सैकड़ों कश्मीरी हिंदुओं की बर्बर हत्या, पेडों पर लटका दिये गए शव, सड़क पर फेंक दिये गए अंगों के कटे हिस्से, महिलाओं के साथ रेप और टॉर्चर.
ये था 90 के दशक का कश्मीर, इसके पीछे थे पाकिस्तान समर्थित अलगाववादी और आतंकवादी संगठन. और निशाने पर थे बेकसूर कश्मीरी हिंदू.
इसी हिंसा और तनाव के बीच 19 अप्रैल 1990 को श्रीनगर के डाउन टाउन इलाके में सड़क के किनारे एक 27 साल की कश्मीरी हिंदू लड़की का शव मिलता है. नाम था सरला भट्ट. मामला सुर्खियों में आता है और देखते ही देखते गैंगरेप और बर्बर हत्या की ये घटना उस दौर में कश्मीरी हिंदुओं पर हुए अत्याचार का प्रतीक बन जाती है.
लेकिन अफसोस, 36 साल बाद भी सरला को न्याय नहीं मिल पाया है.
जम्मू कश्मीर का अधिमिलन और पाकिस्तान का हमला
जम्मू कश्मीर, कश्मीरी हिंदू, और 1990 का नरसंहार. इनको समझने से पहले आपको समझने होंगे ये तीन किरदार
पहले हैं अंतिम डोगरा शासक और जम्मू कश्मीर के महाराजा हरिसिंह, दूसरे नेशनल कॉन्फ्रेंस के संस्थापक और जम्मू-कश्मीर के पहले प्रधानमंत्री शेख अब्दुल्ला तीसरे भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू.
स्वतंत्रता के बाद 500 से ज्यादा अलग-अलग रियासतों को भारतीय संघ में मिलाना एक बड़ी चुनौती होती है, इन्हीं में से एक रियासत होती है जम्मू कश्मीर. लेकिन इससे पहले कि भारतीय संघ में उसका अधिमिलन होता, पाकिस्तान जम्मू-कश्मीर पर हमला कर देता है.
21-22 अक्टूबर 1947 की रात पाकिस्तानी सेना मेजर जनरल अकबर खान के नेतृत्व में मुजफ्फराबाद पर हमला करती है. नाम दिया जाता है ऑपरेशन गुलमर्ग. पाकिस्तानी सेना मुजफ्फराबाद पर कब्जा कर लेने के बाद आगे बढ़ती है और 26 अक्टूबर तक डोमेल, ऊरी के कुछ हिस्से और बारामूला पर कब्जा कर लेती है.
पाकिस्तानी मेजर जनरल अकबर खान अपनी किताब "Raiders in Kashmir" में लिखते हैं.
'अधिकारियों को सेना से योजना, सलाह, हथियार, गोला-बारूद, संचार और सैनिकों के रूप में बहुत सहायता की आवश्यकता थी, इस पूरी बात को कमांडर-इन-चीफ और दूसरे वरिष्ठ ब्रिटिश अधिकारियों से गुप्त रखा गया.'
लूटपाट के बाद जब पाकिस्तानी सेना श्रीनगर की तरफ बढ़ती है, 26 अक्टूबर 1947 को महाराजा हरिसिंह भारत के साथ अधिमिलन पत्र पर हस्ताक्षर करते हैं. 27 अक्टूबर को गवर्नर जनरल लॉर्ड माउंटबेटन इसे स्वीकार करते हैं, और इसी के साथ भारतीय सेना 27 अक्टूबर को श्रीनगर पहुंचती है और बचाव अभियान शुरु कर देती है.
नवंबर 1947 तक भारतीय सेना बारामूला-उरी समेत कई क्षेत्रों को पाकिस्तान के कब्जे से वापस ले लेती है.
नेहरू की बड़ी चूक
भारतीय सेना अभी पाकिस्तानी सेना को पीछे खदेड़ ही रही होती है, कि तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू एक बेहद विवादास्पद फैसला लेते हैं, जिसे उनके राजनीतिक करियर की सबसे बड़ी भूलों में से एक माना जाता है, नेहरू 1 जनवरी 1948 को इस मुद्दे को UNSC में उठाते हैं.
