संघर्ष समिति ने स्पष्ट किया कि यह आंदोलन किसी समुदाय के विरोध में नहीं, बल्कि सनातन परंपराओं, धार्मिक मर्यादा और देव-द्रव्य की शुद्धता की रक्षा के लिए था। समिति का कहना है कि माता वैष्णो देवी जैसे विश्वविख्यात शक्तिपीठ से जुड़े संस्थानों में हर निर्णय श्रद्धालुओं की भावना और शास्त्रीय मर्यादा के अनुरूप होना चाहिए।
45 दिनों का आंदोलन और निर्णायक फैसला
संघर्ष समिति के अनुसार, पिछले 45 दिनों में यह मुद्दा जम्मू-कश्मीर तक सीमित न रहकर पूरे देश के सनातन समाज का विषय बन गया। मीडिया के माध्यम से यह सवाल लगातार उठता रहा कि क्या देवी के चरणों में चढ़ाए गए देव-द्रव्य का उपयोग मेडिकल कॉलेज जैसे संस्थानों के लिए किया जाना धर्मसम्मत है। समिति ने दावा किया कि मेडिकल कॉलेज की स्थापना में नियमों की अनदेखी हुई, जल्दबाजी में निर्णय लिए गए और नेशनल मेडिकल कमीशन के मानकों का पालन नहीं किया गया।
इन्हीं तथ्यों और आपत्तियों के आधार पर एनएमसी द्वारा कॉलेज की अनुमति रद्द करने के फैसले को संघर्ष समिति ने न्याय की जीत बताया। समिति का कहना है कि यह निर्णय यह साबित करता है कि श्रद्धालुओं की आवाज और तथ्यों पर आधारित आंदोलन को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
केंद्र सरकार के प्रति आभार
प्रेस वार्ता में संघर्ष समिति ने केंद्र सरकार की भूमिका की सराहना करते हुए कहा कि यह फैसला दर्शाता है कि देश में ऐसी सरकार है जो करोड़ों भक्तों की आस्था और भावनाओं को समझती है। गृह मंत्रालय और स्वास्थ्य मंत्रालय के स्तर पर पूरे मामले को गंभीरता से लेने और नियमानुसार कार्रवाई करने के लिए समिति ने आभार व्यक्त किया। समिति ने कहा कि यह निर्णय केवल एक संस्थान से जुड़ा मामला नहीं, बल्कि धार्मिक स्थलों के प्रबंधन में पारदर्शिता और जवाबदेही की मिसाल है।
उपराज्यपाल से बायलॉज संशोधन की मांग
संघर्ष समिति ने उपराज्यपाल से मांग की कि वे श्री माता वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड को स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी करें, ताकि भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा उत्पन्न न हो। समिति का कहना है कि श्राइन बोर्ड के बायलॉज में संशोधन कर यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि बोर्ड के भीतर सनातन परंपराओं, धार्मिक आस्थाओं और सांस्कृतिक मूल्यों का पूर्ण सम्मान हो। समिति ने यह भी मांग रखी कि बोर्ड के कार्यों में हिंदू समाज की प्रभावी सहभागिता सुनिश्चित की जाए और संस्थान के भीतर योग, वेद और संस्कृत जैसे विषयों पर शोध एवं अध्ययन को बढ़ावा दिया जाए। संघर्ष समिति के अनुसार, उनका उद्देश्य टकराव नहीं, बल्कि धर्मसम्मत और मर्यादित व्यवस्था की स्थापना है।
चढ़ावे के उपयोग पर उठे मूल सवाल
इस पूरे विवाद की जड़ देव-द्रव्य के उपयोग को लेकर उठे सवाल हैं। संघर्ष समिति का कहना है कि माता वैष्णो देवी के चरणों में श्रद्धालुओं द्वारा अर्पित चढ़ावा देवी की संपत्ति है और उसका उपयोग केवल धार्मिक, लोकहितकारी और धर्मसम्मत कार्यों में ही किया जा सकता है। शास्त्रीय परंपराओं का हवाला देते हुए समिति ने कहा कि देव-द्रव्य का उपयोग सेकुलर विश्वविद्यालयों, मेडिकल कॉलेजों, अस्पतालों या अन्य सांसारिक और व्यावसायिक संस्थानों में करना धार्मिक दृष्टि से अनुचित है। समिति का आरोप है कि पिछले दो दशकों में बड़ी मात्रा में एकत्रित धनराशि का प्रयोग ऐसे कार्यों में किया गया, जो राज्य सरकार के दायित्व क्षेत्र में आते हैं। सड़क निर्माण, विश्वविद्यालय और मेडिकल कॉलेज जैसे प्रोजेक्ट्स को देवी के चढ़ावे से चलाना श्रद्धालुओं की आस्था पर सीधी चोट है।
मेडिकल कॉलेज में प्रवेश प्रक्रिया पर उठे सवाल
