'ग़ाज़ा बोर्ड ऑफ पीस’ : क्या भारत को बनना चाहिए US के इस प्रस्तावित व्यवस्था का हिस्सा ?

    19-जनवरी-2026
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Gaza Peace Board India Invite
 
Board of Peace on Gazaग़ाज़ा को लेकर अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा प्रस्तावित ‘बोर्ड ऑफ पीस’ केवल एक कूटनीतिक पहल नहीं है, बल्कि यह भारत की विदेश नीति, रणनीतिक स्वायत्तता और वैश्विक भूमिका की भी एक बड़ी परीक्षा है। जिस तरह इस बोर्ड में भारत को शामिल होने का न्योता दिया गया है, वह अपने-आप में इस बात का संकेत है कि आज भारत को दुनिया एक निर्णायक शक्ति के रूप में देखती है। लेकिन सवाल यह नहीं है कि भारत को बुलाया गया है या नहीं सवाल यह है कि क्या भारत को जाना चाहिए?
 
 
भारत की विदेश नीति: संतुलन, स्वायत्तता और सिद्धांत
 
 
भारत की विदेश नीति दशकों से रणनीतिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy) के सिद्धांत पर आधारित रही है। भारत न तो किसी सैन्य गुट का स्थायी हिस्सा रहा है और न ही किसी एक शक्ति के एजेंडे का अनुयायी। यही वजह है कि भारत आज भी इज़राइल और फ़िलिस्तीन दोनों को मान्यता देने वाला एक ऐसा देश है, जिसके दोनों पक्षों से संवाद के द्वार खुले हैं।
 
 
इज़रायल के साथ भारत के गहरे रणनीतिक, रक्षा और तकनीकी संबंध हैं, वहीं फ़िलिस्तीन के लिए भारत ने लगातार मानवीय सहायता, पुनर्निर्माण और संस्थागत सहयोग दिया है। यही संतुलन भारत को विशिष्ट बनाता है। लेकिन ‘बोर्ड ऑफ पीस’ में शामिल होना इस संतुलन को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकता है।
 
 
 
 
 
‘बोर्ड ऑफ पीस’: शांति की पहल या शक्ति का प्रयोग?
 
 
इस प्रस्तावित बोर्ड को जिस तरह से डिज़ाइन किया गया है, उसमें कई गंभीर कूटनीतिक और नैतिक प्रश्न खड़े होते हैं:
 
 
1. संयुक्त राष्ट्र की अनुपस्थिति 
 
ग़ाज़ा जैसे संवेदनशील और अंतरराष्ट्रीय विवाद वाले क्षेत्र में किसी भी शासन-व्यवस्था या संक्रमणकालीन प्रशासन की वैधता सामान्यतः UN Security Council या व्यापक अंतरराष्ट्रीय सहमति से आती है। लेकिन ‘बोर्ड ऑफ पीस’ बिना किसी आधिकारिक अंतरराष्ट्रीय संस्था की मंज़ूरी के बनाया गया ढांचा है। भारत जैसे देश के लिए, जिसने हमेशा नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की वकालत की है, यह एक मूलभूत विरोधाभास है।
 
 
2. एकतरफा नेतृत्व और सीमित सहभागिता
 
इस बोर्ड की अध्यक्षता एक व्यक्ति करेंगे और बाकी देश केवल सदस्य होंगे। यह ढांचा साझा निर्णय प्रक्रिया से अधिक निर्देशात्मक व्यवस्था जैसा दिखता है। भारत की वैश्विक छवि एक ऐसे देश की है जो साझेदारी में विश्वास करता है, अधीनता में नहीं।
 