UNSC इस मुद्दे पर कई प्रस्ताव पारित करता है. इनमें से एक होता है रिजोल्यूशन-47, जिसे 21 अप्रैल 1948 को पारित किया जाता है. इसके तहत जम्मू-कश्मीर के विलय का फैसला UN की निगरानी में जनमत संग्रह से होना होता है. और शर्त होती है कि पहले पाकिस्तान को जम्मू कश्मीर से अपनी सेना और घुसपैठिए हटाने होंगे. लेकिन पाकिस्तान ये मानने को कभी राजी नहीं होता है.
1 जनवरी 1949 को UNSC की मध्यस्ता से दोनों देशों के बीच सीजफायर होता है. भारत-पाक के बीच एक नई सीमा रेखा बनती है, जिसे नाम दिया जाता है LoC, यानि लाइन ऑफ कंट्रोल. जम्मू-कश्मीर का बड़ा भूभाग पाकिस्तान के अवैध कब्जे में चला जाता है.
शेख ने बोए अलगाववाद के बीज
जब घाटी इस उथलपुथल के दौर से गुजर रही होती है, इसी बीच 1946 में क्वीट कश्मीर आंदोलन चलाने वाले शेख अब्दुल्ला को नेहरू के दबाव पर जेल से छोड़ा जाता है. शेख 5 मार्च 1948 को औपचारिक रूप से जम्मू-कश्मीर के पहले प्रधानमंत्री बनते हैं.
शेख अब्दुल्ला के दबाव पर ही 17 अक्टूबर 1949 को अनुच्छेद 370 भारतीय संविधान का हिस्सा बनता है. घाटी में अलगाववाद के फलने फूलने में इसका भी अहम योगदान होता है.
साल 1952 में शेख अलग झंडा और अलग संविधान बनाकर जम्मू-कश्मीर में हमेशा के लिए अलगाववाद के बीज बो देते हैं.
शेख हमेशा जम्मू-कश्मीर की पूर्ण स्वायत्ता की बात करते थे. नेहरू शेख की इस मंशा को या तो समझ नहीं पाये, या फिर ये उनके राजनीतिक एजेंडे में यह फीट बैठता था, इसलिए इसकी अनदेखी की, नेहरू के इसी अंधे शेख प्रेम की बड़ी कीमत जम्मू-कश्मीर आने वाले वर्षों में चुकाने वाला होता है.
आगे चलकर शेख आजादी और जनमत संग्रह की मांग करते हैं. जिसके बाद 9 अगस्त 1953 को उनको बर्खास्त कर गिरफ्तार कर लिया जाता है.
यही समय होता है जब घाटी में अलगाववाद की भावना जोर पकड़ती है, प्लेबिसाइट फ्रंट जैसी पार्टियां बनती है.
बढ़ता अलगाववाद और 1986 का अनंतनाग दंगा
1950-60 के दशक में अलगाववाद की जो भावना केवल राजनीतिक थी, 1970-80 के दशक में बंदूक के दम पर कश्मीर पर कब्जा कर लेने की बात करने लगती है. जो कि 1989-90 में चरम पर पहुंच जाती है. जिसमें JKLF और हिजबुल मुजाहिदीन जैसे पाकिस्तान समर्थक अलगाववादी-आतंकवादी संगठन अहम भूमिका निभाते हैं.
1982 में शेख अब्दुल्ला की मौत के बाद फारुक अब्दुल्ला मुख्यमंत्री बनते हैं. इस समय अलगाववादी संगठन अधिक सक्रिय होते हैं, घाटी में ISI का प्रभाव बढ़ता है. इस्लामीकरण की कोशिश तेज होती है, कई इलाकों के नाम तक बदल दिये जाते हैं. घाटी में एक के बाद एक बम धमाके होते हैं. जिनके निशाने पर होते हैं, सरकारी ऑफिस, बस और सुरक्षा बल.
