कारगिल वॉर के महावीर कर्नल सोनम वांगचुक का लेह में शुक्रवार सुबह हार्ट अटैक से निधन हो गया। महावीर चक्र विजेता 61 साल के सोनम वांगचुक को 'लद्दाख के शेर' के नाम से जाना जाता था। सोनम वांगचुक के परिजन ने बताया कि पिछले कुछ दिनों से उन्हें सीने में दर्द और बेचैनी की शिकायत थी। उनके पिता का इसी साल जनवरी में निधन हो गया था। पारंपरिक प्रार्थनाओं और अन्य धार्मिक अनुष्ठानों के लिए वह 25 मार्च को लेह आए थे।
सीने में दर्द की शिकायत के बाद गुरुवार दोपहर लगभग 2:30 बजे उन्हें सेना के अस्पताल ले जाया गया, जहां ईसीजी, अल्ट्रासाउंड और अन्य ज़रूरी टेस्ट किए गए। टेस्ट रिपोर्ट सामान्य आने के बाद वह घर लौट गए। शुक्रवार को हृदय की जांच के लिए दोबारा अस्पताल जाना था। शुक्रवार सुबह जब उन्हें गर्म पानी देने के लिए जगाया गया तो उन्होंने प्रतिक्रिया नहीं दी। इसके बाद उनकी मौत का पता चला।
कर्नल सोनम वांगचुक की पत्नी पद्मा आंगमो सिविल सर्वेंट हैं और अभी दिल्ली में तैनात हैं। उनका बेटा रिग्याल ओत्वुम बेंगलुरु में जॉब करता है। वांगचुक की मां लेह में रहती हैं। सोनम वांगचुक को कारगिल युद्ध में अपने सफल ऑपरेशन के दौरान दुश्मन के समक्ष वीरता और उत्तम युद्ध कौशल का परिचय देने के लिए भारत के दूसरे सर्वोच्च पुरस्कार महावीर चक्र (एमवीसी) से सम्मानित किया गया था।
बचपन, शिक्षा और सेना तक का सफर
कर्नल वांगचुक 1969 में लगभग 5 वर्ष की आयु में सोलन, हिमाचल प्रदेश चले गए। वहां उन्होंने चौथी कक्षा तक सेंट ल्यूक में पढ़ाई की। बाद में 1973 में उनका परिवार धर्मशाला चला गया, जहाँ उन्होंने सेक्रेड हार्ट हाई स्कूल में पढ़ाई की। यहां उनकी 14वें दलाई लामा के साथ घनिष्ठ बातचीत हुई, क्योंकि उनके पिता 14वें दलाई लामा के सुरक्षा अधिकारी के रूप में कार्यरत थे।
1975 में उनके पिता का तबादला दिल्ली हो गया। दिल्ली में उन्होंने शिक्षा प्राप्त की और दिल्ली विश्वविद्यालय से इतिहास में स्नातक की डिग्री ली। इसके बाद कर्नल सोनम वांगचुक ने OTA चेन्नई में प्रशिक्षण लिया और सेना की 4वीं बटालियन, असम रेजिमेंट में शामिल हुए। उन्हें बाद में लद्दाख स्काउट्स रेजिमेंट के इंडस विंग में भेजा गया।
चोरबाट ला पर पाकिस्तान का कब्ज़ा
26 जुलाई 1999, भारतीय इतिहास का एक ऐसा दिन है जिसे कोई भी भारतवासी नहीं भुला सकता। एक तरफ भारत-पाकिस्तान के बीच लाहौर में समझौता हो रहा था, तो वहीं दूसरी तरफ भारत पर अपनी नापाक नजर रखने वाला पाकिस्तान देश को तबाह करने और जम्मू-कश्मीर को हमसे छीनने की रणनीति बना रहा था।
मई आते-आते पाकिस्तानी सेना हमारी सीमा में कई किलोमीटर तक अंदर आने और लद्दाख में सामरिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण ऊंची चोटियों पर कब्ज़ा करने में भी सफल हो गई थी। पाकिस्तानी सैनिक 18,000 फीट की ऊंचाई पर स्थित चोरबाट ला पर कब्ज़ा कर चुके थे।
पाकिस्तानी घुसपैठ की खबर मिलते ही लद्दाख स्काउट्स के जवान मुस्तैद थे। दुश्मन 5500 फीट की ऊंचाई से लगातार गोलीबारी कर रहा था। लिहाजा पाकिस्तानी सैनिकों के कब्जे से चोरबाट ला को मुक्त कराना एक बड़ी चुनौती थी। इस मिशन को अंजाम देने और दुश्मनों को मार भगाने के लिए सेना ने जिम्मेदारी सौंपी लद्दाख स्काउट्स के मेजर सोनम वांगचुक को।
