी वाजपेयी लाहौर गए, और भारत-पाकिस्तान के संबंधों में सुधार की आशा जगी। इसी दौरान पाक सेना प्रमुख जनरल परवेज़ मुशर्रफ ने लाहौर समझौते को धोखा देकर कारगिल की साज़िश रची। तरीका वही पुराना, गुपचुप तरीके से अपने सैनिकों को स्थानीय मुजाहिदीन के भेष में LoC पार भेजा, और द्रास, बटालिक, तोलोलिंग, टाइगर हिल जैसे भारतीय पोस्टों पर कब्जा कर लिया।
o पाकिस्तान की योजना थी कि भारत की 'लेह-कारगिल-सियाचिन' की सप्लाई लाइन काट दी जाए। सियाचिन के करीब ऊँचाई वाले क्षेत्रों पर कब्ज़ा करके भारत को रणनीतिक रूप से मजबूर किया जाए। यह सब ऐसे समय किया गया जब भारतीय सेना की अधिकांश अग्रिम चौकियाँ सर्दियों में खाली होती हैं। अंतर्राष्ट्रीय मंच पर कश्मीर को फिर से "फ़्लैशपॉइंट" के रूप में उभारने की योजना थी।
o मई 1999 में चरवाहों की रिपोर्ट और टोही उड़ानों से घुसपैठ का पता चला। भारत ने तुरंत "ऑपरेशन विजय" शुरू किया और 13,000-18,000 फीट की ऊँचाई पर भीषण लड़ाई लड़ी। सबसे पहले भारतीय वायु सेना ने "ऑपरेशन सफ़ेद सागर" चलाया, ये पहला मौका था जब IAF ने इतने ऊँचे युद्धक्षेत्र में ऑपरेशन किया था, जो इतना सफल रहा कि बाद में दुनिया भर में हाई-एल्टीट्यूड वॉरफेयर को सीखने-सिखाने में इस युद्ध को सिलेबस में शामिल किया गया।
o कैप्टन विक्रम बत्रा, कैप्टन अनुज नायर, लेफ्टिनेंट नवदीप सिंह, ग्रेनेडियर योगेंद्र यादव जैसे वीरों ने सर्वोच्च बलिदान देकर टाइगर हिल, तोलोलिंग, प्वाइंट 5140, प्वाइन्ट 4875 जैसी महत्वपूर्ण चोटियों को दुश्मन से मुक्त करा लिया। सीमित संसाधनों और कठिन परिस्थितियों के बावजूद दुश्मन को पीछे हटने को मजबूर किया।
o भारत ने फिर पाकिस्तान की साजिश को तथ्यों के साथ उजागर किया कि यह युद्ध LoC पार पाकिस्तानी सेना द्वारा किया गया घुसपैठ है, न कि कोई स्थानीय मुजाहिदीनों की साज़िश। अंतर्राष्ट्रीय मंचों (UN, अमेरिका, G8) पर भारत को व्यापक समर्थन मिला। अमेरिका ने पाकिस्तान को LoC के पार से फ़ौरन वापस जाने का आदेश दिया, और नवाज़ शरीफ़ को वाशिंगटन में क्लिंटन ने फटकार लगाई।
o इस युद्ध में भारत ने भी अपनी रणनीतिक और सैन्य कमियों को सुधारने का अवसर बनाया और LoC की निगरानी को मजबूत किया गया। बाद में कारगिल रिव्यू कमेटी बनाई गई। इंटेलिजेंस फेल्योर (RAW, MI, IB) स्वीकार करते हुए कई सुधार किए गए। थल सेना, वायु सेना और खुफिया एजेंसियों में बेहतर तालमेल की जरूरत समझी गई। सियाचिन और कारगिल सेक्टर में पूरे साल चौकियों पर तैनाती सुनिश्चित की गई।
o यह स्पष्ट हो गया कि परमाणु शक्ति के बावजूद पारंपरिक युद्ध की संभावना को नकारा नहीं जा सकता, साथ ही ये भी स्पष्ट हुआ कि पाकिस्तान कभी भी अपनी साज़िशों से पीछे नहीं हटेगा। भारत को हमेशा पाकिस्तान को सबक सिखाने के लिए, हर स्तर पर तैयार रहना होगा।
10. 2000-2015 के बीच आतंकी हमलों और नरसंहारों का दौर