आइए एक नजर डालते हैं 15 अगस्त 1983 से लेकर 2 जुलाई 1984 तक घाटी में हुए बम धमाकों पर
कब कहां
15 अगस्त 1983 श्रीनगर स्टेडियम
30 अगस्त 1983 इंडिया कॉफी हाउस
18 नवंबर 1983 न्यायमूर्ति आनंद के आवास के बाहर
29 मार्च 1984 अंदेरनाग नागबल, अनंतनाग
11 अप्रैल 1984 कश्मीर विश्वविद्यालय
26 अप्रैल 1984 पुराना बस स्टैंड, सोपोर
इन बम धमाकों और लगातार बिगड़ते हालातों से कश्मीरी हिंदू खुद को असुरक्षित महसूस करने लगते हैं. बढ़ते अलगाववाद का पहला बड़ा असर दिखता है 1986 के अनंतनाग दंगों में. इसे कश्मीरी हिंदुओं के खिलाफ पहली बड़ी सांप्रदायिक हिंसा भी माना जाता है.
दंगों की शुरुआत 20 फरवरी 1986 अनंतनाग के वानपोह गांव से होती है. मार्च 1986 तक चला यह दंगा पुलवामा, त्राल, सोपोर और बारामूला को भी अपनी चपेट में ले लेता है. सैकड़ों हिंदुओं के घर और दुकानों में तोड़फोड़-आगजनी की जाती है, मंदिर तोड़ दिये जाते हैं. इसका असर ये होता है कि कश्मीरी हिंदू परिवार अनंतनाग से जम्मू-उधमपुर की तरफ पलायन शुरु कर देते हैं.
जगमोहन अपनी किताब 'माई फ्रोज़न टर्ब्यूलेन्स इन कश्मीर' में दंगा पीड़ित हिंदुओं के बारे में लिखते हैं.
'आजकल वो सहमे हुए कबूतरों की तरह रह रहे हैं. कश्मीरी हिंदुओं के चेहरे देखकर मुझे युद्ध के समय जर्मनी में गैस चैंबर में ले जाए जाने से पहले यहूदियों के चेहरों की याद आती है'
इतना ही नहीं, स्थानीय प्रशासन और सरकार इसे ढंकने की कोशिश करते हैं, जगमोहन लिखते हैं.
'यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि प्रमंडल और जिला प्रशासन ने तथा राज्य सरकार ने मुझे और केंद्र सरकार को गलत रिपोर्ट भेजी है'
1990 का नरसंहार और कश्मीरी हिंदुओं का पलायन
अनंतनाग दंगों के बाद राज्यपाल जगमोहन 6 मार्च 1986 को गुलाम मोहम्मद शाह की सरकार बर्खास्त कर राष्ट्रपति शासन लगा देते हैं. लेकिन हालात सुधरने की जगह लगातार बिगड़ते चले जाते हैं. JKLF समेत पाकिस्तान समर्थित हिजबुल मुजाहिदीन, अल्लाह टाइगर्स जैसे आतंकी और अलगाववादी संगठनों इसके पीछे होते हैं. आजादी और कश्मीर छोड़ो के नारों के साथ प्रतिष्ठित कश्मीरी हिंदुओं को टारगेट करना शुरु हो जाता है.
14 अक्टूबर 1989 को श्रीनगर में प्रख्यात वकील और चर्चित बीजेपी नेता टीका लाल टपलू की दिनदहाड़े हत्या कर दी जाती है, इसे पहली बड़ी टारगेट किलिंग माना जाता है.
जनवरी 1990 के आते-आते हालात काबू से बाहर हो जाते हैं. 18-19 जनवरी 1990 की रात घाटी में ब्लैक आउट होता है. हिंदुओं से महिलाओं-बेटियों को छोड़कर चले जाने को कहा जाता है. मस्जिदों के लाउड स्पीकरों पर भड़काऊ नारे लगाए जाते हैं. जैसे
'कश्मीर में रहना है तो अल्लाह-हू-अकबर कहना होगा'
'हम क्या चाहें, निजामे मुस्तफा'
'असी गच्छी पाकिस्तान, बटो रोस ते बटनेव सान'
(हम पाकिस्तान बनाएंगे, हिंदू महिलाओं के साथ लेकिन पुरुषों के बिना)
जगमोहन 'माई फ्रोज़न टर्ब्यूलेन्स इन कश्मीर' में लिखते हैं.
