14 मई 2002…जम्मू का कालूचक इलाका,
सुबह का समय था, सड़कों पर सामान्य आवाजाही थी। राष्ट्रीय राजमार्ग पर गाड़ियां रोज की तरह गुजर रही थीं। सब कुछ सामान्य दिखाई दे रहा था। लेकिन कुछ ही मिनटों बाद यही इलाका गोलियों की आवाज और चीखों से गूंज उठा।
उस दिन पाकिस्तान समर्थित आतंकियों ने न सिर्फ सैनिकों को निशाना बनाया था, बल्कि उनके परिवारों को भी गोलियों से छलनी कर दिया था..
जब हमला खत्म हुआ, तब तक 31 लोग बलिदान हो चुके थे और करीब 50 लोग घायल। मृतकों में महिलाएं थीं, बच्चे थे, सेना के जवान थे…और एक दो महीने की मासूम बच्ची भी थी, जिसकी आँखें भी अभी सही ढंग से नहीं खुली थीं। यह दर्दनाक कहानी है कालूचक नरसंहार की..
कहानी कालूचक नरसंहार की :
कारगिल युद्ध के महज 17 महीने बाद हुआ कालूचक नरसंहार उस दौर की सबसे भयावह आतंकी घटनाओं में गिना गया। यह वह हमला था, जिसने भारत और पाकिस्तान को एक बार फिर युद्ध के मुहाने पर ला खड़ा किया था।
उस दौरान विदेश मंत्री रहे जसवंत सिंह अपनी किताब ‘ए कॉल टू ऑनर - इन सर्विस ऑफ़ इमर्जेंट इंडिया’ में लिखते हैं, “कालूचक की आतंकी घटना एक आखिरी तिनके की तरह थी जिसने भारत और पाकिस्तान को एक बार फिर युद्ध के एकदम नजदीक ला दिया था।”
14 मई 2002 को हिमाचल पर्यटन की एक बस मनाली से जम्मू राष्ट्रीय राजमार्ग पर अपने गंतव्य की ओर बढ़ रही थी। बस जब विजयपुर इलाके में पहुंची, तब उसमें तीन आतंकी चढ़ते हैं। तीनों ने भारतीय सेना जैसी वर्दी पहन रखी थी। शुरुआती तौर पर किसी को उन पर शक नहीं हुआ। लेकिन कालूचक पुल के पास पहुंचते ही अचानक बस के भीतर गोलियां चलने लगीं। आतंकियों ने ड्राइवर, कंडक्टर और यात्रियों पर अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी, जिसमें 7 लोगों की मौत हुई। बस के अंदर अफरा-तफरी मच गई। लोग अपनी जान बचाने के लिए सीटों के नीचे छिपने लगे। कुछ ही मिनटों में बस के अंदर खून और चीख-पुकार का मंजर था।
हिमाचल परिवहन की बस जिसे आतंकियों ने बनाया निशाना
आर्मी क्वॉर्टर बना अगला निशाना
बस पर हमला करने के बाद तीनों आतंकी सीधे कालूचक स्थित आर्मी कैंप की ओर बढ़े। यह सैन्य क्षेत्र था, जहां जवानों के परिवार रहते थे। आतंकियों ने क्वॉर्टरों में घुसकर फायरिंग शुरू कर दी। ग्रेनेड फेंके, ऑटोमैटिक हथियारों से लगातार गोलियां बरसाई। आतंकी हमले के बाद पूरे इलाके में चीख-पुकार मच गई थी। आतंकियों ने आर्मी कैंप में करीब 23 लोगों को अपना निशाना बनाया। बलिदान होने वालों में 10 बच्चे, 8 महिलाएं, 3 सेना के जवान और 10 आम नागरिक शामिल थे। करीब आधे घंटे तक चला यह हमला पूरे देश को झकझोर देने वाला था।
31 लोगों का बलिदान, मासूम बच्ची भी शामिल
