Iran Protest : आधी रात सुलग उठा ईरान ; खामनेई के खिलाफ विद्रोह, भड़की हिंसा के पीछे किसका हाथ ?

09 Jan 2026 12:49:05

Iran Protest
 
ईरान एक बार फिर इतिहास के ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां सड़कों पर गूंजते नारे सिर्फ महंगाई और बेरोजगारी के खिलाफ नहीं हैं, बल्कि 47 साल पुराने इस्लामिक शासन की वैधता को सीधी चुनौती दे रहे हैं। बीते 11 दिनों से जारी जन-आंदोलन ने यह साफ कर दिया है कि यह केवल रोटी-रोज़गार का सवाल नहीं रहा, बल्कि सत्ता परिवर्तन की आहट बन चुका है।
 
 
हिंसा की आग में जल रहे सभी प्रांत  
 
 
28 दिसंबर 2025 को तेहरान के बाज़ारों से उठी असंतोष की चिंगारी देखते-देखते पूरे देश में आग बनकर फैल गई। ईरानी मुद्रा रियाल ऐतिहासिक निचले स्तर पर है, महंगाई 40 प्रतिशत के पार जा चुकी है, और युवाओं में बेरोज़गारी 25 प्रतिशत के आसपास मंडरा रही है। जनता का गुस्सा स्वाभाविक था, लेकिन शासन की सख्ती ने इस असंतोष को विद्रोह में बदल दिया।
 
 
अमेरिका स्थित मानवाधिकार संगठन HRANA के अनुसार, आंदोलन ईरान के सभी 31 प्रांतों के 111 शहरों तक फैल चुका है। अब तक कम से कम 34 प्रदर्शनकारी और चार सुरक्षाकर्मी मारे जा चुके हैं, जबकि 2,200 से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया गया है। कई जगहों पर हिंसक झड़पों के वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हैं, जो शासन की घबराहट और जनता के आक्रोश दोनों को उजागर करते हैं।
 
 
 
 
 
खामेनेई के खिलाफ नारेबाजी 
 
 
शुरुआत में महंगाई और बेरोज़गारी के खिलाफ उठी आवाज़ें अब सीधे सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई के खिलाफ हो चुकी हैं। ‘मौत हो खामेनेई को’ और ‘इस्लामिक रिपब्लिक को मौत’ जैसे नारे यह संकेत दे रहे हैं कि जनता अब सुधार नहीं, बदलाव चाहती है। कई शहरों में ‘जाविद शाह’ और ‘पहलवी वापस आएंगे’ जैसे नारे भी सुनाई दे रहे हैं—जो 1979 की इस्लामिक क्रांति से पहले के ईरान की याद दिलाते हैं।
 
 
 
 
 
रेजा पहलवी: विकल्प या मोहरा?
 
 
इसी बिंदु पर ईरान के निर्वासित क्राउन प्रिंस रेजा पहलवी का नाम केंद्र में आता है। 65 वर्षीय रेजा, अपदस्थ शाह मोहम्मद रेजा पहलवी के पुत्र हैं और अमेरिका में निर्वासन में रहते हैं। हाल के दिनों में उन्होंने वीडियो संदेश जारी कर ईरानी जनता से सड़कों पर उतरने की अपील की। इसके बाद ही कई शहरों में प्रदर्शन अचानक उग्र हो गए।
 
 
रेजा पहलवी खुद को एक धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक विकल्प के रूप में पेश कर रहे हैं। युवाओं और जेन-जी वर्ग के बीच यह धारणा बन रही है कि पहलवी की वापसी से ईरान को आर्थिक स्थिरता, वैश्विक स्वीकार्यता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता मिल सकती है। लेकिन बड़ा सवाल यही है - क्या वह वास्तव में जनता की आवाज़ हैं, या किसी बड़ी भू-राजनीतिक चाल का हिस्सा?
 
 
 
 
 
अमेरिका का हाथ ? 
 