संघर्ष समिति ने मेडिकल कॉलेज की प्रवेश प्रक्रिया को लेकर कई गंभीर तथ्य सामने रखे, जिनमें प्रमुख बिंदु निम्न हैं:
1. एमबीबीएस की 50 सीटों में से 47 सीटों पर एक ही समुदाय के छात्रों का चयन हुआ।
2. कॉलेज प्रबंधन द्वारा आरक्षण से संबंधित नियम तय नहीं किए गए।
3. एससी, एसटी, ओबीसी, ईडब्ल्यूएस, आरबीए, एएलसी और आईबी जैसी आरक्षित श्रेणियों के लिए सीटें निर्धारित नहीं की गईं।
4. काउंसलिंग प्रक्रिया के लिए जम्मू-कश्मीर में अन्य राज्यों की तुलना में सबसे कम समय दिया गया।
5. बेहद कम समय में काउंसलिंग कराए जाने से चयन प्रक्रिया पर संदेह उत्पन्न हुआ।
6. मेडिकल कॉलेज की जमीन के मालिकाना हक को लेकर स्थिति आज भी स्पष्ट नहीं है।
7. कॉलेज को जिस विश्वविद्यालय से संबद्धता दी गई, उस विश्वविद्यालय के अधिनियम में ऐसी शक्ति का प्रावधान नहीं बताया गया।
8. मेडिकल कॉलेज की स्थापना और संचालन में नेशनल मेडिकल कमीशन के नियमों की अनदेखी हुई।
संघर्ष समिति की प्रमुख मांगें
संघर्ष समिति ने स्पष्ट शब्दों में अपनी मांगें रखते हुए कहा कि पूरे मामले में ठोस और स्थायी समाधान आवश्यक है। प्रमुख मांगें इस प्रकार हैं:
1. मेडिकल कॉलेज को पूर्णतः बंद किया जाए।
2. कॉलेज में प्रवेश ले चुके छात्रों को अन्य मान्यता प्राप्त मेडिकल कॉलेजों में समायोजित किया जाए।
3. माता वैष्णो देवी के चरणों में अर्पित देव-द्रव्य का उपयोग केवल सनातन धर्म के प्रचार-प्रसार और धार्मिक उद्देश्यों के लिए किया जाए।
4. देव-द्रव्य के उपयोग में पूर्ण पारदर्शिता सुनिश्चित की जाए और इसका लेखा-जोखा सार्वजनिक किया जाए।
5. मेडिकल कॉलेज की स्थापना प्रक्रिया में नियमों की अनदेखी करने वाले अधिकारियों और बोर्ड सदस्यों की भूमिका की जांच हो
6. दोषी पाए जाने वालों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाए।
7. वैष्णो देवी के पुराने मार्गों पर स्थित मंदिरों का संरक्षण और नियमित रखरखाव सुनिश्चित किया जाए।
8. त्रिकुटा पर्वत के परिक्रमा मार्ग को सुव्यवस्थित और श्रद्धालुओं के लिए अधिक सुगम बनाया जाए।
9. कोल कंडोली, देवा माई, बाबा जित्तो, नौ देवियां सहित सभी प्राचीन मंदिरों का जीर्णोद्धार किया जाए।
कटरा और माता वैष्णो देवी क्षेत्र को सनातन संस्कृति के प्रमुख केंद्र के रूप में विकसित किया जाए। इसके साथ ही, देव-द्रव्य के उपयोग में पूर्ण पारदर्शिता लाई जाए और उसका प्रयोग केवल सनातन धर्म के प्रचार-प्रसार, मंदिरों के संरक्षण, गुरुकुल, गौशालाओं और श्रद्धालुओं की सुविधाओं के लिए किया जाए।
समिति ने यह भी मांग की कि इस पूरे मामले में जिन अधिकारियों और बोर्ड सदस्यों ने नियमों की अनदेखी की, उनकी भूमिका की जांच हो और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए। त्रिकुटा पर्वत के पुराने मार्गों और मंदिरों के जीर्णोद्धार, परिक्रमा मार्ग को सुगम बनाने और कटरा को सांस्कृतिक केंद्र के रूप में विकसित करने की मांग भी प्रमुख रूप से रखी गई।
विजय यात्रा और संकल्प
प्रेस वार्ता के बाद संघर्ष समिति और समर्थकों ने ढोल-नगाड़ों के साथ विजय यात्रा निकाली। यह यात्रा परेड ग्राउंड से शुरू होकर शहर के विभिन्न हिस्सों से गुजरते हुए रघुनाथ मंदिर पहुंची। मंदिर में दर्शन और पूजा के बाद आंदोलन की सफलता के लिए आभार प्रकट किया गया। पूरे वातावरण में ‘जय माता दी’ और ‘जय श्री राम’ के जयघोष गूंजते रहे।
संघर्ष समिति ने अंत में यह स्पष्ट किया कि यह आंदोलन किसी का अपमान या विरोध नहीं, बल्कि सनातन संस्कृति और माता वैष्णो देवी की मर्यादा की रक्षा का संकल्प है। समिति ने दोहराया कि भविष्य में भी वे श्राइन बोर्ड से जुड़े हर निर्णय पर नजर रखेंगे और यह सुनिश्चित करेंगे कि माता के दरबार से जुड़ा हर कार्य धर्म, परंपरा और श्रद्धालुओं की भावना के अनुरूप हो।