आतंकियों के इस हमले में करीब 31 लोग बलिदान हो चुके थे और करीब 50 लोग घायल। मृतकों में सेना के जवानों के अलावा उनकी पत्नियां और बच्चे भी शामिल थे। इन्हीं में एक, दो महीने की मासूम बच्ची भी थी, जिसकी मौत की खबर ने पूरे देश को भावुक कर दिया था। पाकिस्तान प्रायोजित यह एक सुनियोजित आतंकी साजिश थी, जिसका लक्ष्य सीधे तौर पर सेना को निशाना बनाना था।
आर्मी कैंप
बलिदानियों के नाम
हवलदार रूप चंद
बटालियन हवलदार मेजर मंजीत सिंह
हवलदार MS चौहान
गगनदीप कौर (दो माह की बच्ची) मेजर मंजीत सिंह की बेटी
8 वर्षीय आँचल पुत्री हवलदार सुरेन्द्र कुमार
अमनदीप कौर (2 वर्ष) पुत्री सिपॉय गुरलाल सिंह
देवेन्द्र सिंह (3 साल) पुत्र मेजर मंजीत सिंह
अमन यादव (5 वर्ष) पुत्र CQMH आरके यादव
अमनदीप कौर (5 साल) पुत्र सूबेदार अतर सिंह
मूली (6 वर्ष) पुत्री CMQH RDP सिंह
जितेंद्र सिंह (12 वर्ष) पुत्र सूबेदार अतर सिंह
नीतू (14 वर्ष ) पुत्री हवलदार एचएस चौहान
डिम्पल (18 वर्ष) पुत्री सूबेदार गुरुदेव सिंह
जोगेंद्र कौर पत्नी लांस नायक हरभजन सिंह
ललिता कुमारी पत्नी CMQH RK यादव
राया चौहान पत्नी हवलदार चौहान
बलजीत कौर पत्नी सीपॉय गुरलाल सिंह
पूनम देवी पत्नी हवलदार सुरेंद्र कुमार
प्रेमवती पत्नी सूबेदार जेएन यादव
जसविंदर कौर पत्नी सूबेदार गुरुदेव सिंह
अवलोधन देवी पत्नी कंपनी क्वॉर्टर मास्टर हवलदार RDP
परमेश्वरी पत्नी भगत राम
किशनजी रैना
सुनैना देवी पत्नी भूप सिंह
प्रेम सिंह और दो अन्य व्यक्ति जिनका पहचान संभव ना हो सका।
जांच में सामने आया पाकिस्तानी कनेक्शन
आतंकियों द्वारा हमले को अंजाम देने के तुरंत बाद सेना ने तीनों आतंकियों को मार गिराया था। अगली सुबह जांच एजेंसी ने मरने वाले उन आतंकियों की पहचान अबु सुहैल (फैसलाबाद), अबु मुर्शिद (गुजरांवाला) और अबु जावेद (गुजरांवाला) के तौर पर की थी। इन आतंकियों के पास से बिस्किट, चॉकलेट और कुछ आपत्तिजनक वस्तुएं बरामद हुईं जिससे जांच में पता चला कि इनका कनेक्शन पाकिस्तान से था।
उस दौरान इस घटना पर जानकारी देते हुए तत्कालीन गृहमंत्री लाल कृष्ण आडवानी ने लोकसभा में बताया था कि इस घटना के पीछे लश्कर-ए-तैयबा का हाथ था।
युद्ध के मुहाने पर थे भारत-पाकिस्तान
कालूचक हमला ऐसे समय हुआ था, जब भारत और पाकिस्तान के बीच पहले से ही भारी तनाव चल रहा था। दिसंबर 2001 में भारतीय संसद पर हमला हो चुका था। इसके बाद भारत ने सीमा पर बड़ी संख्या में सेना तैनात कर दी थी। दोनों देशों के बीच युद्ध जैसे हालात बन चुके थे। ऐसे माहौल में कालूचक नरसंहार ने देशभर में गुस्से की लहर पैदा कर दी। पाकिस्तान के खिलाफ कड़ी सैन्य कार्रवाई की मांग तेज होने लगी।
तत्कालीन विदेश मंत्री जसवंत सिंह ने अपनी किताब ‘ए कॉल टू ऑनर’ में लिखा था: “कालूचक घटना वह आखिरी तिनका थी, जिसने भारत और पाकिस्तान को युद्ध के एकदम करीब ला दिया था।”
