स्वतंत्र भारत के इतिहास में जम्मू-कश्मीर का प्रश्न केवल भू-राजनीतिक या संवैधानिक नहीं रहा, बल्कि वह लंबे समय तक राष्ट्र-राज्य की अवधारणा, नागरिक अधिकारों और लोकतांत्रिक मूल्यों की परीक्षा का केंद्र बना रहा। भारत का अभिन्न अंग होते हुए भी जम्मू-कश्मीर दशकों तक ऐसी नीतियों के अधीन रहा, जिनका परिणाम राजनीतिक अलगाव, संस्थागत असमानता और राष्ट्रवादी अभिव्यक्ति के दमन के रूप में सामने आया।
यह ऐतिहासिक तथ्य है कि स्वतंत्रता के उपरांत जिस समय भारत के अधिकांश हिस्सों में राष्ट्रीय एकीकरण की प्रक्रिया तेज़ी से आगे बढ़ रही थी, उसी समय जम्मू-कश्मीर में एक भिन्न और विरोधाभासी राजनीतिक संरचना विकसित की जा रही थी। “दो विधान, दो प्रधान और दो निशान” की अवधारणा केवल प्रशासनिक व्यवस्था नहीं थी; यह उस वैचारिक विभाजन का प्रतीक थी, जिसने राज्य को शेष भारत से मनोवैज्ञानिक रूप से अलग करने का कार्य किया।
प्रजा परिषद आंदोलन: संवैधानिक समानता की माँग
इसी पृष्ठभूमि में 1947 से 1953 के बीच उभरा प्रजा परिषद आंदोलन, जिसे स्वतंत्र भारत का पहला संगठित जनांदोलन कहा जा सकता है, जिसका लक्ष्य किसी सरकार का पतन नहीं, बल्कि संवैधानिक समानता और राष्ट्रीय एकीकरण था। आंदोलन की मूल माँग सरल किंतु दूरगामी थी भारतीय संविधान का संपूर्ण और समान रूप से जम्मू-कश्मीर में लागू होना।
प्रजा परिषद आंदोलन का महत्व इस बात में निहित है कि यह न तो अलगाववादी था और न ही हिंसक। यह आंदोलन भारतीय संघ के भीतर रहकर, उसी के संवैधानिक ढांचे में समान अधिकारों की माँग करता था। श्री प्रेमनाथ डोगरा के नेतृत्व में यह आंदोलन जम्मू क्षेत्र में जनचेतना का स्वर बना, जबकि डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने इसे राष्ट्रीय विमर्श का विषय बनाकर पूरे देश का समर्थन दिलाया।
अनुच्छेद 370 और राजनीतिक संरक्षण का प्रश्न
1950 में भारतीय संविधान में अनुच्छेद 370 का समावेश अस्थायी व्यवस्था के रूप में किया गया था, किंतु व्यवहार में यह स्थायित्व और राजनीतिक विशेषाधिकार का माध्यम बन गया। यह निर्विवाद है कि इस प्रावधान ने जम्मू-कश्मीर में एक ऐसी संवैधानिक असमानता को जन्म दिया, जहाँ भारतीय नागरिकों के मूल अधिकार राज्य की सीमाओं में सीमित हो गए।
उस कालखंड में शेख अब्दुल्ला की सरकार को केंद्र से प्राप्त राजनीतिक संरक्षण ने राज्य सत्ता को लगभग निरंकुश बना दिया। राष्ट्रवादी प्रतीकों विशेषकर भारतीय तिरंगे को सार्वजनिक रूप से व्यक्त करना राजनीतिक अवज्ञा के रूप में देखा जाने लगा। शांतिपूर्ण विरोध, असहमति और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, जो किसी भी लोकतंत्र की आत्मा होती है, उन्हें कठोर दमन का सामना करना पड़ा।
जोरियाँ हत्याकांड:
30 जनवरी 1953 को घटित जोरियाँ हत्याकांड इसी दमनकारी नीति का सबसे स्पष्ट और दुखद उदाहरण है। अखनूर तहसील के जोरियाँ कस्बे में नागरिकों का एक समूह केवल भारतीय राष्ट्रीय ध्वज फहराने के उद्देश्य से एकत्र हुआ था। यह कोई विद्रोह नहीं था, न ही कोई हिंसक प्रयास बल्कि संवैधानिक राष्ट्रवाद की शांत अभिव्यक्ति थी।
इसके उत्तर में राज्य बलों द्वारा पहले आंसू गैस और फिर सीधी गोलीबारी की गई। इस कार्रवाई में सात नागरिकों की मृत्यु हुई जिनका अपराध केवल इतना था कि उन्होंने अपने ही देश के प्रतीक को सार्वजनिक रूप से सम्मानित करने का साहस किया। इसके पश्चात आसपास के क्षेत्रों में की गई दमनात्मक कार्रवाइयों ने स्पष्ट कर दिया कि उद्देश्य केवल भीड़ को तितर-बितर करना नहीं, बल्कि भय के माध्यम से असहमति को समाप्त करना था।
इस निर्मम फायरिंग में सात वीर राष्ट्रभक्तों ने बलिदान दिया-
नानक चाँद
बसंत राम
बलदेव सिंह राठी
सैन सिंह
वर्यम सिंह
त्रिलोक सिंह प्रग्वाल
(स्मृतियाँ आज भी इस भूमि में जीवित हैं)
इतिहास, स्मृति और परिवर्तन
जोरियाँ हत्याकांड कोई पृथक घटना नहीं थी यह उस राजनीतिक संस्कृति का हिस्सा था, जिसमें राष्ट्रवादी असहमति को वैध नहीं माना जाता था। किंतु इतिहास का नियम है कि दमन दीर्घकाल तक टिक नहीं पाता। समय के साथ परिस्थितियाँ बदलीं, नीतियाँ बदलीं और जम्मू-कश्मीर का राष्ट्रीय विमर्श भी परिवर्तित हुआ।
आज जम्मू-कश्मीर में भारतीय राष्ट्रीय ध्वज का सार्वजनिक रूप से फहराया जाना न केवल सामान्य है, बल्कि लोकतांत्रिक अधिकार का स्वाभाविक विस्तार भी है। यह परिवर्तन उन लोगों के बलिदान की स्मृति से जुड़ा है, जिन्होंने संवैधानिक समानता के लिए अपना जीवन तक अर्पित कर दिया।
निष्कर्ष
जोरियाँ हत्याकांड को केवल एक स्थानीय घटना के रूप में देखना ऐतिहासिक भूल होगी। यह घटना हमें यह स्मरण कराती है कि राष्ट्रीय एकता केवल संवैधानिक प्रावधानों से नहीं, बल्कि उन नागरिकों के साहस और बलिदान से निर्मित होती है, जो समान अधिकारों की माँग को राष्ट्रविरोध नहीं, बल्कि राष्ट्रनिर्माण मानते हैं। आज जब जम्मू-कश्मीर में राष्ट्रीय प्रतीकों की स्वीकृति स्वाभाविक प्रतीत होती है, तब यह आवश्यक है कि हम उस अतीत को भी समझें जिसमें इन्हीं प्रतीकों के लिए नागरिकों को अपने प्राण देने पड़े। जोरियाँ के शहीद भारतीय लोकतंत्र के उस मौन अध्याय के साक्ष्य हैं, जिसे स्मरण किया जाना चाहिए समझने के लिए, न कि भुलाने के लिए।