Pakistan News : भारत को हर दूसरे दिन “न्यूक्लियर धमकी” और “अंजाम भुगतने” की चेतावनी देने वाली पाकिस्तान आर्मी की असलियत आज दुनिया के सामने नंगी खड़ी है। बलूचिस्तान से सामने आया ताज़ा वीडियो उस खोखले दंभ को चूर-चूर कर देता है, जिसके सहारे इस्लामाबाद वर्षों से अपने नागरिकों और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर शोर मचाता रहा है। जिस सेना का नेतृत्व Asim Munir करता है, वही सेना आज अपने ही जवानों को पहचानने से इनकार कर रही है। और वे जवान घुटनों के बल बैठे हैं, कैमरे के सामने अपनी जान की भीख मांग रहे हैं।
भारत को धमकी, घर में बेबसी
पाकिस्तान की सैन्य व्यवस्था अक्सर भारत के खिलाफ आक्रामक बयानबाज़ी करती रही है। सीमा पार आतंकी ढांचे को संरक्षण देना हो या कूटनीतिक मंचों पर झूठा शोर पाकिस्तानी सेना हमेशा “मजबूती” का दिखावा करती रही है। लेकिन बलूचिस्तान के पहाड़ों में वही तथाकथित “मजबूत” सेना बेबस दिखाई दे रही है। वीडियो में कथित पाकिस्तानी सैनिक रोते हुए सवाल कर रहे हैं कि सेना उन्हें अपना क्यों नहीं मान रही। वे अपने आधिकारिक पहचान पत्र दिखा रहे हैं, यह साबित करने के लिए कि वे वास्तव में सेना के जवान हैं। यह दृश्य केवल सैन्य पराजय नहीं, बल्कि नैतिक दिवालियापन का प्रतीक है।
अपने ही सैनिकों से मुंह मोड़ने वाली फौज
सबसे शर्मनाक पहलू यह है कि पाकिस्तानी सैन्य प्रतिष्ठान ने पहले दावा किया कि उसके कोई सैनिक लापता नहीं हैं। यानी या तो वीडियो झूठ है या फिर सेना सच से भाग रही है। अगर वे सैनिक असली हैं, तो उन्हें नकारना कायरता है। अगर वे असली नहीं हैं, तो फिर उनके पास आधिकारिक दस्तावेज़ कैसे हैं?
एक सैनिक कैमरे पर कहता है - “मैं पाकिस्तान के लिए लड़ता हूं, और आज पाकिस्तान आर्मी मुझे अपना नहीं मान रही।” यह वाक्य किसी भी देश के लिए कलंक जैसा है। सैनिक सीमा पर इसलिए नहीं लड़ते कि संकट की घड़ी में उनका नेतृत्व उन्हें “डिनाय” कर दे।
BLA ने सात दिन की समय-सीमा तय की थी, जिसमें से अब केवल तीन दिन शेष बताए जा रहे हैं। संगठन ने बंदी बनाए गए जवानों के बदले बलूच कैदियों की रिहाई या अदला-बदली की मांग रखी है। चेतावनी दी गई है कि यदि बातचीत शुरू नहीं हुई, तो परिणाम गंभीर हो सकते हैं। अब तक पाकिस्तान सरकार या सेना की ओर से इस नए वीडियो पर कोई ठोस और स्पष्ट प्रतिक्रिया नहीं आई है। यह चुप्पी कई सवाल खड़े करती है क्या इस्लामाबाद के पास जवाब नहीं है? या फिर सच्चाई स्वीकार करने का साहस नहीं?
मुनीर की ‘रणनीति’ या नेतृत्व की विफलता?
मुनीर अक्सर भारत को लेकर ऊंचे सुर में बयान देते हैं। लेकिन नेतृत्व की असली परीक्षा युद्ध के मैदान में नहीं, बल्कि अपने जवानों के साथ खड़े होने में होती है। आज सवाल यह है कि क्या मुनीर अपने सैनिकों को बचाने के लिए कोई ठोस कदम उठाएंगे? या फिर वे उन्हें बलि का बकरा बनाकर राजनीतिक छवि बचाने में लगे रहेंगे? एक सेना प्रमुख का अपने ही जवानों की पहचान से इनकार करना केवल सैन्य असफलता नहीं यह राष्ट्रीय अपमान है।
बलूचिस्तान की जमीन पर बदलता समीकरण
पाकिस्तान का दक्षिण-पश्चिमी प्रांत बलूचिस्तान, जो अफगानिस्तान और ईरान की सीमाओं से सटा है, लंबे समय से अशांति का केंद्र रहा है। BLA बलूचिस्तान की स्वतंत्रता की मांग करता है और आरोप लगाता है कि इस्लामाबाद प्रांत के गैस और खनिज संसाधनों का दोहन करता है, जबकि स्थानीय लोगों को उनका उचित हिस्सा नहीं मिलता। इस्लामाबाद इन आरोपों को खारिज करता रहा है। लेकिन बार-बार सामने आने वाले ऐसे वीडियो और घटनाएं यह संकेत देती हैं कि समस्या केवल “कानून-व्यवस्था” का मामला नहीं, बल्कि गहरे राजनीतिक असंतोष और अविश्वास से जुड़ी है।
बलूचिस्तान लंबे समय से असंतोष और संघर्ष का केंद्र रहा है। वहां के हालात बताते हैं कि समस्या केवल सुरक्षा अभियान से हल नहीं हुई। संसाधनों से समृद्ध इस क्षेत्र में स्थानीय असंतोष वर्षों से इसे सुलगा रहा है। आज वही असंतोष पाकिस्तान आर्मी की कमजोरी को उजागर कर रहा है। जो सेना भारत को आंख दिखाती है, वही अपने ही प्रांत में घुटनों पर नजर आ रही है।
अंतिम सवाल