दरअसल जिस वक्त युद्ध की शुरुआत हुई थी, उस वक्त कर्नल वांगचुक छुट्टी पर थे। लेकिन जैसे ही उनके पास जंग की खबर पहुंची, वह अपनी छुट्टी बीच में ही छोड़कर बेस कैंप पहुंच गए थे। सोनम वांगचुक ने अपने 30-40 जवानों के साथ इस मिशन को अंजाम दिया।
जब सोनम वांगचुक ने संभाला मोर्चा
30 मई को वांगचुक की टुकड़ी के जवानों ने एलओसी के ठीक उस पार 12 से 13 पाकिस्तानी टेंट को स्पॉट किया, जिसमें 130 से ज्यादा जवान मौजूद थे। इसके साथ ही उन्होंने 3 से 4 पाकिस्तानी जवानों को दूसरी तरफ से चोटी पर चढ़ते देखा और बिना समय गंवाए उन्हें मार गिराया।
लेकिन पाकिस्तानी हर तरफ से घुसपैठ करने की कोशिश कर रहे थे और दूरी की वजह से उन्हें मारा नहीं जा सकता था। इसके बाद वहां तैनात जेसीओ ने मेजर वांगचुक तक यह खबर पहुंचाई। खबर मिलते ही मेजर वांगचुक सेना मुख्यालय से परमिशन लेकर अपने 25 जवानों के साथ मिशन की तरफ बढ़े।
दो फीट गहरी बर्फ में इन रणबाकुरों ने 8 किलोमीटर की इस दूरी को मात्र ढाई घंटे में पूरा किया। लेकिन जब मेजर अपने दल के साथ ऑपरेशन पोस्ट तक की चढ़ाई शुरू करने ही वाले थे, तब पाकिस्तानी फौज ने उन पर गोलियां बरसानी शुरू कर दी। पाकिस्तानी सैनिकों ने घंटों गोलीबारी की, जिसमें एक भारतीय सैनिक शहीद हो गया।
जब पाकिस्तानी सैनिकों के छुड़ाए छक्के
सोनम वांगचुक ने अपनी टुकड़ी को अगले हमले के लिए रात होने तक इंतजार करने का आदेश दिया, लेकिन चांद की रोशनी इतनी अधिक थी कि दुश्मन आसानी से इन्हें अपना शिकार बना सकता था। लेकिन तभी अचानक पूरी घाटी देखते ही देखते कोहरे से भर उठी। लिहाजा माँ भारती के इन रणबांकुरों ने -6 डिग्री के तापमान में 18,000 फीट की दुर्गम चढ़ाई में आधी बची दूरी को रात भर में नाप दिया।
सुबह होते ही मेजर वांगचुक के नेतृत्व वाली टुकड़ी ने पाकिस्तानियों पर हमला बोल दिया। लद्दाख स्काउट्स ने अपने हमले में करीब 10 पाकिस्तानी सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया। इस बीच हमले में कई अन्य पाकिस्तानी फौजी घायल होकर जमीन पर गिर पड़े तथा बाकी के बचे सैनिक अपनी जान बचाकर दबे पाँव पोस्ट छोड़कर भाग निकले।
महावीर चक्र से हुए सम्मानित
भारतीय सैनिकों ने इसके बाद चोरबाट ला समेत पूरे बटालिक सेक्टर को पाकिस्तान के कब्जे से वापस ले लिया। 31 मई से 1 जून तक हुई इस लड़ाई में बड़ी भूमिका निभाने के लिए मेजर सोनम वांगचुक को सेना के दूसरे सबसे बड़े सम्मान महावीर चक्र से नवाज़ा गया। साथ ही कारगिल की लड़ाई में रणनीतिक जीत दिलाने वाले लद्दाख स्काउट्स को भारतीय सेना ने गोरखा और डोगरा रेजीमेंट की तर्ज पर 2001 में इन्फैंट्री रेजीमेंट का दर्जा दिया।
आज लद्दाख स्काउट्स की 5 बटालियन ऑपरेट कर रही हैं, और हर बटालियन के पास लगभग 850 जवान हैं। आपको बता दें कि सियाचिन में भी लद्दाख के इन वीर लड़ाकों को तैनात किया जाता है। कर्नल सोनम वांगचुक अब हमारे बीच नहीं हैं…लेकिन उनकी वीरता, उनका साहस और उनका बलिदान हमेशा भारत की हर बर्फीली चोटी पर तिरंगे के साथ लहराता रहेगा।