दिल्ली, बिहार विधानसभा चुनावों में लैंडस्लाइड विक्ट्री के बाद 4 मई 2026 को बीजेपी इस सूची में एक और नाम जोड़ती है, पश्चिम बंगाल.
लेकिन उसके लिए ये जीत बाकि राज्यों से बहुत अलग और बेहद खास होती है, खासकर उस जगह जहां उस पर बाहरी होने का आरोप लगता है. लेकिन सच्चाई इसके ठीक उलट है. क्योंकि डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी, भारतीय जनसंघ के संस्थापक, जो कि बाद में बीजेपी बनती है, बंगाल के ही थे.
सुदूर पूर्व बंगाल में जन्मा एक शख्स, अखंड भारत की बात करता है, और सुदूर उत्तर के राज्य जम्मू कश्मीर के भारत में पूर्ण विलय की मांग को लेकर अपनी जान दे देता है.
आखिर कौन थे श्यामा प्रसाद मुखर्जी? क्या था उनका जम्मू कश्मीर कनेक्शन? और उनके गृह राज्य में बीजेपी की इस जीत के क्या हैं मायने. समझते हैं इस लेख में.
प्रारंभिक जीवन और शिक्षा
कोलकाता के भवानीपुर में 6 जुलाई 1901 को प्रख्यात शिक्षाविद्, राष्ट्रवादी चिंतक और राजनेता डॉ.श्यामा प्रसाद मुखर्जी का जन्म हुआ था. पिता आशुतोष मुखर्जी कलकत्ता यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर थे. श्यामा प्रसाद पढ़़ने में तेज और बेहद प्रतिभाशाली छात्र थे. उन्होंने 1917 में मैट्रिक और 1919 में इंटरमडिएट करने के बाद 1921 में प्रेसिडेंसी कॉलेज कलकत्ता से अंग्रेजी विषय में बीए किया. स्नातक में उन्होंने पूरे विश्वविद्यालय में टॉप किया. 1923 में कलकत्ता यूनिवर्सिटी से एमए किया. 1924 में बैचलर ऑफ लॉ करने के बाद 1926 में कानून की हायर स्टडीज के लिए इंग्लैंड गए. 1927 में बैरिस्टर बनकर लौटे और महज 26 साल की उम्र में कलकत्ता यूनिवर्सिटी सिनेट के फैलो बने.
अकादमिक जीवन
डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी 1934 में महज 33 साल की उम्र में कलकत्ता यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर बने. दुनिया के सबसे युवा कुलपति होने का रिकॉर्ड भी उनके नाम है. यहां उन्होंने भारतीय भाषाओं को प्रोत्साहन दिया. बंगाली को नियमित अध्ययन का माध्यम बनाया. 1937 में रवींद्रनाथ टैगोर को पहली बार दीक्षांत समारोह में बंगाली में संबोधन देने के लिए आमंत्रित किया.
राजनीतिक सफर और जनसंघ की स्थापना
वर्ष 1935-36 में कलकत्ता विश्वविद्यालय का प्रतिनिधित्व करते हुए कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में बंगाल विधान परिषद के लिए चुने गए. लेकिन वैचारिक मतभेद के चलते 1937 में इस्तीफा दे दिया. बाद में स्वतंत्र प्रत्याशी के तौर पर चुनाव लड़ा और जीता.
1939 में हिंदू महासभा ज्वॉइन की. 1940 में पार्टी के अध्यक्ष बनाए गए. 1944 तक उन्होंने हिंदू महासभा का नेतृत्व किया. 1941 में बंगाल के वित्त मंत्री भी बने. लेकिन 20 नवंबर 1942 को बंगाल के विभाजन के मुद्दे पर इस्तीफा दे दिया.
साल 1946 में डॉ. मुखर्जी संविधान सभा के लिए चुने गए. 1946-47 में यूनाइटेड बंगाल का विरोध किया और हिंदुओं के लिए पश्चिम बंगाल की मांग की, उनकी कोशिशों का ही परिणाम है कि पूरा बंगाल पाकिस्तान में जाने से बचा. 15 अगस्त 1947 को पश्चिम बंगाल अस्तित्व में आया.
स्वतंत्रता के बाद श्यामा प्रसाद मुखर्जी जवाहरलाल नेहरू की पहली कैबिनेट का हिस्सा बने. उनको देश का पहला उद्योग और आपूर्ति मंत्री बनाया गया. इस पद पर रहते हुए उन्होंने देश की औद्योगिक नीति को दिशा देने में अहम भूमिका निभाई. लेकिन नेहरू से उनका वैचारिक टकराव बढ़ता गया. और पाकिस्तान परस्त नीतियों के विरोध में 8 अप्रैल 1950 को इस्तीफा दे दिया. और 21 अक्टूबर 1951 को राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की मदद से भारतीय जनसंघ की स्थापना की. जो कि आगे चलकर 6 अप्रैल 1980 को बीजेपी बनती है
नेहरू की कश्मीर नीति और मुखर्जी का विरोध
अखंड भारत और राष्ट्रीय एकीकरण श्यामा प्रसाद मुखर्जी के जीवन का मिशन था.डॉ. मुखर्जी नेहरू की कश्मीर नीति के कड़े विरोधी थे. उन्होंने जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 लागू करने का विरोध किया, न केवल विरोध किया बल्कि इसके लिए अपनी जान तक दे दी.
