हिंदू नववर्ष केवल एक तिथि परिवर्तन नहीं, बल्कि नई ऊर्जा, नई आशा और नए संकल्पों का आरंभ है। कश्मीरी हिंदू समाज इस पावन अवसर को नवरेह के रूप में मनाता है। यह पर्व केवल कैलेंडर का आरंभ नहीं, बल्कि अपनी जड़ों, अपनी पहचान और अपनी सांस्कृतिक विरासत से जुड़ने का जीवंत प्रतीक है।
नवरेह का अर्थ है “नया दिन”। यह दिन कश्मीरी हिंदुओं के लिए प्रकृति, संस्कृति और आत्मबल के पुनर्जागरण का संदेश लेकर आता है। इस दिन घरों में पारंपरिक ‘थाल’ सजाई जाती है, जिसमें चावल, दही, सिक्का, पेन, पंचांग, फूल और दर्पण रखे जाते हैं। यह थाल आने वाले वर्ष के लिए समृद्धि, ज्ञान, आत्मचिंतन और संतुलन का प्रतीक होती है। लेकिन नवरेह का महत्व केवल परंपराओं तक सीमित नहीं है यह कश्मीरी हिंदुओं के लिए संकल्प, त्याग और शौर्य की त्रिवेणी है।
कश्मीर वापसी का संकल्प: अपनी जड़ों की पुकार
नवरेह का पहला संदेश है संकल्प। यह संकल्प है अपनी मातृभूमि कश्मीर से फिर से जुड़ने का, उस धरती पर लौटने का, जहां से कश्मीरी हिंदुओं का हजारों वर्षों का इतिहास और अस्तित्व जुड़ा है। वर्षों के विस्थापन और संघर्ष के बावजूद, कश्मीरी हिंदू समाज ने अपनी संस्कृति, परंपराओं और आस्था को जीवित रखा है। नवरेह के दिन लिया गया यह संकल्प केवल भौगोलिक वापसी का नहीं, बल्कि अपनी पहचान, अपनी अस्मिता और अपने गौरव को पुनः स्थापित करने का संकल्प है।
महर्षि पं. श्रीभट्ट - त्याग दिवस
भारतीय इतिहास में संस्कृति और समाज की रक्षा के लिए अनेक महापुरुषों ने अपने जीवन को समर्पित किया। इन्हीं महान विभूतियों में एक नाम अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाता है—महर्षि पं. श्रीभट्ट। 15वीं शताब्दी में जब कश्मीर सामाजिक और धार्मिक संकट के दौर से गुजर रहा था, तब महर्षि श्रीभट्ट ने अपने ज्ञान, साहस और त्याग से पूरे समाज को नई दिशा दी।
पंडित कल्हण के लगभग 270 वर्षों बाद कश्मीर के इतिहास को पुनः लिखने की प्रेरणा भी श्रीभट्ट से ही मिली। दरबारी इतिहासकार पं. जोनराज ने अपनी ‘राजतरंगिणी’ में इसका उल्लेख करते हुए लिखा कि श्रीभट्ट की प्रेरणा इतनी प्रबल थी कि उसे टालना असंभव था।
जब सुल्तान ज़ैन-उल-आबिदीन गंभीर बीमारी से पीड़ित हुआ, तब श्रीभट्ट ने अपने चिकित्सा ज्ञान से उसे स्वस्थ किया। इसके बाद जब सुल्तान ने उन्हें पुरस्कार देने की इच्छा जताई, तब उन्होंने अपने लिए कुछ नहीं मांगा। उन्होंने जो मांगा, वह पूरे समाज के लिए था हिंदुओं पर हो रहे अत्याचारों का अंत, जज़िया कर की समाप्ति और विस्थापित कश्मीरी हिंदुओं की सम्मानपूर्वक वापसी