‘मेरे बिस्तर के किनारे रखे टेलीफोन की घंटी लगातार बजने लगी, दूसरी तरफ से आवाजें आ रही थीं, 'सुबह तक हम सभी कश्मीरी हिंदुओं की हत्या कर दी जाएगी'. 'हमारी माता-बहनों का अपहरण कर लिया जाएगा, और मर्दों की हत्या कर दी जाएगी'. कुछ फोन करने वालों ने मुझे फोन पर बने रहने के लिए कहा, ताकि वहां की मस्जिदों के ऊपर लगे सैकड़ों लाउड स्पीकरों से निकलने वाले नारों और उत्तेजक उपदेशों को सुन सकूं.'
सैकड़ों हिंदुओं को मौत के घाट उतार दिया जाता है. हिंदू महिलाओं और बेटियों से रेप किया जाता है. घर और मंदिर जला दिये जाते हैं. जमकर लूटपाट की जाती है. रातों-रात हजारों कश्मीरी हिंदू परिवार घाटी छोड़ने के लिए मजबूर होते हैं. एक अनुमान के मुताबिक इस दौरान करीब पांच लाख कश्मीरी हिंदू जम्मू-दिल्ली जैसे दूसरे सुरक्षित शहरों का रुख करते हैं.
गैंगरेप के बाद सरला भट्ट की बर्बर हत्या
इसके बाद भी कुछ कश्मीरी हिंदू घाटी में बने रहते हैं, इस उम्मीद में कि शायद समय के साथ एक बार फिर हालात ठीक हों, लेकिन अलगाववादी ऐसे लोगों को चुन-चुन कर टारगेट करने लगते हैं.
अलगाववादियों के पास ऐसे कश्मीरी हिंदुओं की लिस्ट होती है, और उसी लिस्ट में एक नाम होता है, सरला भट्ट.
अनंतनाग के काजीबाग की रहने वाली 27 साल की सरला भट्ट श्रीनगर के शेर-ए-कश्मीर इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस में बतौर नर्स तैनात थी. उसे लगातार नौकरी छोड़ने और घाटी से चले जाने की धमकियां मिल रही थीं. लेकिन सरला अलगाववादियों की इन धमकियों को नजरअंदाज करती है, जिसकी कीमत उसे जान देकर चुकानी पड़ती है.
14 अप्रैल 1990 को उसे JKLF के आतंकी मेडिकल कॉलेज के हॉस्टल से उसे किडनैप कर लेते हैं, 19 अप्रैल 1990 को गोलियों से छलनी उसकी डेड बॉडी श्रीनगर में ही एक सड़क के किनारे लावारिस हालत में मिलती है. हत्या से पहले पांच दिनों तक उसके साथ बर्बर गैंगरेप किया जाता है, इसकी पुष्टि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में भी होती है.
36 साल बाद भी न्याय का इंतजार
उस समय मामले में FIR तो दर्ज होती है, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं होती. 35 साल बाद अगस्त 2025 में LG के आदेश पर केस को फिर से खोला जाता है. SIA मामले की जांच शुरु करती है. 12 अगस्त 2025 को आर्म्स एक्ट और टाडा के तहत श्रीनगर में 8 स्थानों पर रेड की जाती है. इसमें JKLF के पूर्व चीफ यासीन मलिक समेत दूसरे कमांडरों के आवास भी शामिल होते हैं. दावा किया जाता है कि जांच में आतंकी साजिश से जुड़े अहम सबूत बरामद हुए थे.
जांच जारी है, देखना होगा कि आरोपियों को क्या सजा मिलती है, लेकिन कड़वी सच्चाई ये है कि कश्मीरी हिंदुओं के खिलाफ बर्बर अत्याचार के मामले को खुलने में 35 साल का समय लग जाता है. आरोपी अलगाववादी और आतंकी सत्ता का संरक्षण पाते हैं. खुलेआम आजाद घूमते हैं. वो भी एक लोकतांत्रिक देश में. कानूनी तंत्र और मानवाधिकार संगठन मूकदर्शक बने दिखाई पड़ते हैं.
सरला भट्ट अकेली नहीं है, उसके जैसे सैकड़ों बर्बर तरीके से मार दिये गए कश्मीरी हिंदुओं के परिजनों को इतने सालों बाद आज भी न्याय का इंतजार है...लेकिन ये इंतजार कभी खत्म होगा, बड़ा सवाल है ?