o 1999 कारगिल युद्ध के बाद पाकिस्तान ने महसूस किया कि पारंपरिक युद्ध में वह भारत से नहीं जीत सकता। इसलिए उसने 2000 के बाद घुसपैठ और प्रॉक्सी वॉर को ही मुख्य रणनीति बना लिया। इस बार पाकिस्तान का वार सिर्फ जम्मू-कश्मीर तक सीमित नहीं था, बल्कि इस दौरान पाकिस्तान-पोषित आतंकी संगठनों ने देशभर में आतंकी हमलों को अंजाम दिया।
सामूहिक नरसंहार (Massacres of Civilians):
छत्तीसिंहपुरा (2000): जब सिख समुदाय के लोग होली की तैयारी में थे, आतंकियों ने कश्मीर के शांत गाँव में रात के अंधेरे में दस्तक दी। 36 सिखों को एक कतार में खड़ा कर गोलियों से भून दिया गया। यह हमला कश्मीर में सांप्रदायिक उकसावे की सबसे खौफनाक शुरुआत थी।
कालुचक (2002): तीन आतंकियों ने जम्मू में सैन्य छावनी के पास एक बस को रोका। उसमें सैनिकों के परिवार, बच्चे और महिलाएँ थे। वे एक-एक को उतारकर गोली मारते गए। 10 बच्चों समेत 31 निर्दोष मारे गए — यह भारत की आत्मा को झंझोड़ देने वाला हमला था।
डोडा-ऊधमपुर हत्याकाँड (2006): रामनवमी की रात को आतंकियों ने गाँवों में घुसकर हिंदू परिवारों को निशाना बनाया। कई घरों में घुसकर बुजुर्गों, महिलाओं और बच्चों को बेरहमी से मार डाला। डोडा और ऊधमपुर में 35 से ज़्यादा ग्रामीण मारे गए।
सुरक्षाबलों पर हमले (Targeted Attacks on Forces):
संसद हमला (2001): दिल्ली के दिल में, लोकतंत्र की सबसे बड़ी संस्था पर जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर के आतंकियों ने हमला किया। उनका मकसद संसद में जनसंहार कर भारत को अराजकता में धकेलना था। 9 सुरक्षाकर्मी शहीद हुए, लेकिन आतंकियों को सीमा तक पहुँचने नहीं दिया गया।
जम्मू-कश्मीर विधानसभा हमला (2001): एक आत्मघाती हमलावर विस्फोटक भरी गाड़ी लेकर विधानसभा परिसर में घुसा। फिर गोलीबारी शुरू हुई। 38 लोग मारे गए — यह सीधा लोकतांत्रिक संस्थाओं को खत्म करने की साजिश थी।
ऊधमपुर और गुरदासपुर हमले (2015): सीमावर्ती इलाकों में पाकिस्तानी आतंकियों ने BSF की गाड़ियों और थानों को निशाना बनाया। गुरदासपुर में थाने पर घुसकर कई घंटे तक गोलीबारी हुई। इन हमलों ने दिखाया कि खतरा अब जम्मू तक सीमित नहीं रहा।
शहरी सीरियल ब्लास्ट (Urban Serial Bombings):
मुंबई (2003): गेटवे ऑफ इंडिया और झवेरी बाज़ार — देश की रफ्तार और सपनों का शहर — एक ही दिन दो धमाकों से हिल गया। कुल 52 लोग मारे गए। यह हमला बताता है कि आतंक अब शहरों के दिल तक घुस चुका है।
दिल्ली (2005): दिवाली से दो दिन पहले, जब बाज़ार सबसे ज़्यादा भरे होते हैं, आतंकियों ने सरोजिनी नगर, पहाड़गंज और गोविंदपुरी में बम फोड़ दिए। 62 लोग मारे गए, त्योहार मातम में बदल गया।
मुंबई लोकल ट्रेन बम धमाके (2006): 11 जुलाई 2006 को, मुंबई लोकल ट्रेन में 7 बम धमाके हुए, जिसमें कुल 209 निर्दोष जानें गईं, 700+ घायल हुए। ये हमला भारत की जीवन रेखा, लोकल ट्रेनों पर सीधा हमला था।
2008 जयपुर, अहमदाबाद, दिल्ली: तीनों शहरों में सिलसिलेवार बम धमाके किए गए। जिनमें कुल 150 से अधिक निर्दोष लोग मारे गए। IM (इंडियन मुजाहिदीन) नाम से हमले की जिम्मेदारी लेने वाले गुट का मकसद था देशभर में डर फैलाना। इस आतंकी संगठन के सीधे तार पाकिस्तान से जुड़े सामने आए।