सुल्तान ने उनकी सभी मांगों को स्वीकार किया। इस प्रकार श्रीभट्ट ने अपने त्याग और दूरदृष्टि से कश्मीरी हिंदू समाज को सम्मान, सुरक्षा और अस्तित्व वापस दिलाया। उन्होंने समाज में फैली कुरीतियों और जातिगत भेदभाव को समाप्त करने का भी प्रयास किया और समाज को एकजुट करने का कार्य किया। वास्तव में, महर्षि श्रीभट्ट केवल एक वैद्य नहीं, बल्कि एक युगद्रष्टा, समाज सुधारक और सांस्कृतिक रक्षक थे। उनका त्याग हमें सिखाता है सच्चा महान वही है, जो अपने लिए नहीं, समाज के लिए जीता है।
सम्राट ललितादित्य - शौर्य दिवस
सम्राट ललितादित्य मुक्तापीड भारतीय इतिहास के उन महान शासकों में से एक हैं, जिन्होंने अपने अद्वितीय शौर्य, रणनीति और दूरदृष्टि से कश्मीर को विश्व शक्ति के रूप में स्थापित किया। कार्कोट वंश के राजा दुर्लभादित्य के सबसे छोटे पुत्र ललितादित्य का जन्म 799 ईस्वी में हुआ। बचपन से ही उनकी बुद्धिमत्ता, नेतृत्व क्षमता और वीरता असाधारण थी। उन्होंने राज्य संचालन, कूटनीति और युद्ध कौशल में शीघ्र ही महारत हासिल कर ली।
अपने पराक्रम, साहस और कुशल रणनीति के बल पर सम्राट ललितादित्य ने कश्मीर के साम्राज्य का विस्तार दूर-दूर तक किया। उनके विजय अभियान भारत के अनेक क्षेत्रों कन्नौज, बिहार, गुजरात, बंगाल, मालवा से लेकर मध्य एशिया, तिब्बत, तुर्किस्तान और ईरान तक पहुंचे। इसी कारण उन्हें “विश्वविजेता” की उपाधि से भी सम्मानित किया गया।
8वीं शताब्दी (724–760 ई.) के बीच उन्होंने लगभग 36 वर्षों तक शासन किया और कश्मीर को समृद्ध, शक्तिशाली और स्थिर राज्य बनाया। सम्राट ललितादित्य केवल विजेता ही नहीं, बल्कि एक महान निर्माता भी थे। उनके द्वारा निर्मित मार्तंड सूर्य मंदिर आज भी उनके गौरवशाली काल की भव्यता का प्रतीक है।
वे सभी धर्मों के प्रति सहिष्णु, न्यायप्रिय और दूरदर्शी शासक थे। उन्होंने बौद्ध विहारों और शिव मंदिरों दोनों का निर्माण करवाया, जो उनकी व्यापक दृष्टि और समावेशी शासन का प्रमाण है। उनका जीवन हमें सिखाता है शक्ति, साहस और दूरदृष्टि से ही राष्ट्र महान बनता है।
नवरेह: अतीत की प्रेरणा, भविष्य का मार्ग
नवरेह केवल एक पर्व नहीं, बल्कि एक विचार, एक चेतना और एक दिशा है। यह हमें सिखाता है, अपनी जड़ों से जुड़े रहना, समाज के लिए त्याग करना और अपने गौरव की रक्षा के लिए शौर्य दिखाना। आज जब हम नवरेह मना रहे हैं, तो यह केवल उत्सव का क्षण नहीं, बल्कि आत्ममंथन और संकल्प का अवसर भी है।
संकल्प कश्मीर वापसी का…
प्रेरणा श्रीभट्ट के त्याग की…
और शक्ति ललितादित्य के शौर्य की…
इन्हीं भावनाओं के साथ नवरेह हमें एक नए युग की ओर अग्रसर करता है जहां हमारी संस्कृति सुरक्षित हो, हमारी पहचान मजबूत हो और हमारा भविष्य उज्ज्वल हो।