 
ईरान सरकार इस पूरे आंदोलन को विदेशी साजिश बता रही है, और इसमें अमेरिका तथा इज़राइल की भूमिका का आरोप लगा रही है। विश्लेषकों का मानना है कि वॉशिंगटन इस संकट को ‘रिजीम चेंज’ के अवसर के रूप में देख रहा है। डोनाल्ड ट्रंप पहले भी ईरान को वेनेज़ुएला मॉडल पर देखने की बात कर चुके हैं।
 
 
ऐसे में रेजा पहलवी को ट्रंप का ‘विभीषण’ कहा जा रहा है एक ऐसा अंदरूनी चेहरा, जो बाहर से सत्ता को गिराने में मदद कर सकता है। अगले हफ्ते ट्रंप और रेजा की संभावित मुलाकात को इसी संदर्भ में देखा जा रहा है। ट्रंप का मकसद खामेनेई की सत्ता को कमजोर करना है, जबकि रेजा की आकांक्षा ईरान में अपनी राजनीतिक वापसी।
 
 
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यूरोप का समर्थन और अंतरराष्ट्रीय दबाव
 
 
ईरान की सड़कों पर उठते इस विद्रोह को यूरोप से भी समर्थन मिलने लगा है। स्वीडन के प्रधानमंत्री उल्फ क्रिस्टर्सन और बेल्जियम के प्रधानमंत्री बार्ट डी वेवर ने खुलकर प्रदर्शनकारियों के पक्ष में बयान दिए हैं। यह समर्थन ईरान पर अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ा सकता है, खासकर तब जब इंटरनेट बंदी और दमन की खबरें लगातार सामने आ रही हों।
 
 
डूबती अर्थव्यवस्था संकट की जड़
 
 
ईरान की अर्थव्यवस्था तेल निर्यात पर अत्यधिक निर्भर है। 2024 में जहां कुल निर्यात 22.18 बिलियन डॉलर रहा, वहीं आयात 34.65 बिलियन डॉलर तक पहुंच गया। 2025 में प्रतिबंधों और तेल निर्यात में गिरावट के कारण व्यापार घाटा 15 बिलियन डॉलर के करीब पहुंच चुका है। चीन ईरान का सबसे बड़ा ग्राहक है, जो उसके लगभग 90 प्रतिशत तेल का आयात करता है।
 
 
सरकार ने INSTC कॉरिडोर और यूरेशियन इकोनॉमिक यूनियन जैसे विकल्पों के जरिए व्यापार बढ़ाने की कोशिश की है, लेकिन प्रतिबंधों के रहते जीडीपी वृद्धि 0.3 प्रतिशत से आगे नहीं बढ़ पा रही। साफ है जब तक प्रतिबंध नहीं हटते या परमाणु समझौता बहाल नहीं होता, रियाल और अर्थव्यवस्था को संभालना मुश्किल रहेगा।
 
 
 
 
 
खतरे में खामनेई की सत्ता !
 
 
1979 में अयातुल्ला खुमैनी के नेतृत्व में आई इस्लामिक क्रांति ने शाह की सत्ता को उखाड़ फेंका था। खुमैनी के बाद 1989 से अयातुल्ला अली खामेनेई सत्ता में हैं लगातार 37 वर्षों से। आज वही सत्ता सबसे बड़े जनाक्रोश का सामना कर रही है। ईरान की सड़कों पर जो हो रहा है, वह सिर्फ एक और विरोध-प्रदर्शन नहीं है। यह उस पीढ़ी की पुकार है, जिसने महंगाई, प्रतिबंध और धार्मिक सख्ती के सिवा कुछ नहीं देखा। सवाल यह नहीं है कि ईरान में आग क्यों लगी—सवाल यह है कि क्या यह आग खामेनेई की सत्ता को जला पाएगी, या एक बार फिर दमन की राख में दबा दी जाएगी। आने वाले हफ्ते तय करेंगे कि ईरान इतिहास बदलने जा रहा है या इतिहास खुद को दोहराएगा।
 
 
 
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