जम्मू-कश्मीर के लिए गर्व का क्षण है। केंद्रीय कैबिनेट ने शुक्रवार (30 जनवरी, 2026) को कठुआ जिले के रेलवे स्टेशन का नाम बदलकर ‘शहीद कैप्टन सुनील कुमार चौधरी कठुआ रेलवे स्टेशन’ रखने को मंज़ूरी दे दी। लंबे समय से की जा रही मांग को स्वीकार करते हुए केंद्र की मोदी सरकार ने यह ऐतिहासिक निर्णय लिया।
इसकी जानकारी केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर साझा की और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह तथा रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव का आभार जताया। इससे पहले जम्मू-कश्मीर के उधमपुर रेलवे स्टेशन का नाम भी शहीद कैप्टन तुषार महाजन के नाम पर रखा जा चुका है।
बलिदानी कैप्टन सुनील कुमार चौधरी का परिचय
कैप्टन सुनील कुमार चौधरी का जन्म 22 जून 1980 को जम्मू-कश्मीर के कठुआ ज़िले के गोविंदसर गांव में हुआ। वे एक सैन्य परिवार से थे उनके पिता लेफ्टिनेंट कर्नल पी.एल. चौधरी भारतीय सेना में सेवाएं दे चुके हैं। अनुशासन, देशभक्ति और सेवा की भावना उन्हें विरासत में मिली।पढ़ाई के दौरान वे खेलों में भी अव्वल रहे और स्विमिंग में जूनियर नेशनल स्तर तक पहुंचे। एमबीए की पढ़ाई के दौरान एनडीए में प्रशिक्षण ले रहे अपने भाई से मिलने के दौरान कैप्टन मनोज कुमार पांडेय की प्रतिमा से प्रेरित होकर उन्होंने सेना में जाने का निर्णायक फैसला लिया।
शौर्यगाथा
संयुक्त रक्षा सेवा (CDS) परीक्षा पास कर वे 1 जुलाई 2003 को भारतीय सैन्य अकादमी पहुंचे और 10 दिसंबर 2004 को 11 गोरखा राइफल्स की 7/11 बटालियन में कमीशन हुए। असम के उग्रवाद प्रभावित क्षेत्रों में तैनाती के दौरान उन्होंने ULFA के शीर्ष आतंकियों के खिलाफ साहसिक अभियानों का नेतृत्व किया, जिससे उग्रवादी गतिविधियों को बड़ा झटका लगा। उनकी बहादुरी से घबराकर आतंकियों ने उन्हें निशाने पर भी रखा।
27 जनवरी 2008: अदम्य साहस का अंतिम अध्याय
26 जनवरी 2008 को असम में एक सफल अभियान के लिए उन्हें सेना मेडल से सम्मानित किया गया। लेकिन अगले ही दिन, 27 जनवरी को, उन्हें रंगागढ़ गांव में आतंकियों की मौजूदगी की सूचना मिली। सम्मान समारोह को छोड़कर उन्होंने ऑपरेशन को प्राथमिकता दी।
भारी गोलीबारी के बीच आगे बढ़ते हुए उन्होंने एक आतंकी को ढेर किया। गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद वे रुके नहीं दूसरे आतंकी को घायल किया और अंततः तीसरे आतंकी को आमने-सामने की मुठभेड़ में मार गिराया। इसी दौरान वे वीरगति को प्राप्त हुए। महज़ 27 वर्ष की उम्र में उन्होंने देश के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया। उनकी अद्वितीय वीरता और सर्वोच्च बलिदान के लिए उन्हें मरणोपरांत कीर्ति चक्र, देश का दूसरा सर्वोच्च शांतिकालीन वीरता सम्मान, प्रदान किया गया।
स्मृति को सम्मान
कठुआ रेलवे स्टेशन का नाम बलिदानी कैप्टन सुनील कुमार चौधरी के नाम पर रखा जाना न सिर्फ़ उनके बलिदान को सच्ची श्रद्धांजलि है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को यह याद दिलाने वाला संदेश भी है कि राष्ट्र की रक्षा के लिए अपने प्राण न्योछावर करने वाले वीर कभी भुलाए नहीं जाते।