2026: क्या दुनिया कर रही है नए युद्धों के दौर में प्रवेश ?

05 Jan 2026 15:50:27
 
World Conflict in 2026 report USA
 
New Global Conflicts Incoming : अगर 2025 को दुनिया ने युद्धों और अशांति के एक कठिन वर्ष के रूप में देखा है, तो 2026 उससे भी अधिक बेचैन करने वाला दिखाई देता है। इतिहास बताता है कि बड़े युद्ध अचानक नहीं होते, वे वर्षों की आर्थिक थकान, सत्ता-संघर्ष, पहचान की राजनीति, कूटनीतिक विफलताओं और सैन्य तैयारी की परतों के नीचे पकते रहते हैं। 2026 उसी संक्रमण का वर्ष बनता दिख रहा है, जहाँ पुराने संघर्ष सड़ चुके हैं और नए विस्फोटक बिंदु आकार ले चुके हैं।
 
 
Council on Foreign Relations (CFR) की “Conflicts to Watch in 2026” रिपोर्ट इसी व्यापक बेचैनी की ओर संकेत करती है। यह रिपोर्ट विशेषज्ञों के सर्वे के आधार पर संभावित संघर्षों का जोखिम-आकलन प्रस्तुत करती है- कहाँ हिंसा बढ़ सकती है, कौन से नए संकट उभर सकते हैं और उनका अमेरिकी हितों पर क्या प्रभाव पड़ेगा। यह ध्यान रखना ज़रूरी है कि CFR अमेरिकी प्रतिष्ठान (establishment) की सोच को प्रतिबिंबित करता है, लेकिन यह अमेरिकी सरकार का आधिकारिक रुख नहीं होता। फिर भी, व्हाइट हाउस, पेंटागन और कांग्रेस में इसकी रिपोर्टों को गंभीरता से पढ़ा जाता है।
 
 
यह लेख किसी एक रिपोर्ट का अनुवाद नहीं है। यह भू-राजनीति, शक्ति-संतुलन, सैन्य पहुँच और रणनीतिक हितों के आधार पर 2026 के संभावित युद्ध-दृश्य का स्वतंत्र विश्लेषण है।
 
 
 
 
 
 
1. 2026 क्यों अलग और अधिक खतरनाक है?
 
 
दुनिया आज उस बिंदु पर खड़ी है जहाँ युद्ध की परिभाषा बदल चुकी है। 2026 को जोखिमपूर्ण बनाने वाले पाँच बड़े कारक स्पष्ट दिखते हैं:
 
 
पहला, Multi-polar World : अब दुनिया किसी एक महाशक्ति के नियंत्रण में नहीं है। अमेरिका, चीन, रूस, क्षेत्रीय शक्तियाँ सब अपनी-अपनी सीमाओं में शक्ति का प्रयोग कर रहे हैं। इससे टकराव की संभावना बढ़ती है, क्योंकि कोई एक “नियम-निर्माता” नहीं बचा।
 
 
दूसरा, वैश्विक संस्थाओं की कमजोरी: संयुक्त राष्ट्र, कूटनीति और अंतरराष्ट्रीय संधियाँ पहले जैसी प्रभावी नहीं रहीं। वीटो, ध्रुवीकरण और अविश्वास ने सामूहिक सुरक्षा को खोखला कर दिया है।
 
 
तीसरा, आंतरिक अस्थिरता: दुनिया भर में विरोध-प्रदर्शन, तख्तापलट, अलगाववाद और पहचान-आधारित राजनीति तेज़ हुई है। आंतरिक संकट अक्सर बाहरी युद्धों को जन्म देते हैं।
 
 
चौथा, प्रॉक्सी युद्धों का सामान्यीकरण: प्रत्यक्ष युद्ध के बजाय दूसरे देशों के भीतर या सीमाओं पर प्रतिनिधि समूहों के ज़रिये लड़ाइयाँ लड़ी जा रही हैं।
 
 
5वाँ, तकनीक और युद्ध का मेल: ड्रोन, साइबर हमले, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और सूचना-युद्ध ने संघर्ष को तेज़, सस्ता और कम-घोषित बना दिया है। अब युद्ध ‘घोषणा’ से नहीं, किसी एक घटना (incident) से शुरू होते हैं।
 

