जयंती विशेष | 28 जनवरी 1899 : फील्ड मार्शल के. एम. करिअप्पा - वो योद्धा जिसकी वीरता को भारत ही नहीं, पाकिस्तान भी करता था नमन

    28-जनवरी-2026
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Field Marshal K. M. Cariappa
 
 
भारतीय सेना के इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं, जिनके बिना आज़ादी के बाद भारत की सैन्य गाथा अधूरी लगती है। फील्ड मार्शल कोडंडेरा मडप्पा करिअप्पा उन्हीं महान योद्धाओं में से एक थे। वे न सिर्फ़ भारतीय सेना के पहले भारतीय सेनाध्यक्ष थे, बल्कि अनुशासन, साहस और मानवीय मूल्यों के प्रतीक भी थे। आज करिअप्पा की जयंती है। लिहाजा इस लेख के माध्यम से हम उनसे जुड़े कुछ रोचक किस्से जानेंगे।
 
 
करिअप्पा ने अपने सैन्य जीवन की शुरुआत सेकेंड लेफ्टिनेंट के रूप में की थी। कठिन परिश्रम, रणनीतिक कौशल और नेतृत्व क्षमता के बल पर वे लगातार ऊँचाइयाँ छूते गए। 1947 में जम्मू-कश्मीर में भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान उन्होंने पश्चिमी मोर्चे पर भारतीय सेना का नेतृत्व किया और निर्णायक भूमिका निभाई।
 
 
15 जनवरी 1949 को उन्हें भारतीय सेना का कमांडर-इन-चीफ (सेनाध्यक्ष) नियुक्त किया गया। इसी ऐतिहासिक दिन की स्मृति में हर वर्ष 15 जनवरी को ‘सेना दिवस’ मनाया जाता है। 1953 में करिअप्पा सेना से सेवानिवृत्त हुए, और 94 वर्ष की आयु में 15 मई 1993 को उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कहा।
 
 
भारत-पाकिस्तान युद्ध के नायक
 
 
आज़ादी के तुरंत बाद भारत को पाकिस्तान के आक्रमण का सामना करना पड़ा। इस हमले में जम्मू-कश्मीर का एक बड़ा हिस्सा पाकिस्तान के कब्ज़े में चला गया, जिसे आज पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर (PoJK) कहा जाता है। कम लोग जानते हैं कि युद्ध की शुरुआती स्थिति में पुंछ, राजौरी, कारगिल और द्रास जैसे रणनीतिक क्षेत्र भी पाकिस्तान के कब्ज़े में चले गए थे। भारतीय सेना ने ऑपरेशन किप्पर, ऑपरेशन ईज़ी और ऑपरेशन बाइसन के ज़रिये इन क्षेत्रों को दुश्मन से वापस छीना। इन सभी सैन्य अभियानों का नेतृत्व स्वयं करिअप्पा कर रहे थे। वे आगे बढ़कर पूरे जम्मू-कश्मीर को मुक्त कराना चाहते थे, लेकिन राजनीतिक कारणों से उन्हें केंद्र सरकार से आगे बढ़ने के आदेश नहीं मिले।
 
 
बारामूला : पाकिस्तानी बर्बरता का गवाह
 
 
1947 में पाकिस्तानी सेना और कबायली हमलावरों ने बारामूला शहर को पूरी तरह तबाह कर दिया था। शायद ही कोई ऐसा घर बचा हो जहाँ लूटपाट, हिंसा या अत्याचार न हुआ हो। हिंदू, मुस्लिम और सिख - सभी समुदाय इस बर्बरता के शिकार बने। कहा जाता है कि पाकिस्तानी सेना 300-400 ट्रकों में लूटा हुआ सामान भरकर अपने साथ ले गई थी। जब करिअप्पा की अगुवाई में भारतीय सेना ने करारा जवाब दिया, तो पाकिस्तानी सैनिक कश्मीर छोड़कर भागने लगे।
 
 
इसी दौरान एक दुश्मन टुकड़ी का पीछा करते हुए करिअप्पा स्वयं बारामूला पहुँचे, जहाँ उन्होंने लूट और आतंक की भयावह सच्चाई देखी। उन्हें ऐसे लोग मिले जो कई दिनों से भूखे-प्यासे थे। करिअप्पा ने उनसे वादा किया कि वे उनकी मदद ज़रूर करेंगे।
अगले ही दिन वे आटा, दाल और चावल लेकर दोबारा बारामूला लौटे और अपना वादा निभाया। इस मानवीय व्यवहार ने बारामूला के लोगों के दिलों में करिअप्पा के प्रति गहरा सम्मान पैदा किया। बाद में वहाँ करिअप्पा के नाम पर एक पार्क बनाया गया, जो आज भी उनकी स्मृति का प्रतीक है।
 
 
अयूब ख़ान के बॉस रह चुके थे करिअप्पा
 
 
यह इतिहास का एक दिलचस्प और गौरवपूर्ण तथ्य है कि पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति और सेनाध्यक्ष जनरल अयूब ख़ान, कभी करिअप्पा के अधीन अधिकारी रह चुके थे। अयूब ख़ान यह बात आज़ादी के बाद भी नहीं भूले। 1965 के भारत-पाक युद्ध के दौरान करिअप्पा के बेटे के. सी. करिअप्पा, जो भारतीय वायुसेना में फ्लाइट लेफ्टिनेंट थे, का विमान पाकिस्तान में गिर गया। उन्होंने पैराशूट से कूदकर अपनी जान बचाई, लेकिन वे पाकिस्तानी कैद में चले गए। जब अयूब ख़ान को यह पता चला कि कैद पायलट फील्ड मार्शल करिअप्पा का बेटा है, तो वे स्वयं उनसे मिलने पहुँचे। अयूब ख़ान ने करिअप्पा को फोन कर उनके बेटे को तुरंत रिहा करने का प्रस्ताव दिया।
 
 
लेकिन करिअप्पा ने वह प्रस्ताव ठुकरा दिया और ऐतिहासिक शब्दों में कहा -
 
 
“वह केवल मेरा बेटा नहीं है, वह भारत माता का सपूत है। उसके साथ भी वही व्यवहार किया जाए, जो अन्य युद्धबंदियों के साथ किया जाता है।” युद्ध समाप्ति के बाद, अन्य युद्धबंदियों के साथ के. सी. करिअप्पा को भी रिहा कर दिया गया। फील्ड मार्शल के. एम. करिअप्पा न केवल एक महान सेनानायक थे, बल्कि चरित्र, कर्तव्य और राष्ट्रभक्ति की जीवंत मिसाल भी थे।
 
 
उनकी जयंती पर उस योद्धा को नमन, जिसकी वीरता का सम्मान दुश्मन भी करता था।