4 फरवरी 2018 यह तारीख भारतीय सैन्य इतिहास में एक बार फिर पाकिस्तान की कायरता और भारतीय जवानों के अदम्य साहस की याद दिलाती है। आज से ठीक 8 वर्ष पहले, पाकिस्तान ने जम्मू-कश्मीर के राजौरी जिले के भिंबर सेक्टर में बिना किसी उकसावे के अचानक सीज़फायर का उल्लंघन किया था। इस नापाक हमले में भारतीय सेना के 4 जांबाज़ जवान मातृभूमि की रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त हो गए।
इस कायराना हमले में वीरगति को प्राप्त हुए जवान थे -:
कैप्टन कपिल कुंडू (हरियाणा के गुरुग्राम निवासी)
राइफलमैन शुभम सिंह (कठुआ, जम्मू-कश्मीर)
राइफलमैन रामअवतार (ग्वालियर, मध्य प्रदेश)
हवलदार रोशन लाल (सांबा, जम्मू-कश्मीर)
चारों जवान उस समय LOC पर अग्रिम मोर्चे पर तैनात थे और पाकिस्तान की गोलीबारी का पूरी बहादुरी से जवाब दे रहे थे। पाकिस्तान की ओर से की गई भारी गोलीबारी का उद्देश्य साफ था भारत को उकसाना, सीमा पर अस्थिरता पैदा करना और आतंकियों की घुसपैठ के लिए रास्ता खोलना। लेकिन वह भूल गया था कि सामने भारतीय सेना खड़ी है। हमले के बाद पूरे देश में आक्रोश फैल गया। हर भारतीय के दिल में एक ही सवाल था “कब मिलेगा हमारे वीरों के बलिदान का जवाब?”
भारतीय सेना ने भी देर नहीं लगाई। सीज़फायर उल्लंघन का माकूल और निर्णायक जवाब दिया गया। पाकिस्तान की कई चौकियों को तबाह कर दिया गया और यह साफ संदेश दे दिया गया कि भारत अपने जवानों के खून का हिसाब जानता है।
कैप्टन कपिल कुंडू: 23 साल की उम्र में बलिदान
कैप्टन कपिल कुंडू भारतीय सेना की उस पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते थे, जो कम उम्र में ही राष्ट्रसेवा को जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य मानती है। हरियाणा के गुरुग्राम निवासी कपिल एक साधारण परिवार से आते थे, लेकिन उनके सपने असाधारण थे। महज़ 23 वर्ष की उम्र में वे सेना में कमीशंड ऑफिसर बने और एलओसी जैसे संवेदनशील इलाके में तैनात रहे। वे सिर्फ एक अधिकारी नहीं थे, बल्कि अपने जवानों के लिए मार्गदर्शक, संरक्षक और प्रेरणा थे।
4 फरवरी 2018 को जब पाकिस्तान की ओर से भारी गोलीबारी शुरू हुई, कैप्टन कपिल ने मोर्चा संभाला और अपने जवानों का नेतृत्व करते हुए दुश्मन की गोलियों का सामना किया। देश के लिए लड़ते हुए उन्होंने सर्वोच्च बलिदान दिया।दुखद संयोग यह रहा कि 6 दिन बाद यानी 10 फरवरी को उनका जन्मदिन था। घर में जश्न की जगह मातम पसरा और तिरंगे में लिपटा बेटा आया।
राइफलमैन शुभम सिंह:
राइफलमैन शुभम सिंह, जम्मू-कश्मीर के कठुआ जिले के रहने वाले थे। वे उन युवाओं में से थे जो पढ़ाई में हमेशा आगे रहते थे और जिनके सामने करियर के कई सुरक्षित विकल्प मौजूद थे। कॉरपोरेट जॉब, आरामदायक जीवन और निजी सपनों को छोड़कर शुभम ने भारतीय सेना को चुना। उनका मानना था कि देश की सेवा से बड़ा कोई धर्म नहीं होता।
शुभम की उम्र भी महज़ 23 वर्ष थी। वे कुछ ही दिनों में छुट्टी लेकर घर जाने वाले थे। पर नियति ने कुछ और ही लिखा था।4 फरवरी 2018 को वे एलओसी पर डटे रहे और पाकिस्तान की गोलीबारी का डटकर जवाब देते हुए वीरगति को प्राप्त हो गए। वे घर तो लौटे…लेकिन तिरंगे में लिपटकर।
राइफलमैन रामअवतार:
राइफलमैन रामअवतार मध्य प्रदेश के ग्वालियर जिले के निवासी थे। वे अपने परिवार के लिए सिर्फ कमाने वाले सदस्य नहीं, बल्कि एक जिम्मेदार पिता और समर्पित सैनिक थे। जब रामअवतार देश के लिए बलिदान हुए उस वक्त उनकी बेटी मात्र 3 महीने की थी। जिस पिता की गोद में पलना था, उसी पिता ने देश की रक्षा में अपने प्राण न्योछावर कर दिए। रामअवतार शांत स्वभाव के थे, लेकिन कर्तव्य के समय वे चट्टान की तरह अडिग रहते थे। एलओसी पर तैनाती को उन्होंने हमेशा गर्व के साथ स्वीकार किया। उनके बलिदान ने एक बार फिर साबित किया कि भारतीय जवान निजी सुख-दुख से ऊपर उठकर राष्ट्र को चुनते हैं।
हवलदार रोशन लाल:
हवलदार रोशन लाल जम्मू-कश्मीर के सांबा जिले से ताल्लुक रखते थे। वे अनुभवी सैनिक थे और अपने साथियों में अनुशासन और साहस के लिए जाने जाते थे। वे दो बच्चों के पिता थे। उनका बड़ा बेटा अभिनंदन उस समय सिर्फ 16 वर्ष का था। 3 फरवरी 2018 की शाम पिता-पुत्र के बीच आखिरी बार बातचीत हुई थी। अगले ही दिन रोशन लाल देश के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान दिया। लेकिन पिता के बलिदान पर गम ना जताते हुए बेटे अभिनंदन ने अपने आंसुओं को गर्व में बदलते हुए कहा “मेरे पिता ने देश की रक्षा के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान दिया है। मैं भी सेना में जाकर उनका सपना पूरा करूंगा।” हवलदार रोशन लाल न सिर्फ सीमा पर, बल्कि अपने बेटे के संकल्प में भी अमर हो गए।
कैप्टन कपिल कुंडू, राइफलमैन शुभम सिंह, राइफलमैन रामअवतार, हवलदार रोशन लाल ये सिर्फ नाम नहीं हैं। ये त्याग, साहस और राष्ट्रभक्ति की जीवंत परिभाषा हैं। वे चले गए… लेकिन भारत को सुरक्षित छोड़ गए।