World Conflict in 2026 report USA 
 
2. मध्य पूर्व: दोस्ती नहीं, सिर्फ़ हित
 
 
मध्य पूर्व में गठबंधन स्थायी नहीं होते केवल हित स्थायी होते हैं। इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण आज यमन है। यमन अब सिर्फ़ एक गृहयुद्ध नहीं, बल्कि सऊदी अरब और यूएई के बीच प्रभाव-संघर्ष का मैदान बन चुका है। यूएई दक्षिणी अलगाववादी समूह Southern Transitional Council (STC) का समर्थन करता है, जबकि सऊदी अरब एक एकीकृत, केंद्रीकृत यमन चाहता है। दोनों के रणनीतिक लक्ष्य अब टकरा रहे हैं।
 
 
30 दिसंबर 2025 को सऊदी अरब ने यमन के दक्षिणी बंदरगाह शहर मुकल्ला में हवाई हमला किया। सऊदी का दावा था कि वहाँ उतारे जा रहे हथियार और सैन्य वाहन यूएई से आए थे और STC को दिए जा रहे थे। इसके बाद यमन की Presidential Leadership Council ने यूएई की सेना को 24 घंटे में देश छोड़ने का आदेश दिया और सुरक्षा समझौते रद्द कर दिए।
 
 
यूएई ने जवाब में अपनी शेष सेना निकालने की घोषणा की और हथियार भेजने के आरोपों से इनकार किया। वहीं ईरान समर्थित हूथी समूहों ने आपातकाल जैसे कदम उठाए। यह खुला युद्ध नहीं, लेकिन Strategic Divorce है, जिसका असर 2026 में रेड सी, हॉर्न ऑफ अफ्रीका और वैश्विक शिपिंग रूट्स तक दिख सकता है।
 
 
3. Somaliland: नया संघर्ष नहीं, नया ‘प्राइज’
 
 
Somaliland कोई नया देश नहीं, बल्कि एक नया रणनीतिक पुरस्कार बन चुका है। 1991 से यह de-facto स्वतंत्र है—अपनी मुद्रा, सेना और चुनावों के साथ—लेकिन अंतरराष्ट्रीय मान्यता के बिना।
 
  
क्यों अचानक महत्वपूर्ण?
 
 
Somaliland Bab-el-Mandeb चोक-पॉइंट के पास बैठा है, जहाँ से दुनिया के 12–15% समुद्री व्यापार का प्रवाह होता है। जो इस क्षेत्र में मौजूद होगा, वही ऊर्जा मार्गों, सैन्य लॉजिस्टिक्स और शिपिंग सुरक्षा पर प्रभाव डालेगा। Berbera Port यहाँ की असली कुंजी है। UAE की कंपनी DP World ने इसे आधुनिक बनाया और इथियोपिया से जोड़ने वाला कॉरिडोर विकसित किया। यह Djibouti का विकल्प और रेड सी की ‘लॉजिस्टिक्स इंश्योरेंस’ बनता जा रहा है।
 
 
शक्ति-संतुलन में Somaliland
 
 
UAE इसे रणनीतिक संपत्ति मानता है बेस, पोर्ट और इंटेलिजेंस के लिए। Saudi Arabia सार्वजनिक रूप से सोमालिया की अखंडता का समर्थन करता है, लेकिन निजी तौर पर Somaliland की उपयोगिता को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता। Iran इसे शत्रुतापूर्ण ‘लिसनिंग पोस्ट’ मानता है और अप्रत्यक्ष दबाव की नीति अपनाता है। यह क्षेत्र सीधे युद्ध का मैदान नहीं बनेगा, लेकिन शांत प्रतिस्पर्धा (Quiet Contest) का केंद्र रहेगा।
 
 
भारत के लिए मायने
 
 
रेड सी भारत की व्यापारिक धमनी है यूरोप, अफ्रीका और ऊर्जा आयात इसी मार्ग से आते हैं। Somaliland में चीन अपेक्षाकृत कमजोर है, जो भारत के लिए Quiet Engagement और समुद्री सहयोग का अवसर देता है।
 