सांप्रदायिक उद्देश्य से की गई हिंसा (धार्मिक स्थलों/श्रद्धालुओं पर हमले):
2000 में पहलगाम में 21 श्रद्धालु मारे गए। 2001 और 2002 में श्रीनगर और अनंतनाग में हमले कर कुल 35+ श्रद्धालु मारे गए।
2017, अनंतनाग में अमरनाथ यात्रा से लौट रही बस पर आतंकियों ने गोलीबारी की, 8 श्रद्धालु मारे गए, 18 घायल। यह हमला लश्कर-ए-तैयबा द्वारा रचा गया था।
2002, रघुनाथ मंदिर पर दो बार हमला कर धार्मिक स्थलों को आतंक का केंद्र बनाया गया, इस हमले में कुल 25 से अधिक श्रद्धालु मारे गए।
o सीमा और LoC पर घुसपैठ: 2000 से 2015 तक लगातार घुसपैठ होती रही, सैकड़ों मुठभेड़ हुईं, जिसमें भारतीय सेना के दर्जनों जवानों ने वीरगति प्राप्त की और सैकड़ों आतंकी मारे गए। किश्तवाड़, पुंछ, राजौरी, कुपवाड़ा ये सीमावर्ती इलाके सबसे ज़्यादा घुसपैठ और आतंकी ठिकानों का केंद्र बने रहे।
2000–2017 आतंकी साजिश और प्रतिरोध के आँकड़े:
बड़े आतंकी हमले: 35+
नागरिकों की मौत: 1000+
सुरक्षाकर्मी शहीद: 400+
मारे गए आतंकवादी: 1000+
धार्मिक स्थलों/श्रद्धालुओं पर हमले: 8+
o इस दौर में पाकिस्तान द्वारा छेड़ा गया छद्म युद्ध न केवल सीमा पर था, बल्कि भारत के बाज़ारों, धार्मिक स्थलों, ट्रेनों और संसद तक फैलाया गया। लेकिन हर हमले के बाद भारत और मज़बूत हुआ। सुरक्षाबलों का प्रतिरोध, नागरिकों की एकता और लोकतंत्र की जड़ें और गहरी होती चली गईं।
11. 2015-2019: हाइब्रिड आतंक का नया दौर
o पाकिस्तान ने पारंपरिक घुसपैठ और बड़े स्तर के सैन्य हमलों में असफलता के बाद रणनीति बदली और हाइब्रिड आतंकवाद की शुरुआत की। पाकिस्तान ने सोशल मीडिया को नया हथियार बनाया। स्थानीय कश्मीरी युवाओं को इंटरनेट के ज़रिए जिहाद की ओर मोड़ने की साज़िशें शुरू हुईं। बुरहान वानी जैसे स्थानीय 'पोस्टर बॉय' बनाए गए।
o 2015 के बाद दक्षिण कश्मीर में शोपियां, पुलवामा, अनंतनाग जैसे ज़िलों से स्थानीय आतंकी भर्ती में तेज़ी आई। पथराव और 'मॉब शील्डिंग' (Mob Shielding) की टैक्टिक्स अपनाई जाने लगीं। मुठभेड़ में सुरक्षाबलों के ऑपरेशन के दौरान आतंकी भाग सकें, इसके लिए स्थानीय भीड़ को ढाल के रूप में इस्तेमाल किया जाने लगा। CCTV/जियो टॉवर ब्लास्ट जैसी घटनाएँ, आतंकी इंफ्रास्ट्रक्चर-विरोधी और डिजिटल निगरानी के खिलाफ काम करने लगे।
o स्थानीय युवाओं को कट्टरपंथी विचारों से जोड़कर कश्मीर घाटी में सामाजिक और राजनीतिक अस्थिरता पैदा की गई। सोशल मीडिया, NGOs और देशी-विदेशी मीडिया के माध्यम से आतंकवाद, पत्थरबाज़ी को 'आज़ादी की तहरीक' के रूप में पेश कर वैधता दी गई, नैतिक समर्थन खड़ा किया गया।
o कई आतंकी स्थानीय गाँवों में छिपे, नागरिकों को डराने-धमकाने के लिए बम विस्फोट, गोलीबारी और सड़कों पर ब्लॉकेड लगाए जाने लगे। WhatsApp, TikTok, Facebook, Twitter के ज़रिये फेक न्यूज़, नफरत भरे संदेश और सांप्रदायिक उन्माद फैलाया गया। आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद, लश्कर-ए-तैयबा, हिज़बुल मुजाहिदीन ने इस मॉडल को अपनाकर स्थानीय कमांडरों को खुली छूट दी। ये दौर भारतीय सुरक्षाबलों के लिए भी बड़ी चुनौती बनकर उभरा।
