कारगिल में वायुसेना ने जब 32 हजार फीट की ऊंचाई से पाकिस्तानी सेना पर गिराये 450 किलो के बम
26-मई-2026
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40 दिन, 7 हजार से ज्यादा उड़ान, 500 से ज्यादा बम, और हजारों रॉकेट, इस तरह वायुसेना ने 1999 के कारगिल युद्ध में भारत की जीत में निर्णायक भूमिका निभाई.
करीब 18 हजार फीट की ऊंचाई पर दुनिया की किसी भी वायु सेना द्वारा चलाया गया यह अपनी तरह का पहला ऑपरेशन होता है. नाम दिया जाता है ऑपरेशन सफेद सागर.
क्या है इस ऑपरेशन के पीछे की पूरी कहानी, क्यों और कब वायुसेना को युद्ध में किया गया शामिल, और कैसे 30 हजार फीट की उंचाई से गिराये गए 450 किलो से ज्यादा वजन के लेजर गाइडेड बमों ने तोड़ कर रख दी पाकिस्तान के कारगिल प्लान की रीढ़, समझते हैं.
कारगिल युद्ध में IAF की एंट्री
मई 1999 में जब पाकिस्तानी सैनिक भारतीय सीमा में घुसपैठ कर कारगिल, द्रास, बटालिक और तुर्तुक जैसी ऊंची चोटियों पर बंकर बनाकर बैठ गए थे. और आर्मी को ऑपरेशन में काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा था. क्योंकि चोटी पर बैठी पाकिस्तानी सेना के लिए उनको टारगेट करना आसान था, ऐसे में भारत सरकार एक बड़ा फैसला लेती है और 26 मई 1999 को भारतीय वायुसेना को युद्ध में शामिल किया जाता है...
लेकिन इंडियन एयरफोर्स के लिए यह ऑपरेशन किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं था...क्योंकि-
* इतनी ऊंचाई पर हवा का घनत्व बहुत कम होता है, जिससे इंजन की क्षमता कम भी हो जाती है, उसे ऑपरेशन में परेशानी आती है.
* पाकिस्तानी सैनिकों के पास स्टिंगर मिसाइल थीं, ये वो मैन पोर्टेबल एयर डिफेंस मिसाइल थीं, जिनको सैनिक कंधे पर रखकर जमीन से हवा में मार कर सकते थे, और भारतीय विमान इस मिसाइल की रेंज में थे.
* और तीसरा, सरकार के सख्त निर्देश थे कि किसी भी हालत में loc क्रॉस नहीं की जाए. यानि ऑपरेशन के लिए बेहद कम स्पेश होना, पायलेटों को बेहद संकरे रास्तों में रहकर अचूक निशाना लगाना था.
लेकिन इंडियन एयरफोर्स इस चुनौती को स्वीकार करती है. और 26 मई की सुबह वायुसेना के मिग-21, मिग-23 और मिग-27 विमान श्रीनगर, अवंतीपोरा और उधमपुर एयरबेस से उड़ान भरते हैं. ये लड़ाकू विमान कारगिल, द्रास और बटालिक की चोटियों पर रॉकेट और साधारण या अनगाइडेड बमों से हमला करते हैं. ताकि जमीन पर आर्मी के लिए आगे बढ़ने के लिए रास्ता साफ हो सके.
शुरूआती दिनों में वायुसेना को नुकसान'
लेकिन अगले दो दिन यानि 27 और 28 मई वायु सेना के लिए काफी मुश्किल भरे रहने वाले थे. ऐसा इसलिए क्योंकि दुश्मन की तैयारी और लोकेशन का उसे ठीक-ठीक अंदाजा नहीं था. पाकिस्तानी सैनिकों के पास स्टिंगर मिसाइल भी है, वायुसेना इससे भी अंजान थी. और दुश्मन की लोकेशन ट्रैक करने के लिए भारतीय वायुसेना के विमान काफी नीचे उड़ रहे थे.
27 मई को फ्लाइट लेफ्टिनेंट के. नचिकेता जब अपने मि्ग -27 विमान से बटालिक सेक्टर में दुश्मन के ठिकानों पर रॉकेट दाग रहे थे. तभी उनके विमान का इंजन फेल हो जाता है, उन्हें इजेक्ट करना पड़ता है. नचिकेता पाकिस्तान की तरफ लैंड करते हैं. और पाकिस्तानी सेना उन्हें युद्ध बंदी बना लेती है. अंतरराष्ट्रीय कानूनों के खिलाफ जाकर नचिकेता को बुरी तरह टॉर्चर किया जाता है. बाद में भारत सरकार और अंतरराष्ट्रीय दबाव के चलते 3 जून 1999 को पाकिस्तान उन्हें भारत को सौंपता है.
जब नचिकेता का विमान क्रैश हुआ था, उसी समय उनके फॉर्मेशन लीडर स्क्वाड्रन लीडर अजय आहूजा अपने मिग -21 विमान के साथ वहां होते हैं, वो नचिकेता की लोकेशन देखने के लिए विमान को काफी नीचे ले आते हैं. ऐसा इसलिए ताकि ये सुनिश्चित किया जा सके कि क्या पायलट ने सेफ लैंड किया है, और कहां ? ताकि बाद में उसे रेस्क्यू किया जा सके. अजय आहूजा जब इस मिशन पर थे, तभी पाकिस्तानी स्टिंगर मिसाइल उनके विमान को हिट करती है. अजय भी विमान से इजेक्ट करते हैं. लेकिन पाकिस्तानी सेना उन्हें युद्धबंदी बनाने की जगह अंतरराष्ट्रीय नियमों का घोर उल्लंघन करते हुए गोली मारकर हत्या कर देती है. बाद में 29 मई को जब उनका पार्थिव शरीर भारत को सौंपा गया, पोस्टमार्टम रिपोर्ट में यह साबित होता है कि मौत का कारण लैंडिंग नहीं बल्कि बिलकुल पास से मारी गई दो गोलियां थीं.