तत्कालीन PM वाजपेयी का संदेश
स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी थी कि तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को जम्मू-कश्मीर का दौरा करना पड़ा। उन्होंने कालूचक के घायलों से मुलाकात की और बाद में कुपवाड़ा में सेना के जवानों को संबोधित किया।
मीडिया से बातचीत में वाजपेयी ने कहा:
“हमारे पड़ोसी द्वारा फेंकी गई चुनौती को भारत ने स्वीकार कर लिया है और दुश्मन के खिलाफ हम अपनी निर्णायक जीत की तैयारी कर रहे हैं।”
उस समय यह बयान बेहद महत्वपूर्ण माना गया। इसे पाकिस्तान के लिए सीधा संदेश समझा गया था।
जब एयर स्ट्राइक की चर्चा शुरू हुई
कालूचक हमले के बाद भारत की सैन्य प्रतिक्रिया को लेकर चर्चाएं तेज हो गईं। कई रक्षा विशेषज्ञों और मीडिया रिपोर्ट्स में दावा दावा किया गया कि उस समय भारतीय वायुसेना को सीमापार आतंकी ठिकानों पर कार्रवाई के लिए तैयार किया गया था। मिराज-2000, जगुआर और मिग-21 विमानों की तैनाती की खबरें सामने आईं। बताया जाता है कि पाकिस्तान अधिक्रांत जम्मू कश्मीर के केल सेक्टर और लूंडा पोस्ट के आस पास कार्रवाई की योजना बनी थी। हालांकि इस पूरी कार्रवाई पर आज तक कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया।
भारत की तरफ से युद्ध से बचाव के सभी उपायों पर विचार किया जा रहा था। दूसरी तरफ पाकिस्तान के तानाशाह राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ भारत को लगातार उकसाने का काम कर रहा था। युद्ध के बादलों के बीच पाकिस्तान ने अपनी तीन मिसाइलों - गौरी, गजनवी और अब्दाली का परीक्षण कर दिया। पाकिस्तानी सेना लगातार आतंकियों की घुसपैठ और गोलीबारी कर रही थी। बताया जाता है कि भारत-पाकिस्तान सीमा पर स्थित लूंडा पोस्ट पर पाकिस्तानी सेना ने कब्जा जमा लिया था। माछिल सेक्टर की लूंडा पोस्ट सामरिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है। यहाँ से पाकिस्तान अधिक्रांत जम्मू-कश्मीर के केल सेक्टर पर नज़र रखी जाती है। भारत में अधिकतर आतंकी घुसपैठ इसी केल सेक्टर की तरफ से होती रही है।
अब तत्कालीन भारत सरकार के आगे दो सवाल खड़े हो गए थे। पहला कालूचक नरसंहार के दोषी पाकिस्तान को सबक सिखाना था। दूसरा अपनी पोस्ट को पाकिस्तान के कब्जे से वापस लेना था। तभी प्रधानमंत्री वाजपेयी ने 23 जून को वाशिंगटन पोस्ट को एक साक्षात्कार दिया। उन्होंने खुलासा किया कि पाकिस्तान और पाकिस्तान अधिक्रांत जम्मू-कश्मीर में 50 से 70 आतंकी कैंप मौजूद है। संवाददाता ने जब उनसे पूछा कि क्या भारत और पाकिस्तान युद्ध के नजदीक हैं, तो प्रधानमंत्री ने इसे ‘टच एंड गो अफेयर’ बताया।
हवाई हमला! :