 
3. वित्तीय और सैन्य प्रतिबद्धता का जोखिम
 
इस बोर्ड का हिस्सा बनने के लिए 1 अरब डॉलर का योगदान और भविष्य में अंतरराष्ट्रीय स्थिरीकरण बल (ISF) के तहत सैन्य भूमिका की संभावना, भारत के लिए यह केवल आर्थिक नहीं, बल्कि रणनीतिक और सुरक्षा जोखिम भी है। विशेष रूप से तब, जब उसी ढांचे में पाकिस्तान और तुर्की जैसे देश शामिल हों। जिनके साथ भारत के संबंध जटिल और कई बार टकरावपूर्ण रहे हैं।
 
 
 
 
 
 
 
भारत की दुविधा
 
 
इज़राइल ने पहले ही तुर्की और क़तर जैसे देशों को इस तरह की किसी व्यवस्था में शामिल किए जाने पर आपत्ति जताई है। तुर्की की हालिया विदेश नीति दक्षिण एशिया में हस्तक्षेप, भारत-विरोधी रुख, पाकिस्तान के साथ बढ़ती रणनीतिक निकटता - इन सभी कारकों को देखते हुए, भारत का उसी मंच पर बैठना जहाँ भारत-विरोधी दृष्टिकोण रखने वाले देश निर्णायक भूमिका में हों, भारत की सुरक्षा और कूटनीति दोनों के लिए असहज स्थिति पैदा कर सकता है।
 
 
भारत की बढ़ती ताकत:
 
 
यह सच है कि भारत आज एक उभरती वैश्विक शक्ति है। अमेरिका, यूरोप और पश्चिम एशिया तीनों के लिए महत्वपूर्ण साझेदार है और अंतरराष्ट्रीय संकटों में एक Responsible Stakeholder के रूप में देखा जाता है। लेकिन महाशक्ति बनने का अर्थ यह नहीं होता कि हर पहल का हिस्सा बना जाए। बल्कि महाशक्ति वही होती है जो यह तय कर सके कि कहाँ शामिल होना है, और कहाँ विनम्र लेकिन स्पष्ट ‘न’ कहना है। भारत पहले भी इराक युद्ध, सीरिया संकट और कई पश्चिमी सैन्य अभियानों में अपने सिद्धांतों के आधार पर दूरी बना चुका है।
 
 
भारत को क्यों सावधान रहना चाहिए?
 
 
यदि भारत इस बोर्ड का हिस्सा बनता है, तो संभावित जोखिम हैं अरब दुनिया में भारत की संतुलित छवि को झटका, फ़िलिस्तीनी जनता के बीच भारत की विश्वसनीयता पर असर, पाकिस्तान के साथ एक ही सैन्य या प्रशासनिक ढांचे में असहज सहभागिता, बिना UN वैधता वाले ढांचे का समर्थन कर भारत की वैश्विक नैतिक स्थिति कमजोर होना, भविष्य में ग़ाज़ा में असफलता की स्थिति में राजनीतिक और सुरक्षा जिम्मेदारी भारत पर भी आना।
 
 
भारत को क्या करना चाहिए?
 
 
भारत को ग़ाज़ा में शांति, पुनर्निर्माण और मानवीय सहायता के प्रयासों का समर्थन करना चाहिए लेकिन बिना वैधता, बिना व्यापक सहमति और बिना स्पष्ट संरचना वाले किसी बोर्ड का हिस्सा बनना भारत की दीर्घकालिक विदेश नीति के अनुरूप नहीं है। भारत की ताकत उसकी स्वतंत्र सोच, संतुलित दृष्टिकोण और सिद्धांत-आधारित निर्णयों में है। शांति थोपकर नहीं लाई जाती, और भारत उस शांति का हिस्सा नहीं बन सकता जिसकी नींव ही विवाद, असंतुलन और एकतरफे निर्णयों पर टिकी हो। आज भारत को बुलाया जाना सम्मान की बात है, लेकिन हर न्योते को स्वीकार करना महानता नहीं, विवेकहीनता होती है। हालाँकि आखिरी निर्णय भारत सरकार को लेना है कि क्या उसे इस 'पीस बोर्ड' का हिस्सा बनना है या नहीं........ 
 
Written By Arnav Mishra