Nehru Liaquat Pact 1950: दिल्ली… 8 अप्रैल 1950 : एक तरफ सत्ता के गलियारों में चल रही गुप्त बैठकों की सरगोशियाँ और दूसरी तरफ विभाजन की आग में झुलसते लाखों लोगों की चीखें…
उसी दिल्ली में, एक बंद कमरे के भीतर, भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री लियाकत अली खान के बीच एक ऐसा समझौता हुआ, जिसे इतिहास ने “नेहरू-लियाकत पैक्ट” के नाम से दर्ज किया। लेकिन इस समझौते की गूंज जितनी कूटनीतिक थी, उतनी ही तीखी थी उसकी आलोचना और उस विरोध का सबसे मुखर चेहरा थे डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी।
पृष्ठभूमि: विभाजन की त्रासदी और खून से लथपथ सरहदें :
1947 का विभाजन…महज एक लकीर खींच जानें के बाद भारत और पाकिस्तान के रूप में दो नए राष्ट्र तो बने, लेकिन इसके साथ ही शुरू हुआ मानवीय इतिहास का सबसे दर्दनाक पलायन और पलायन की आड़ में नृशंस हत्याओं का दौर।
पाकिस्तान में हिंदुओं और सिखों पर अत्याचार अपने चरम पर था। इस्लामिक कट्टरपंथियों द्वारा हिन्दुओं और सिखों के घर जलाए जा रहे थे, संपत्तियाँ लूटी जा रही थीं, महिलाओं के साथ बलात्कार की घिनौनी घटनाओं को अंजाम दिया जा रहा था और लाखों निहत्थे मासूमों की जान ली जा रही थी।
विभाजन के बाद पलायन का दृश्य
जम्मू-कश्मीर पर हमला, सीमाओं पर तनाव, और दोनों देशों के बीच युद्ध जैसे हालात…ऐसे समय में जरूरत थी किसी ऐसे कदम की, जो हालात को काबू में ला सके। इसी बीच स्थिति को काबू करने के लिए देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु और तब के पाकिस्तानी पीएम लियाकत अली खान के बीच एक समझौता हुआ जिसे नेहरु-लियाकत समझौता का नाम दिया गया।
1950 में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री लियाकत अली खान दिल्ली आए थे। वे करीब 6 दिनों तक दिल्ली में रुके। दोनों देशों के बीच लम्बी बातचीत होती है। 8 अप्रैल 1950 को भारत और पाकिस्तान के बीच दिल्ली में समझौता होता है, इस समझौते के पीछे सिर्फ और सिर्फ दो लोग होते हैं। भारत की तरफ से नेहरू और पाकिस्तान के प्रधान मंत्री लियाकत अली खान। इसके अलावा नेहरु इस बैठक में किसी को शामिल नहीं करते।
समझौता: शांति की कोशिश या राजनीतिक भूल?
6 दिनों तक चली बातचीत के बाद 8 अप्रैल 1950 को यह समझौता हुआ। इसका उद्देश्य था :
दोनों देशों में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना
पलायन को रोकना और युद्ध की आशंका को टालना
मुख्य बिंदु:
प्रवासियों को सुरक्षित आवागमन की अनुमति
अपहृत महिलाओं की वापसी
कब्जाई गई संपत्तियों को लौटाना
जबरन धर्मांतरण पर रोक
अल्पसंख्यकों को बराबरी और सुरक्षा का अधिकार
भड़काऊ प्रचार पर प्रतिबंध
कागज़ पर यह समझौता आदर्श था…लेकिन ज़मीन पर इसकी सच्चाई कुछ और थी। हालाँकि यह सब भारत में तो सम्भव हुआ लेकिन पाकिस्तान ने इस समझौते की अवहेलना होती रही। पाकिस्तान जब से आस्तित्व में आया तब से वहां रहने वाले अल्पसंख्यकों पर अत्याचार होता ही रहा।
मुखर्जी का विरोध: एक दूरदर्शी चेतावनी
अल्पसंख्यकों पर जारी अत्याचार और इस समझौते से होने वाले दुष्प्रभाव को देखते हुए डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने इस समझौते को सिरे से खारिज कर दिया। उनका साफ कहना था यह समझौता एकतरफा है, और इसका सबसे बड़ा खामियाजा भारत के हिंदुओं को भुगतना पड़ेगा।
उनका मानना था कि पाकिस्तान इस समझौते का पालन नहीं करेगा, वहाँ अल्पसंख्यकों पर अत्याचार जारी रहेगा और भारत सिर्फ कागज़ी आश्वासनों में उलझकर रह जाएगा। मुखर्जी की चेतावनी में एक गहरी चिंता थी। एक ऐसी चिंता, जो आने वाले समय में सच साबित होती दिखी।
सिद्धांतों के लिए सत्ता का त्याग
जब उनकी आवाज़ अनसुनी कर दी गई, तो डॉ. मुखर्जी ने एक बड़ा कदम उठाया। उन्होंने नेहरू मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया। यह सिर्फ एक राजनीतिक निर्णय नहीं था, यह एक सिद्धांतों के लिए लिया गया साहसिक निर्णय था।
जनसंघ की स्थापना :
कैबिनेट छोड़ने के बाद, 1951 में मुखर्जी ने भारतीय जनसंघ की स्थापना की जो आगे चलकर 1980 में भारतीय जनता पार्टी बनी। नेहरु की नीतियों से हुआ मोहभंग अब बड़े स्तर पर बढ़ चुका था। लियाकत समझौता ही नहीं बल्कि जम्मू कश्मीर में दो विधान, दो निशान, दो प्रधान और दो संविधान के फैसले के भी डॉ. मुखर्जी घोर विरोधी थे। देश से आर्टिकल 370 को ख़त्म करने को लेकर अनेकों प्रयास किए हालाँकि सत्ता में स्थिति कमजोर होने के कारण उस वक्त तो यह संभव नहीं हुआ लेकिन 2014 में मोदी सरकार के आने के बाद यह मुद्दा फिर गरमाया और जमीनी स्तर पर काम शुरू हुआ और 5 अगस्त 2019 को जम्मू कश्मीर 370 की बेड़ियों से आजाद हुआ।
इसके अलावा जब देश में मोदी सरकार ने CAA कानून के नियमों को लागू किया तो उस उस पर बात करते हुए कई दफा गृहमंत्री अमित शाह ने इस समझौते का जिक्र किया। 2019 में लोकसभा में नागरिकता संशोधन विधेयक को सही ठहराते हुए गृह मंत्री अमित शाह ने नेहरू-लियाकत समझौते का उल्लेख करते हुए कहा था कि अगर नेहरू-लियाकत समझौता अच्छे से लागू होता और पाकिस्तान इस संधि का पालन किया गया होता, तो इस विधेयक को लाने की कोई आवश्यकता नहीं होती।