o हालाँकि, इस दौरान आतंकियों का सफ़ाया जारी रहा। बुरहान वानी हिज़बुल मुजाहिदीन का एक बड़ा 'पोस्टर-बॉय' आतंकी बनकर उभरा था, जो सोशल मीडिया पर काफी प्रभावशाली फिगर बन गया था। उसको जुलाई 2016 में शोपियां में सुरक्षाबलों के एनकाउंटर में ढेर कर दिया गया। उसकी मौत के बाद पूरे कश्मीर में व्यापक हड़तालें और दंगे भड़के।
o शाहिद-उल्लाह शाह हिज़बुल मुजाहिदीन का दक्षिण कश्मीर में कमांडर था। वह स्थानीय युवाओं को आतंकवाद में भर्ती करने का प्रमुख चेहरा था। 2017 में पुलवामा में सुरक्षाबलों के साथ मुठभेड़ में उसका एनकाउंटर हुआ। इसके अलावा जमाल भट्ट जैश-ए-मोहम्मद का पुलवामा क्षेत्र का कमांडर था। 2018 में पुलवामा के पास एक एनकाउंटर में वो मारा गया। इस दौरान सुरक्षाबलों ने दर्जनों आतंकी कमांडरों को कथित 'जन्नत' का रास्ता दिखाया।
o लेकिन 14 फरवरी 2019 में एक हमले ने सब कुछ बदल दिया। पाकिस्तान में ट्रेनिंग लेकर आए आतंकी आदिल डार ने अन्य आतंकियों की मदद से CRPF के काफिले पर हमला किया और जिसमें 40 से अधिक जवानों ने वीरगति हासिल की। इस हमले के बाद भारत ने आतंकवाद के खिलाफ अंतिम कार्रवाई का फैसला किया, और जम्मू-कश्मीर में "ऑपरेशन ऑल आउट" शुरू हुआ।
o इस ऑपरेशन में सेना, पुलिस और केंद्रीय एजेंसियों ने मिलकर सक्रिय आतंकियों, उनके समर्थकों और नेटवर्क को निशाना बनाया। अगले 3-4 महीनों में ही कश्मीर में सक्रिय लगभग 500 से अधिक आतंकवादियों को मार गिराया गया, कई अन्य गिरफ्तार किए गए और उनके नेटवर्क को ध्वस्त कर दिया गया।
o आतंकियों की आर्थिक मदद और रूट मैप को खत्म करने के लिए हुर्रियत समेत कई अलगाववादी नेताओं और संदिग्धों को गिरफ्तार कर जेल में डाला गया। इसके कारण अलगाववादी राजनीति कमज़ोर हुई। सुरक्षा एजेंसियों ने सीमा पार से हो रहे फंडिंग, हथियार सप्लाई और प्रचार पर भी सख्त कार्रवाई की। मीरवाइज उमर फारूक, यासिन मलिक, आसिया अंद्राबी, शब्बीर शाह, सैयद अली शाह गिलानी जैसे आतंकी-अलगाववादियों को या तो जेल में डाला गया, उन पर कार्रवाई की गई या फिर नज़रबंद किया गया।
o ज़मीन पर आतंकी नेटवर्क को सपोर्ट करने वाले बड़े संगठन जमात-ए-इस्लामी (जम्मू-कश्मीर) पर प्रतिबंध लगाया, इसके नेताओं को जेल में डाला गया। इसके फंडिंग नेटवर्क पर कार्रवाई की गई। इससे पाकिस्तान-पोषित आतंक के पूरे नेटवर्क की कमर टूट गई।
12. 5 अगस्त 2019: अनुच्छेद 370 का हटना और पाकिस्तान की साजिशों का खात्मा
o 5 अगस्त 2019 को अनुच्छेद 370 और 35ए का संसद से खात्मे के साथ ही, आतंक-अलगाववाद की सोच की ताकत को भी खत्म कर दिया गया। इससे पाकिस्तान को भी बड़ा झटका लगा। पाकिस्तान ने दुनियाभर में रोना-धोना मचाया, लेकिन किसी ने एक न सुनी। यहीं पर पाकिस्तान को भारत की राजनयिक और कूटनीतिक शक्ति का भी अहसास हुआ। यहाँ जम्मू-कश्मीर ने नई सुबह शुरू हुई।
