19 जनवरी 1990 #KashmiriHindusExodus : मानवीय इतिहास को वो काला दिन जब घाटी में शुरू हुआ कश्मीरी हिन्दुओं का नरसंहार

पाँच हजार वर्षों के समृद्ध और लिखित इतिहास वाले कश्मीर के मूल निवासी कश्मीरी हिंदुओं को उनके घरों और गांवों से जबरन खदेड़ दिया गया। यह जातीय सफाया (Ethnic Cleansing) कोई अचानक हुई घटना नहीं थी, बल्कि एक नियंत्रित और सुनियोजित प्रक्रिया थी, जो पाकिस्तानी षड्यंत्र का हिस्सा थी।

    19-जनवरी-2026
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KashmiriHindusExodus 19 january 1990
 

दुनिया भर में फैले कश्मीरी हिंदू 19 जनवरी को ‘महाविनाश दिवस’ (Black Day) के रूप में स्मरण करते हैं। यही वह दिन था, जब पाकिस्तान समर्थित आतंकवादियों ने स्थानीय जिहादी संगठनों की मदद से घाटी के अल्पसंख्यक हिंदू समुदाय को उनकी ही जन्मभूमि से समाप्त कर देने के इरादे से हिंसक हमला बोला। पाकिस्तान से मिले हथियारों, प्रशिक्षण और उकसावे के परिणामस्वरूप आतंकियों ने सुनियोजित ढंग से कश्मीर घाटी में आतंक का राज स्थापित किया।

 
5,000 साल पुरानी सभ्यता का उन्मूलन
 
 
पाँच हजार वर्षों के समृद्ध और लिखित इतिहास वाले कश्मीर के मूल निवासी कश्मीरी हिंदुओं को उनके घरों और गांवों से जबरन खदेड़ दिया गया। यह जातीय सफाया (Ethnic Cleansing) कोई अचानक हुई घटना नहीं थी, बल्कि एक नियंत्रित और सुनियोजित प्रक्रिया थी, जो पाकिस्तानी षड्यंत्र का हिस्सा थी। इस षड्यंत्र के तहत ‘जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट’ (JKLF) सहित कई आतंकवादी संगठनों का इस्तेमाल किया गया, जिनका उद्देश्य घाटी को हिंदू-विहीन बनाना था।
 
 
कैसे शुरू हुआ हिंसा का यह दौर?
 

कश्मीरी हिंदुओं का यह जातीय संहार स्वतंत्र भारत के इतिहास के सबसे काले अध्यायों में से एक है। एक शांतिप्रिय, प्रगतिशील, लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष समुदाय को उसके ही गृह प्रदेश में पूरी तरह खत्म करने का प्रयास किया गया। अलगाववादी ताकतों ने संगठित अभियान चलाकर हिंदुओं को कट्टर शत्रु के रूप में प्रस्तुत किया। उनका मानना था कि कश्मीर में इस्लामी शासन स्थापित करने के मार्ग में कश्मीरी हिंदू सबसे बड़ी बाधा हैं। इसी सोच के तहत आतंक, डर और हिंसा का ऐसा माहौल बनाया गया कि हिंदुओं को घाटी छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा।

 
इस जिहादी अभियान में नफरत भरे भाषण, चुन-चुनकर की गई हत्याएं, धमकियां, पोस्टर, मस्जिदों से ऐलान और बम धमाकों का सहारा लिया गया। ये बर्बर अत्याचार वही थे, जिनका सामना नाजी शासन के दौरान यहूदियों ने किया था, फर्क सिर्फ इतना था कि यह सब लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष भारत में हुआ।  पूरी दुनिया मूक दर्शक बनी रही।
 
 
KashmiriHindusExodus 19 january 1990
 
 
पड़ोसियों की चुप्पी और विश्वासघात
 

कश्मीरी हिंदू आज भी उन दिनों को नहीं भूल सकते, जब उनके पड़ोसी, सहकर्मी और आसपास के लोग जिहादियों के साथ खड़े नजर आए। यही कारण है कि 19 जनवरी उन सभी कश्मीरी हिंदुओं की सामूहिक स्मृति में अंकित है, जिन्हें बंदूक की नोक पर अपने घर-बार छोड़ने पड़े।

 
मानवाधिकार संगठनों की चुप्पी
 

दुर्भाग्यवश, भारत सरकार और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने भी इस त्रासदी का उचित संज्ञान नहीं लिया। सैकड़ों हत्याएं, हजारों घरों और मंदिरों को जलाना तथा 5 लाख से अधिक लोगों का विस्थापन - इसके बावजूद इसे औपचारिक रूप से जातीय संहार घोषित नहीं किया गया। एमनेस्टी इंटरनेशनल और एशिया वॉच जैसे अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों ने भी इस त्रासदी को लगभग नजरअंदाज कर दिया, जो उनके दोहरे मानदंडों को उजागर करता है।

 
 
 
 
योजनाबद्ध हिंसा और सांस्कृतिक विनाश
 

वंधामा, नाड़ीमर्ग जैसे स्थानों पर सामूहिक हत्याएं की गईं। मंदिरों को ध्वस्त किया गया, संपत्तियों पर कब्जा किया गया और हिंदुओं के व्यापारिक प्रतिष्ठानों को नष्ट कर दिया गया, ताकि उनकी वापसी असंभव बना दी जाए। यह सब अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार घोषणाओं और संयुक्त राष्ट्र के संकल्पों का खुला उल्लंघन था।

 
राज्य की विफलता और संवेदनहीनता
 

अल्पसंख्यक समुदाय की रक्षा करने में राज्य सरकार पूरी तरह विफल रही। संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और स्वतंत्रता के अधिकार से कश्मीरी हिंदुओं को वंचित कर दिया गया। पुनर्वास के नाम पर अब तक केवल तदर्थ उपाय किए गए। राजनीतिक दलों ने इस त्रासदी को केवल वोट बैंक की राजनीति तक सीमित रखा।

 
 
 
 
न्याय अब भी अधूरा
 

34 वर्ष बीत जाने के बावजूद इस नरसंहार के अपराधियों के खिलाफ कोई ठोस न्यायिक प्रक्रिया शुरू नहीं हुई। हत्यारे आज भी खुलेआम घूम रहे हैं। इस त्रासदी की जांच के लिए न्यूरेम्बर्ग ट्रायल जैसी अंतरराष्ट्रीय स्तर की न्यायिक प्रक्रिया की आवश्यकता है, ताकि पीड़ितों को न्याय मिल सके और इतिहास के साथ न्याय हो।  तीन दशकों से अधिक का निर्वासन कश्मीरी हिंदुओं के लिए एक अंतहीन पीड़ा है। समुदाय ने अपनी संस्कृति और परंपराओं को जीवित रखा है, लेकिन अपनी मातृभूमि में सम्मानजनक और सुरक्षित वापसी आज भी एक अधूरा सपना बनी हुई है।