बांग्लादेश, जिसे कभी पूर्वी पाकिस्तान कहा जाता था, 1971 में इतिहास के सबसे भयावह नरसंहारों में से एक का गवाह बना। यह सिर्फ एक राजनीतिक संघर्ष नहीं था, बल्कि सत्ता के अहंकार में डूबे पाकिस्तान द्वारा अपने ही नागरिकों के खिलाफ चलाया गया क्रूर दमन था।
1970 के आम चुनावों में शेख मुजीबुर्रहमान की आवामी लीग को स्पष्ट बहुमत मिला था। लोकतंत्र के सिद्धांत के अनुसार सत्ता उन्हें मिलनी चाहिए थी, लेकिन पाकिस्तान के तत्कालीन शासक याह्या खान और जुल्फिकार अली भुट्टो ने सत्ता हस्तांतरण से इनकार कर दिया। इसके बाद पूर्वी पाकिस्तान में असंतोष भड़क उठा और जनता अपने अधिकारों व स्वतंत्रता की मांग करने लगी।
25 मार्च 1971 ‘ऑपरेशन सर्चलाइट’ :
इस जनआंदोलन को कुचलने के लिए 25 मार्च 1971 की काली रात को पाकिस्तान ने ‘ऑपरेशन सर्चलाइट’ शुरू किया। इस ऑपरेशन की कमान जनरल टिक्का खान के हाथों में थी, जिसे उसकी क्रूरता के कारण ‘बूचर ऑफ बंगाल’ कहा जाता है। इस अभियान का मकसद केवल विरोध को दबाना नहीं था, बल्कि एक पूरी पीढ़ी को खत्म करना था—बुद्धिजीवियों, छात्रों, राजनीतिक कार्यकर्ताओं और खासकर हिंदू समुदाय को निशाना बनाया गया।
30 लाख निर्दोषों की हत्या
पाकिस्तानी सेना की बर्बरता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि इस दौरान करीब 4 लाख महिलाओं के साथ बलात्कार हुआ और लाखों लोगों को बंधक बनाकर अमानवीय यातनाएं दी गईं। गांवों के गांव जला दिए गए, लोगों को घरों से निकालकर गोलियों से भून दिया गया। 10 महीने तक चले इस नरसंहार में करीब 30 लाख निर्दोष लोगों की जान चली गई। यह त्रासदी इतनी भीषण थी कि इसे मानव इतिहास के सबसे बड़े नरसंहारों में गिना जाता है।
इस दमन के खिलाफ उसी रात चटगांव में 8वीं ईस्ट बंगाल रेजिमेंट ने ‘वी रिवोल्ट’ का नारा देते हुए सशस्त्र विद्रोह का बिगुल फूंका। यही विद्रोह आगे चलकर 9 महीने लंबे मुक्ति संग्राम में बदल गया। पाकिस्तान की हिंसा से बचने के लिए करीब 1 करोड़ लोग भारत में शरण लेने को मजबूर हुए।
बांग्लादेश के उदय में भारत की भूमिका
भारत ने इस मानवीय संकट को न सिर्फ संभाला, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी इसे उठाया। अंततः 3 दिसंबर 1971 को भारत-पाकिस्तान युद्ध शुरू हुआ। भारतीय सेना के निर्णायक और तेज़ अभियान के सामने पाकिस्तान ज्यादा दिन टिक नहीं पाया। मात्र 13 दिनों में ही पाकिस्तान की सेना घुटनों पर आ गई और 16 दिसंबर 1971 को उसने आत्मसमर्पण कर दिया। करीब 93 हजार पाकिस्तानी सैनिकों ने भारत के सामने हथियार डाल दिए—जो विश्व इतिहास के सबसे बड़े सैन्य आत्मसमर्पणों में से एक है।
आज भी जिंदा है उस नरसंहार की पीड़ा
दशकों बाद भी 25 मार्च 1971 की वह काली रात बांग्लादेश की स्मृतियों में जिंदा है। हाल ही में बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान ने इस दर्द को एक बार फिर दुनिया के सामने रखा।
उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ पर लिखते हुए कहा, “25 मार्च 1971 को नरसंहार दिवस के रूप में मनाया जाता है। यह स्वतंत्रता-प्रिय बांग्लादेश के इतिहास का सबसे शर्मनाक और क्रूर दिन है। उस रात पाकिस्तानी सेना ने ‘ऑपरेशन सर्चलाइट’ के नाम पर निहत्थे लोगों के खिलाफ इतिहास के सबसे जघन्य नरसंहारों में से एक को अंजाम दिया।”
तारिक रहमान ने ढाका विश्वविद्यालय, पिलखाना और राजारबाग पुलिस लाइन्स जैसे स्थानों का जिक्र करते हुए बताया कि किस तरह शिक्षकों, बुद्धिजीवियों और आम नागरिकों पर अंधाधुंध गोलियां चलाई गईं। उन्होंने इस पूरे घटनाक्रम को एक पूर्व-नियोजित नरसंहार करार दिया और कहा कि उस समय की राजनीतिक विफलताएं आज भी शोध का विषय हैं।
उन्होंने यह भी याद दिलाया कि 25 मार्च की रात शुरू हुआ प्रतिरोध ही आगे चलकर बांग्लादेश की आजादी की नींव बना। अपने संदेश में उन्होंने आने वाली पीढ़ियों से इस इतिहास को याद रखने और स्वतंत्रता, मानव गरिमा तथा न्याय पर आधारित समाज के निर्माण का आह्वान किया।
1971 का यह नरसंहार सिर्फ इतिहास नहीं, बल्कि एक चेतावनी है—जब सत्ता मानवता से ऊपर हो जाती है, तो परिणाम सिर्फ विनाश होता है।