शेख अब्दुल्ला ने 1952 में नेहरू के साथ मिलकर जम्मू-कश्मीर में अलग झंडा और अलग संविधान की व्यवस्था लागू करवा दी. श्यामा प्रसाद मुखर्जी इसे राष्ट्र की एकता और अखंडता के साथ समझौता मानते थे. उन्होंने इसके विरोध में नारा दिया- एक देश में दो विधान, दो संविधान, दो प्रधान नहीं चलेंगे.
जम्मू कश्मीर में प्रेमनाथ डोगरा इसके खिलाफ आंदोलन कर रहे थे. डॉ. मुखर्जी ने इसे राष्ट्रीय स्तर पर फैलाया. जिसमें लाखों की संख्या में लोग शामिल हुए.
जम्मू यात्रा और 'रहस्यमयी' मौत
उन दिनों जम्मू कश्मीर में परमिट सिस्टम लागू था, जिसके तहत दूसरे राज्य के नागरिकों को जम्मू कश्मीर में प्रवेश के लिए विशेष परमिट लेना अनिवार्य था. यह एक तरह का आंतरिक पासपोर्ट था. जो केवल आम लोगो के लिए ही नहीं बल्कि भारत के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के लिए भी जरुरी था.
इसके विरोध में डॉ. मुखर्जी बिना परमिट जम्मू कश्मीर जाने का फैसला लेते हैं. 8 मार्च 1953 को मुखर्जी अपने कुछ साथियों के साथ दिल्ली रेलवे स्टेशन से जम्मू के लिए रवाना होते हैं. अटल बिहारी वाजपेयी और बलराज मधोक जैसे नाम भी उस दल का हिस्सा थे.
डॉ. मुखर्जी जैसे ही 11 मई को जम्मू कश्मीर में एंट्री करते हैं, लखनपुर में शेख अब्दुल्ला की सरकार उनको बिना किसी अरेस्ट वारंट के गिरफ्तार कर लेती है. गिरफ्तारी के बाद उनको पहले श्रीनगर सेंट्रल जेल और फिर शहर से काफी दूर एक सुनसान इलाके निशांत बाग में ले जाया जाता है. जहां एक जर्जर गेस्ट हाउस को अस्थाई जेल में बदलकर उनको रखा जाता है. इसके बावजूद की डॉ. मुखर्जी लेग इंजरी समेत कई गंभीर बीमारियों से जूझ रहे थे. वहां किसी भी तरह की कोई सुविधा नहीं थी.
यहां लगातार उनकी तबियत बिगड़ती जा रही थी. 19-20 जून की रात डॉक्टर ने उन्हें स्ट्रेप्टोमाइसिन इंजेक्शन दिया, डॉ. मुखर्जी के ये बताने के बावजूद की यह दवा उनको सूट नहीं करती, 21 जून को फिर से वही इंजेक्शन दिया गया.
बालराज मधोक अपनी किताब portrait of a Martyr में लिखते हैं.
'मुखर्जी ने खुद विरोध किया कि उनकी फैमिली डॉक्टर ने उन्हें यह दवा न लेने की सलाह दी थी, क्योंकि यह उनको सूट नहीं करती. फिर भी जेल डॉक्टर डॉ. अली मोहम्मद ने इसे दिया और उनकी आपत्ति को नजरअंदाज कर दिया'
22 जून तक उनकी हालत ज्यादा बिगड़ जाती है. इसके बाद भी उनको किसी एंबुलेंस से नहीं बल्कि एक टैक्सी से श्रीनगर के अस्पताल ले जाया जाता है. जहां 23 जून 1953 को सुबह करीब 3.40 बजे उन्होंने अंतिम सांस ली. उस समय उनकी उम्र महज 51 साल थी. आधिकारिक रूप से मौत का कारण हार्ट अटैक बताया गया.
बलराज मधोक इन दावों पर सवाल उठाते हैं. वो लिखते हैं--
'अस्पताल में क्या हुआ, यह रहस्य में डूबा है. आधिकारिक रूप से बताए गए मौत के समय और इलाज के दावों में विरोधाभास थे'
24 जून 1953 को उनका पार्थिव शरीर कलकत्ता लाया जाता है. जहां उनके अंतिम संस्कार में भारी भीड़ उमड़ती है. मां जोगामाया देवी नेहरू और शेख अब्दुल्ला को उनकी मौत के लिए जिम्मेदार ठहराती हैं. प्रधानमंत्री नेहरू को लिखे एक पत्र में वो राज्य सरकार पर गंभीर आरोप लगाती हैं. वो लिखती हैं.
'मैं आरोप लगाती हूँ कि सरकार ने अपनी बुनियादी जिम्मेदारी को पूरी तरह नजरअंदाज किया. उनके डॉक्टरों की जिम्मेदारी को किसी भी तरह टाला या कम नहीं किया जा सकता'
वो इसकी जांच के लिए स्वतंत्र आयोग के गठन की मांग करती हैं, जिसे सरकार अनसुना कर देती है.
डॉ. मुखर्जी का बलिदान कश्मीर एकीकरण के आंदोलन का प्रतीक बन जाता है. आखिरकार 5 अगस्त 2019 को जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद-370 को हटाकर बीजेपी उनके संकल्प को पूरा करती है. और अब जब उनके गृह राज्य में बीजेपी भारी बहुमत के साथ सत्ता में आ चुकी है, यह एक सपने के पूरा होने जैसा है.