इसे भारत की शुरुआती सीमापार हवाई कार्रवाई की तैयारी के संकेत के रूप में देखा गया। इसकी जिम्मेदारी भारतीय वायुसेना को दी गयी थी। एक ठोस योजना बनाने के बाद 31 जुलाई को अम्बाला एयर फ़ोर्स स्टेशन से फ्लाइट लेफ्टिनेंट की एक टीम को श्रीनगर भेजा गया। इस दौरान ग्वालियर और जालंधर के एयर फ़ोर्स स्टेशन पर मिराज 2000, जगुआर और मिग-21 की तैनाती कर दी गयी। इस एयर स्ट्राइक की तैयारी बेहद सावधानी से की जा रही थी। फिर भी सुरक्षा के लिए भारत की पश्चिमी सीमा पर सभी एयर फ़ोर्स स्टेशन को सतर्क रहने के लिए कहा गया। इसका एक कारण किन्ही असामान्य स्थिति में अगर पाकिस्तान कुछ प्रतिक्रिया करता है तो उसका तुरंत जवाब देना था।
इस कार्यवाही में भारतीय सीमा सुरक्षा के जवानों को पहले सीमा के पास लक्ष्य को स्पष्ट करने (target identify) के लिए भेजा गया। इस काम को सफलता से पूरा करने के बाद वे अपनी पोस्ट पर वापस लौट आए। अब बारी भारतीय वायुसेना की थी, लेकिन मौसम साथ नहीं दे रहा था। इसलिए दिल्ली में अधिकारियों की तरफ से ‘ग्रीन सिग्नल’ मिलने के बाद भी दो बार सेना को पीछे हटना पड़ा। आखिरकार 2 अगस्त, 2002 की दोपहर में एक साथ कई मिराज 2000 ने केल सेक्टर के ऊपर से उड़ान भरी। भारतीय वायुसेना के विमान पाकिस्तान अधिक्रांत जम्मू-कश्मीर में अन्दर तक गए थे। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार इस एयर स्ट्राइक में पाकिस्तान को बहुत नुकसान हुआ था। भारी बमबारी के बाद लूंडा पोस्ट को वापस ले लिया गया था। हालाँकि पाकिस्तान की तरफ से आज तक इसका कोई प्रतिकार नहीं किया गया। इस सन्दर्भ में जानकारियां बेहद सीमित हैं, क्योंकि इस स्ट्राइक पर कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया था, न ही इसका कहीं जिक्र किया जाता है।
आतंकवाद के खिलाफ भारत की नई नीति
कालूचक नरसंहार आज भी भारत के आतंकवाद विरोधी इतिहास की सबसे दर्दनाक घटनाओं में गिना जाता है। 2002 के उस हमले के बाद भी पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद नहीं रुका और उरी से लेकर पुलवामा तक कई बड़े आतंकी हमले हुए।
लेकिन 2014 के बाद से आतंकवाद के खिलाफ भारत की रणनीति बदल चुकी है। अब भारत सिर्फ हमलों की निंदा तक सीमित नहीं रहा, बल्कि आतंकवाद को उसके ठिकानों पर जाकर जवाब देने की नीति अपना चुका है। उरी हमले के बाद भारतीय सेना ने POJK में घुसकर सर्जिकल स्ट्राइक की, जबकि पुलवामा हमले के बाद बालाकोट एयर स्ट्राइक के जरिए आतंकियों के ठिकानों को निशाना बनाया गया।
इसके बाद पहलगाम आतंकी हमले के जवाब में 6-7 मई 2025 को चलाए गए ‘ऑपरेशन सिंदूर’ ने भी दुनिया को साफ संदेश दिया कि नया भारत आतंकवाद को किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं करेगा, और जरूरत पड़ने पर सीमा पार जाकर भी जवाब देगा।
कालूचक नरसंहार में बलिदान होने वाले सभी पुण्यात्माओं को नमन....