
क्या पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के लिए न्याय सिर्फ एक भ्रम बनकर रह गया है? कट्टरपंथियों के मुल्क पाकिस्तान से एक बार फिर ऐसा मामला सामने आया है जिसने न केवल इंसानियत को झकझोर दिया है, बल्कि वहां की न्याय व्यवस्था को भी कठघरे में खड़ा कर दिया है। रिपोर्ट्स के अनुसार, 13 वर्षीय ईसाई लड़की मारिया का कथित तौर पर अपहरण कर लिया गया। उसे महीनों तक बंधक बनाकर रखा गया, उसके साथ दुष्कर्म किया गया, फिर जबरन धर्मांतरण कराया गया और अंततः 34 साल के शख्स के साथ उसका निकाह कर दिया गया।
पीड़िता के परिवार ने न्याय की गुहार लगाई, लेकिन अदालत से मिला फैसला हैरान करने वाला रहा। पाकिस्तान की शरीयत अदालत ने लड़की की कस्टडी उसी व्यक्ति को सौंप दी, जिस पर अपहरण और शोषण जैसे गंभीर आरोप लगे हैं। इस फैसले ने न्यायिक प्रक्रिया की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जहां एक ओर पीड़िता को संरक्षण मिलना चाहिए था, वहीं दूसरी ओर आरोपी के पक्ष में निर्णय ने पूरे मामले को विवादों के घेरे में ला दिया है।
इस पूरे घटनाक्रम पर लाहौर के चर्च -Archdiocese of Lahore ने कड़ी आपत्ति जताई है। चर्च द्वारा जारी आधिकारिक बयान में इस फैसले को “न्याय की विफलता” बताते हुए कहा गया है कि यह निर्णय अल्पसंख्यकों की सुरक्षा और उनके अधिकारों के खिलाफ एक खतरनाक संदेश देता है।
पाकिस्तान में जबरन धर्मांतरण के मामले लंबे समय से चिंता का विषय रहे हैं। मानवाधिकार संगठनों के अनुसार, हर साल सैकड़ों नाबालिग लड़कियों के अपहरण और जबरन धर्मांतरण की घटनाएं सामने आती हैं, जिनमें से कई मामलों में पीड़ितों को न्याय नहीं मिल पाता।
यह घटना एक बार फिर उस कड़वी सच्चाई को सामने लाती है कि पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की स्थिति कितनी असुरक्षित है। सवाल यही है जब अदालत से भी इंसाफ न मिले, तो पीड़ित आखिर जाएं तो जाएं कहां?