13. पहलगाम हमला और ऑपरेशन सिंदूर: हताश पाकिस्तान का नया पैंतरा और भारत का निर्णायक जवाब
o जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 हटने के बाद विकास, पर्यटन और सामान्य जनजीवन में अभूतपूर्व सुधार देखने को मिला। पर्यटन चरम पर था, 2024 के पहले 6 महीनों में रिकॉर्ड 1.5 करोड़ से ज़्यादा पर्यटक कश्मीर आए थे। कश्मीरी युवा स्टार्टअप, खेल, शिक्षा और टूरिज्म में आगे बढ़ रहे थे। अंतर्राष्ट्रीय मीडिया से कश्मीर को लेकर खबरें आ तो रही थीं, लेकिन बदलते, आगे बढ़ते कश्मीर की। G-20 की मीटिंग्स की खबरें। 15 अगस्त पर इतने झंडे फहराए गए, जितने शेष भारत के किसी अन्य राज्य में भी नहीं दिखाई दिए थे।
o जाहिर है यह सब बात पाकिस्तान और उसके आतंकी आकाओं को खटकने लगी और पहलगाम में टूरिस्टों पर हमला किया गया। धर्म पूछकर निर्दोषों की हत्या की गई। आम कश्मीरी की आर्थिक लाइफलाइन बन चुके टूरिस्टों पर हमला करने की अपने-आप में ये पहली घटना थी। इससे पाकिस्तान की हताशा या छटपटाहट समझ आती है। इस हमले में जैश-ए-मोहम्मद और TRF (द रेजिस्टेंस फ्रंट) की भूमिका सामने आई। इनकी कमान सीधे-सीधे ISI के हाथ में है।
o इस बार भारत ने इंतजार नहीं किया, तैयारी की, लेकिन एक निर्णायक हमला किया पाकिस्तान में मौजूद आतंकी अड्डों पर। नाम दिया गया "ऑपरेशन सिंदूर"। ये कार्रवाई सिर्फ जवाब नहीं था, बल्कि एक "डॉक्ट्रिन बदलाव" था।
o ऑपरेशन सिंदूर के ज़रिये पाकिस्तान के अंदरूनी शहरों में और पीओजेके में बने 9 आतंकी ठिकानों पर टारगेटेड इंटेलिजेंस-ड्रिवन स्ट्राइक की गईं। इस हमले के तहत पाकिस्तान में मौजूद कई आतंकी मॉड्यूल को समाप्त किया गया।
o भारत की ये आक्रामक नीति सिर्फ रक्षा नहीं, ‘एक्टिव डिनायल एंड प्री-एम्पशन’ (Active Denial and Pre-emption) पर आधारित थी, यानी हमला होने से पहले आतंक के ठिकानों को नेस्तनाबूद करना। आतंकियों को, और उनके आकाओं को ये बताना कि अब वो भी, कहीं भी सुरक्षित नहीं रहेंगे। घर में घुसकर वार होगा, और सटीक होगा, निर्णायक होगा।
o ऑपरेशन सिंदूर के ज़रिये इतना बड़ा और साहसिक कार्रवाई, वो भी एक परमाणु शक्ति देश के घर में घुसकर भारत मारेगा, इतना किसी ने नहीं सोचा था। अपनी इज्ज़त बचाने के लिए पाकिस्तान ने ड्रोन अटैक किया ज़रूर, लेकिन उसको भी भारत के अपने आत्मनिर्भर डिफेंस सिस्टम ने नाकामयाब कर दिया। पाकिस्तान के लिए ये और बड़ा झटका था।
o इसके बाद भारत ने पाकिस्तान के कम से कम 11 एयरबेस पर एक साथ हमला किया, मिसाइल, ड्रोन व रॉकेट के ज़रिये। वो भी इस सटीकता के साथ कि पाकिस्तान के डिफेंस रडार सिस्टम को एक-डेढ बल की भी खबर न हुई। यहीं वो क्षण था, जब पाकिस्तान को समझ आया और यूएस के सामने भारत पर स्ट्राइक रोकने के लिए दबाव बनाने की गुहार लगानी पड़ी।
पाकिस्तान कभी रुकेगा नहीं, भारत को पीओजेके की मुक्ति के लिए काम करना है और पाकिस्तान की साज़िश का खात्मा करना है।