✍️ Written By: Ujjawal Mishra (Arnav)
13 जनवरी 1978 – 21 मार्च 2009
आज कहानी भारतीय सेना के एक ऐसे वीर सपूत की, जिसने आतंकवाद को उसी के तरीके से मात देने का साहस दिखाया। यह गाथा है मेजर मोहित शर्मा की - एक ऐसे जांबाज़ कमांडो की, जिसने आतंकियों का भेष बनाकर पहले उनका विश्वास जीता और फिर उनके ही गढ़ में घुसकर उन्हें मौत के घाट उतार दिया।
21 मार्च 2009 को जम्मू-कश्मीर के कुपवाड़ा में एक आतंकवाद-रोधी अभियान के दौरान, मेजर मोहित शर्मा ने अदम्य साहस और वीरता का परिचय देते हुए अपने साथियों की जान बचाई और चार आतंकवादियों को ढेर कर दिया। अंततः मातृभूमि की रक्षा करते हुए वे वीरगति को प्राप्त हुए।
जीवन परिचय
13 जनवरी 1978 को हरियाणा के रोहतक जिले में जन्मे मेजर मोहित शर्मा बचपन से ही मेधावी और अनुशासित थे। पढ़ाई में उत्कृष्ट होने के साथ-साथ उनके भीतर देशभक्ति का जज़्बा भी प्रबल था। 11 दिसंबर 1999 को उन्होंने इंडियन मिलिट्री एकेडमी (IMA) से पासआउट होकर भारतीय सेना में कमीशन प्राप्त किया। उन्हें पहली नियुक्ति 5 मद्रास रेजिमेंट में मिली। प्रारंभिक पोस्टिंग हैदराबाद में रही, जहाँ से उन्हें आगे जम्मू-कश्मीर में 38 राष्ट्रीय राइफल्स के साथ तैनात किया गया-एक ऐसा क्षेत्र, जहाँ हर दिन देश की सुरक्षा की असली परीक्षा होती है।
‘ऑपरेशन रक्षक’ और हफरुदा के जंगलों में मुठभेड़
21 मार्च 2009 को मेजर मोहित शर्मा ‘ऑपरेशन रक्षक’ (Operation Rakshak) का नेतृत्व कर रहे थे। खुफिया जानकारी मिली थी कि कुपवाड़ा के हफरुदा के घने जंगलों में आतंकवादी छिपे हुए हैं और किसी बड़े हमले की साजिश रच रहे हैं। बिना समय गंवाए मेजर शर्मा अपनी टीम के साथ ऑपरेशन पर निकल पड़े। जैसे ही आतंकियों को आभास हुआ कि वे भारतीय सेना से घिर चुके हैं, उन्होंने अंधाधुंध गोलीबारी शुरू कर दी। देखते ही देखते स्थिति भीषण मुठभेड़ में बदल गई।
इसी दौरान, उनकी टीम के कुछ कमांडो आतंकियों की गोलियों की चपेट में आ गए। यह देख मेजर मोहित शर्मा बिना अपनी जान की परवाह किए आगे बढ़े और जवाबी कार्रवाई करते हुए दो आतंकियों को मार गिराया। इसी दौरान उनके सीने में गोली लगी।
गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद वे रुके नहीं। उन्होंने मोर्चा संभाले रखा, अपने साथियों को निर्देश देते रहे और आगे बढ़कर शेष दो आतंकियों को भी ढेर कर दिया। अंततः अत्यधिक रक्तस्राव के कारण वे वीरगति को प्राप्त हो गए, लेकिन अपने साथियों की जान बचाकर और दुश्मनों का सफाया कर उन्होंने कर्तव्य की सर्वोच्च मिसाल कायम कर दी।
जब दुश्मन के गढ़ में बनकर घुसे ‘इफ्तिखार भट्ट’
मेजर मोहित शर्मा की वीरता केवल रणभूमि तक सीमित नहीं थी, बल्कि उनकी रणनीतिक सूझबूझ भी अद्वितीय थी। India's Most Fearless 2 में वर्णित एक ऑपरेशन के अनुसार, उन्होंने दक्षिण कश्मीर संभाग के शोपियां क्षेत्र में प्रतिबंधित आतंकी संगठन ‘हिजबुल मुजाहिद्दीन’ में घुसपैठ की।
इसके लिए उन्होंने अपना हुलिया पूरी तरह बदल लिया - लंबी दाढ़ी, बदला हुआ नाम और व्यवहार। ‘इफ्तिखार भट्ट’ के नाम से उन्होंने आतंकियों अबू तोरारा और अबू सबजार से संपर्क साधा और उन्हें विश्वास दिलाया कि भारतीय सेना ने उनके भाई को मार दिया था, जिसका बदला लेने के लिए वे आतंकी बनना चाहते हैं।
“अगर शक है, तो मुझे गोली मार दो” : उनकी इस कहानी और आत्मविश्वास ने आतंकियों को उनके झांसे में ले लिया।
ऑपरेशन के दौरान कई बार आतंकियों को उन पर शक हुआ। लेकिन हर बार मेजर शर्मा ने अपने आत्मविश्वास और अभिनय से उन्हें भ्रमित कर दिया। एक मौके पर उन्होंने आतंकियों से साफ कहा - “अगर मेरे बारे में कोई शक है, तो मुझे गोली मार दो।” यह सुनकर आतंकी असमंजस में पड़ गए। इसी क्षण का लाभ उठाकर मेजर शर्मा ने अपनी 9 मिमी पिस्टल निकाली और दोनों आतंकियों को सटीक निशाने से मार गिराया। इसके बाद वे उनके हथियार लेकर सुरक्षित आर्मी कैंप लौट आए।
अमर बलिदान और अशोक चक्र
अपने जीवन के अंतिम क्षण तक कर्तव्य निभाने वाले मेजर मोहित शर्मा ने यह सिद्ध कर दिया कि सच्चा सैनिक कभी हार नहीं मानता चाहे परिस्थिति कितनी भी कठिन क्यों न हो। उनकी असाधारण वीरता, नेतृत्व और बलिदान के लिए उन्हें मरणोपरांत देश के सर्वोच्च शांतिकालीन सैन्य सम्मान अशोक चक्र से सम्मानित किया गया। मेजर मोहित शर्मा की यह शौर्यगाथा केवल एक सैनिक की कहानी नहीं, बल्कि हर भारतीय के लिए प्रेरणा का स्रोत है। उनका जीवन हमें यह सिखाता है कि देशभक्ति केवल शब्द नहीं, बल्कि त्याग, साहस और कर्तव्य की पराकाष्ठा है।
माँ भारती के इस वीर सपूत को शत-शत नमन।