 
4. अमेरिका और वेनेजुएला: गुस्से का नहीं, गणना का सवाल
 
 
अमेरिका किसी देश पर भावनाओं में हमला नहीं करता। हमला तभी होता है जब रणनीतिक लाभ, घरेलू राजनीति और प्रबंधनीय जोखिम—तीनों शर्तें पूरी हों। वेनेजुएला इन तीनों पर फिट बैठता है। वेनेजुएला का मुद्दा सिर्फ़ तेल नहीं, बल्कि पश्चिमी गोलार्ध में नियंत्रण है। चीन और रूस की मौजूदगी अमेरिका की Monroe Doctrine को चुनौती देती है। कमजोर अर्थव्यवस्था, विभाजित समाज और सीमित सैन्य क्षमता इसे अमेरिका की नजर में ‘easy target’ बनाती है।
 
 
संभावित मॉडल पूर्ण युद्ध नहीं, बल्कि एयर स्ट्राइक्स, साइबर हमले, शासन अस्थिरता और सीमित हस्तक्षेप का होगा—तेज़, सर्जिकल और आंशिक रूप से नकारे जा सकने वाला।
 
 
5. ईरान-इज़राइल-अमेरिका: नियंत्रित अराजकता
 
 
ईरान अंदर से आर्थिक दबाव और सामाजिक असंतोष से जूझ रहा है, बाहर इज़राइल उसे अस्तित्वगत खतरा मानता है। अमेरिका प्रत्यक्ष युद्ध नहीं चाहता, लेकिन सीमित हमलों का विकल्प खुला रखता है। 2026 में खतरा किसी गलत आकलन (miscalculation) से पैदा होगा—एक छोटा हमला, जो क्षेत्रीय श्रृंखला प्रतिक्रिया में बदल सकता है।
 
 
6. चीन–ताइवान: युद्ध से पहले की अवस्था
 
 
चीन का लक्ष्य तत्काल आक्रमण नहीं, बल्कि घेराबंदी और थकान है- मनोवैज्ञानिक दबाव, आर्थिक संकुचन और सैन्य थकावट। 2026 में जोखिम किसी दुर्घटना से है गलत मिसाइल लॉक, विमान घटना- जो सीधे टकराव में बदल सकती है।
 
 
7. दक्षिण एशिया और अन्य फ्लैशपॉइंट्स
 
 
पाकिस्तान–तालिबान: वैचारिक नहीं, सुरक्षा-संघर्ष। पूर्ण युद्ध नहीं, लेकिन स्थायी अस्थिरता।
 
भारत–बांग्लादेश: सैन्य युद्ध नहीं, बल्कि नैरेटिव, सीमा और आंतरिक राजनीति का दबाव।
 
थाईलैंड–कंबोडिया: छोटे दिखने वाले, लेकिन राष्ट्रवाद से भरे टकराव, जो अचानक फैल सकते हैं।
 
अफ्रीका: कोई एक युद्ध नहीं, बल्कि खंडित युद्ध-इकोसिस्टम—सोमालिया, सूडान, साहेल। दुनिया का सबसे बड़ा लेकिन सबसे कम कवर्ड संकट।
 
 
8. रूस–यूक्रेन: अंत नहीं, थकावट
 
 
यह युद्ध अब क्षेत्र का नहीं, बल्कि सहनशक्ति का है—कौन अर्थव्यवस्था बचा सकता है, कौन सहयोगियों को जोड़े रख सकता है। 2026 में यह खत्म नहीं होगा, बल्कि सामान्यीकृत (normalized) हो जाएगा।
 
 
अंतिम विश्लेषण: 2026 का असली खतरा
 
 
2026 का सबसे बड़ा जोखिम कोई एक विश्वयुद्ध नहीं, बल्कि एक साथ कई सीमित युद्ध हैं। हर संघर्ष अकेले में वैश्विक नहीं होगा, लेकिन उनका संयुक्त प्रभाव दुनिया को अस्थिर कर देगा। इतिहास शायद यही पूछेगा: क्या 2026 वह साल था जब दुनिया ने चेतावनियों को नज़रअंदाज़ किया? या वह साल, जब युद्ध ‘अपवाद’ नहीं, बल्कि ‘रूटीन’ बन गया?
 
 
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