पाकिस्तान इस समय केवल आर्थिक संकट से नहीं जूझ रहा, बल्कि वह वैश्विक दबावों, गलत नीतिगत फैसलों और बढ़ती निर्भरता के एक जटिल जाल में फंसता जा रहा है। पश्चिम एशिया में ईरान को लेकर बढ़ते तनाव ने जहां वैश्विक ऊर्जा बाजार को अस्थिर कर दिया है, वहीं पाकिस्तान की आंतरिक आर्थिक कमजोरियां इस संकट को और गहरा कर रही हैं।
ताजा घटनाक्रम में पाकिस्तान सरकार ने पेट्रोल और डीजल की कीमतों में ऐतिहासिक बढ़ोतरी करते हुए पेट्रोल को 458 पाकिस्तानी रुपये प्रति लीटर तक पहुंचा दिया है, जबकि डीजल की कीमत 500 रुपये के पार पहुँच चुकी है। यह वृद्धि ऐसे समय में हुई है, जब देश पहले से ही महंगाई और गिरती अर्थव्यवस्था से जूझ रहा है। इसके अलावा पाकिस्तान में खाद्य पदार्थों की कीमतें भी सातवें आसमान पर पहुँच चुका है।
IMF के दबाव में सरकार का बड़ा फैसला
जानकारों के अनुसार, ईंधन की कीमतों में यह उछाल अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के दबाव का सीधा परिणाम है। कर्ज की अगली किस्त पाने के लिए पाकिस्तान को ईंधन सब्सिडी खत्म करनी पड़ी है। सरकार ने ‘टार्गेटेड सब्सिडी’ का वादा जरूर किया है, लेकिन इसका लाभ सीमित वर्ग तक ही पहुंचने की आशंका है। विशेषज्ञ मानते हैं कि इस फैसले का सबसे बड़ा असर मध्यम वर्ग पर पड़ेगा, जो न तो सरकारी राहत योजनाओं में शामिल है और न ही बढ़ती कीमतों को सहन करने की स्थिति में। शायद यही कारण है कि अब पाकिस्तान के कई शहरों में विरोध की आग भी सुलगने लगी है। पाकिस्तानी आवाम सरकार के खिलाफ लामबंद हो रही है और बढती महंगाई को लेकर प्रदर्शन भी कर रही है।
हर घर पर महंगाई की सीधी मार
पेट्रोल-डीजल की कीमतों में वृद्धि का असर केवल परिवहन तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह खाद्य वस्तुओं, रोजमर्रा की जरूरतों और सेवाओं के दामों में व्यापक बढ़ोतरी का कारण बनता है। पाकिस्तान में पहले से ही खाद्य महंगाई उच्च स्तर पर है, ऐसे में ईंधन की कीमतों में यह उछाल आम नागरिकों के लिए दोहरी मार साबित हो रहा है। स्थिति यह है कि रसोई से लेकर रोजमर्रा के खर्च तक, हर स्तर पर आम आदमी की जेब पर दबाव बढ़ता जा रहा है। देश के कई हिस्सों में इस मुद्दे को लेकर असंतोष भी तेजी से बढ़ रहा है।
नीतिगत विफलता और घटते विकल्प
आर्थिक विश्लेषकों का मानना है कि पाकिस्तान सरकार के पास राजस्व बढ़ाने के पारंपरिक विकल्प लगभग समाप्त हो चुके हैं। हाल ही में पंजाब सरकार द्वारा पशुधन पर ‘गोबर टैक्स’ लगाने जैसे प्रस्ताव इस बात का संकेत देते हैं कि आर्थिक संकट कितना गहरा हो चुका है।
इसके साथ ही, अमेरिका के साथ बढ़ती रणनीतिक नजदीकियां और संसाधनों के निर्यात को लेकर उठ रहे सवाल भी देश की आर्थिक संप्रभुता पर बहस को जन्म दे रहे हैं। पिछले वर्ष अक्टूबर में दुर्लभ पृथ्वी खनिजों की पहली खेप अमेरिका को भेजे जाने को भी इसी संदर्भ में देखा जा रहा है।
संकट केवल आर्थिक नहीं, नीतिगत भी
पाकिस्तान की मौजूदा स्थिति यह स्पष्ट संकेत देती है कि आर्थिक संकट केवल बाहरी कारणों का परिणाम नहीं होता, बल्कि यह दीर्घकालिक नीतिगत चूक और असंतुलित विदेश नीति का भी नतीजा होता है। ईरान संकट ने भले ही वैश्विक ऊर्जा बाजार को प्रभावित किया हो, लेकिन जिस प्रकार पाकिस्तान इस झटके से बुरी तरह डगमगा गया है, वह उसकी आंतरिक कमजोरियों को उजागर करता है। यदि समय रहते संरचनात्मक सुधार, आत्मनिर्भरता और संतुलित कूटनीति पर ध्यान नहीं दिया गया, तो यह संकट और गहरा सकता है, जिसकी सबसे बड़ी कीमत देश की आम जनता को चुकानी पड़ेगी।