
By : Arnav Mishra
1990 यह वह दौर था, जब जम्मू-कश्मीर की धरती पर हिंदुओं के विरुद्ध सुनियोजित आतंक का तांडव शुरू हो चुका था। सदियों पुरानी सांस्कृतिक विरासत को मिटाने, सनातन पहचान को कुचलने और हिंदुओं को उनकी ही पुण्यभूमि से बेदखल करने की साजिश रची जा रही थी।
आतंकियों का मकसद साफ था - हिंदुओं को डराना, धमकाना, मारना और घाटी से खदेड़ देना।
हालाँकि यह पहली बार नहीं था जब कश्मीरी हिंदुओं को अपनी मातृभूमि छोड़ने पर मजबूर किया गया हो। मध्यकाल में इस्लामिक शासन के दौरान भी कश्मीर की धरती हिंदुओं के रक्त से रंगी थी, और पलायन की त्रासदी झेलनी पड़ी थी।
फिर वही काला दौर 90 के दशक में लौटा, जब अलगाववाद और पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद अपने चरम पर था। इसी दौर में हुआ प्राणकोट-डाकीकोट नरसंहार, जहाँ इस्लामिक आतंकियों ने बर्बरता की सारी सीमाएँ तोड़ दीं।
मासूम बच्चों को उनके मां-बाप के सामने जिंदा जलाया गया। निर्दोषों की गर्दनें तलवार से काट दी गईं। इंसानियत चीख-चीख कर रहम की भीख मांगती रही, लेकिन उन जिहादियों ने एक न सुनी।
17 अप्रैल 1998 :
17 अप्रैल 1998… जम्मू-कश्मीर के रियासी जिले की शांत और सुंदर पहाड़ियों पर बसा गाँव प्राणकोट-डाकीकोट। गाँव के लोग अपने-अपने घरों में चैन की नींद सो चुके थे। किसी को अंदेशा नहीं था कि अगले कुछ घंटों में यह बस्ती श्मशान में बदलने वाली है।
घनी अंधेरी रात थी। पहाड़ों और जंगलों के बीच अजीब और डरावनी आहटें सुनाई दे रही थीं। तभी पाकिस्तान द्वारा पालित-पोषित 14 इस्लामिक आतंकवादी अंधेरे का फायदा उठाकर गाँव में घुस आए। यह हमला सिर्फ बंदूकों से नहीं हुआ… यह हमला दरिंदगी, हैवानियत और वहशीपन से भरा हुआ था।
29 हिंदुओं की निर्मम हत्या
आतंकियों ने एक साथ 29 हिंदुओं की नृशंस हत्या कर दी। इनमें 12 मासूम बच्चे भी थे - कुछ की उम्र महज 3 या 4 वर्ष थी। किसी का सिर धड़ से अलग कर दिया गया। किसी को उसके ही घर में जिंदा जला दिया गया। मां-बाप के सामने उनके बच्चों को मौत के हवाले कर दिया गया। महिलाओं के साथ दरिंदगी की सारी हदें पार की गईं। बलात्कार जैसे घिनौने अपराध किए गए। बेटियों को उठा ले जाया गया। पुरुषों को सरेआम काट डाला गया।
जो जीवित बचे, उन्होंने अपनों को तड़प-तड़प कर मरते देखा।
तलवार, छुरे और आग से खेला गया खूनी खेल
इन हत्याओं में आतंकियों ने जिन हथियारों का इस्तेमाल किया, वे केवल बंदूकें नहीं थीं। धारदार छुरे, तलवारें और आग… इन्हीं से मासूमों की जिंदगी छीन ली गई। यह केवल नरसंहार नहीं था… यह पूरी इंसानियत के खिलाफ खुला युद्ध था। यह हिंदुओं के प्रति जिहादी मानसिकता की वह नफरत थी, जिसमें मासूमियत भी दुश्मन नजर आती थी।
सुनियोजित साजिश
प्राणकोट-डाकीकोट हत्याकांड कोई अचानक हुआ हमला नहीं था। यह पाकिस्तान समर्थित इस्लामिक आतंकवादियों की एक सुनियोजित साजिश थी।
इनका मकसद था -
हिंदुओं को डराकर भगाना
जम्मू-कश्मीर की जनसंख्या संरचना बदलना
भारत की संप्रभुता को चुनौती देना
गाँव इतना दूर-दराज था कि सरकार और सुरक्षा बलों तक खबर पहुँचने में 10 घंटे लग गए। जब तक जवान पहुँचे, आतंकी अंधेरे का फायदा उठाकर भाग चुके थे। पीछे बचा था सिर्फ राख, खून और मातम।
परिवारों का पलायन
इस नरसंहार के बाद आस पास के गाँवों के हजारों हिंदू परिवारों ने अपने पुश्तैनी घर छोड़ दिए। 1998 से लेकर आज तक, प्राणकोट नरसंहार के पीड़ित परिवार रियासी जिले के तलवाड़ा प्रवासी शिविर में रह रहे हैं। तीन दशक होने को हैं…वे आज भी न्याय की प्रतीक्षा में हैं। पहचान की उम्मीद में हैं और वापसी की आस लगाए बैठे हैं।
17 अप्रैल का दिन हमें उन निर्दोषों को नमन करने का दिन है, जो सिर्फ इसलिए मार दिए गए क्योंकि वे हिंदू थे। प्राणकोट-डाकीकोट नरसंहार भारत के खिलाफ छेड़े गए उस इस्लामी जिहादी युद्ध का हिस्सा था, जिसमें आतंकियों ने सिर्फ गोलियों से नहीं, बल्कि मासूमियत को कुचलकर युद्ध लड़ा।
यह लेख उस हर हिंदू के नाम है, जो अपने धर्म की कीमत जानता है। जो समझता है कि सहिष्णुता तब तक पुण्य है, जब तक वह कायरता में न बदल जाए।