
दुनिया भर में फैले कश्मीरी हिंदू 19 जनवरी को ‘महाविनाश दिवस’ (Black Day) के रूप में स्मरण करते हैं। यही वह दिन था, जब पाकिस्तान समर्थित आतंकवादियों ने स्थानीय जिहादी संगठनों की मदद से घाटी के अल्पसंख्यक हिंदू समुदाय को उनकी ही जन्मभूमि से समाप्त कर देने के इरादे से हिंसक हमला बोला। पाकिस्तान से मिले हथियारों, प्रशिक्षण और उकसावे के परिणामस्वरूप आतंकियों ने सुनियोजित ढंग से कश्मीर घाटी में आतंक का राज स्थापित किया।
कश्मीरी हिंदुओं का यह जातीय संहार स्वतंत्र भारत के इतिहास के सबसे काले अध्यायों में से एक है। एक शांतिप्रिय, प्रगतिशील, लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष समुदाय को उसके ही गृह प्रदेश में पूरी तरह खत्म करने का प्रयास किया गया। अलगाववादी ताकतों ने संगठित अभियान चलाकर हिंदुओं को कट्टर शत्रु के रूप में प्रस्तुत किया। उनका मानना था कि कश्मीर में इस्लामी शासन स्थापित करने के मार्ग में कश्मीरी हिंदू सबसे बड़ी बाधा हैं। इसी सोच के तहत आतंक, डर और हिंसा का ऐसा माहौल बनाया गया कि हिंदुओं को घाटी छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा।

कश्मीरी हिंदू आज भी उन दिनों को नहीं भूल सकते, जब उनके पड़ोसी, सहकर्मी और आसपास के लोग जिहादियों के साथ खड़े नजर आए। यही कारण है कि 19 जनवरी उन सभी कश्मीरी हिंदुओं की सामूहिक स्मृति में अंकित है, जिन्हें बंदूक की नोक पर अपने घर-बार छोड़ने पड़े।
दुर्भाग्यवश, भारत सरकार और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने भी इस त्रासदी का उचित संज्ञान नहीं लिया। सैकड़ों हत्याएं, हजारों घरों और मंदिरों को जलाना तथा 5 लाख से अधिक लोगों का विस्थापन - इसके बावजूद इसे औपचारिक रूप से जातीय संहार घोषित नहीं किया गया। एमनेस्टी इंटरनेशनल और एशिया वॉच जैसे अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों ने भी इस त्रासदी को लगभग नजरअंदाज कर दिया, जो उनके दोहरे मानदंडों को उजागर करता है।
वंधामा, नाड़ीमर्ग जैसे स्थानों पर सामूहिक हत्याएं की गईं। मंदिरों को ध्वस्त किया गया, संपत्तियों पर कब्जा किया गया और हिंदुओं के व्यापारिक प्रतिष्ठानों को नष्ट कर दिया गया, ताकि उनकी वापसी असंभव बना दी जाए। यह सब अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार घोषणाओं और संयुक्त राष्ट्र के संकल्पों का खुला उल्लंघन था।
अल्पसंख्यक समुदाय की रक्षा करने में राज्य सरकार पूरी तरह विफल रही। संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और स्वतंत्रता के अधिकार से कश्मीरी हिंदुओं को वंचित कर दिया गया। पुनर्वास के नाम पर अब तक केवल तदर्थ उपाय किए गए। राजनीतिक दलों ने इस त्रासदी को केवल वोट बैंक की राजनीति तक सीमित रखा।
34 वर्ष बीत जाने के बावजूद इस नरसंहार के अपराधियों के खिलाफ कोई ठोस न्यायिक प्रक्रिया शुरू नहीं हुई। हत्यारे आज भी खुलेआम घूम रहे हैं। इस त्रासदी की जांच के लिए न्यूरेम्बर्ग ट्रायल जैसी अंतरराष्ट्रीय स्तर की न्यायिक प्रक्रिया की आवश्यकता है, ताकि पीड़ितों को न्याय मिल सके और इतिहास के साथ न्याय हो। तीन दशकों से अधिक का निर्वासन कश्मीरी हिंदुओं के लिए एक अंतहीन पीड़ा है। समुदाय ने अपनी संस्कृति और परंपराओं को जीवित रखा है, लेकिन अपनी मातृभूमि में सम्मानजनक और सुरक्षित वापसी आज भी एक अधूरा सपना बनी हुई है।