हादसों का यह सिलसिला यहीं नहीं रूकता है, अगले दिन 28 मई को MI-17 गनशिप हेलीकॉप्टर्स को तोलोलिंग चोटी पर हमला करने के लिए भेजा जाता है, लेकिन पाकिस्तानी सेना के ठिकानों पर रॉकेट दागते समय एक हेलीकॉप्टर को पाकिस्तान की स्टिंगर मिसाइल हिट करती है. इसमें वायुसेना के चार क्रू मेंबर्स की मौत हो जाती है.
बीच युद्ध में रणनीति में बदलाव
एक के बाद एक दो दिनों में लगातार नुकसान में अपने तीन विमान खोने के बाद भारतीय वायुसेना को बीच युद्ध में अपनी रणनीति में बदलाव करना पड़ता है. तय किया जाता है कि-
* IAF के विमान 20 से 30 हजार फीट की सुरक्षित ऊंचाई पर उड़ेंगे, ताकि वो स्टिंगर मिसाइल के हमले की रेंज से बाहर रहें
* गनशिप हेलीकॉप्टरों के हमले रोक दिये गए, क्योंकि धीमी गति से उड़ने वाले ये हेलीकॉप्टर आसान शिकार थे
* वायुसेना ने मिग की जगह आधुनिक विमान मिराज-2000 को मोर्चे पर उतारा, जिससे पाकिस्तानी बंकरों पर लेजर गाइडेड हमले किये गए
* भारतीय सेना अब रात के अंधेरे में हमले कर रही थी. पाकिस्तानी सैनिकों को विमान नजर ही नहीं आ रहे थे
* सेना ने BVR यानि बियांड विजुअल रेंज मिसाइल से लैस मिग-29 विमान हवा में तैनात कर दिये,ताकि अगर पाकिस्तानी वायुसेना युद्ध में शामिल होती है, तो उसके विमानों को निशाना बनाया जा सके.
पाकिस्तानी सेना पर IAF का कहर
इंडियन एयरफोर्स अपनी रणनीति बदलते ही पाकिस्तानी सैनिकों के लिए ज्यादा घातक बन जाती है. और इसका तब असर देखने को मिलता है, जब भारतीय सेना तोलोलिंग और टाइगर हिल को फिर से अपने नियंत्रण में लेती है. इसे कारिगल युद्ध का एक बड़ा टर्निंग प्वॉइंट माना जाता है.
इन दोनों चोटियों से भारतीय सेना ने पाकिस्तानी सैनिकों को कैसे खदेड़ा, उससे पहले समझते हैं, इनका महत्व, आखिर तोलोलिंग और टाइगर हिल को अपने नियंत्रण में लेना भारतीय सेना के लिए इतना जरूरी क्यों था ?
तोलोलिंग
* 15 हजार फीट से भी अधिक ऊंची, द्रास सेक्टर की सबसे प्रमुख चोटी, इस पर नियंत्रण के बिना द्रास में कोई भी ऑपरेशन नहीं चलाया जा सकता था
टाइगर हिल
* लगभग 18 हजार फीट उंची, द्रास सेक्टर की सबसे ऊंची चोटी, पूरा द्रास और मश्कोह घाटी साफ दिखाई पड़ती है
* यह एक तरह का कंट्रोल टावर था. जिस पर नियंत्रण के बिना कारगिल विजय संभव नहीं थी.
* यहां पाकिस्तानी सेना का मु्ख्य कमांड सेंटर भी था. यहीं से वो बाकी चौकियों को निर्देश और रसद भेज रहे थे
इसके साथ जो एक सबसे बड़ा कारण था... वो था श्रीनगर-लेह राष्ट्रीय राजमार्ग यानि NH 1A को बचाना- क्योंकि
-ये दोनों चोटियां श्रीनगर-लेह राष्ट्रीय राजमार्ग NH-1A के ठीक ऊपर स्थिति हैं.
-यहां बैठकर पाकिस्तानी सेना हाईवे पर चलने वाली गाड़ियों को निशाना बना रहे थे
-लद्दाख का संपर्क टूट जाता, और सियाचिन में तैनात सैनिकों के लिए रशद नहीं भेजी जा सकती थी
इसलिए भारतीय सेना दोनों चोटियों को फिर से कैप्चर करने का प्लान बनाती है. और इसमें वायुसेना का अहम रोल होता है.
12-13 जून की रात वायुसेना तोलोलिंग पर भयंकर बमबारी करती है. इसमें तोलोलिंग पर बने पाकिस्तानी बंकर पूरी तरह नष्ट हो जाते हैं. और फिर घंटों तक चली आमने-सामने की लड़ाई के बाद 13 जून को सुबह करीब 4 बजे भारतीय सेना तोलोलिंग को फिर से अपने नियंत्रण में ले लेती है....
लेजर गाइडेड बम ने मचाई तबाही
इसके बाद नंबर आता है टाइगिल हिल का, लेकिन सेना टाइगर हिल से पहले मुंतो ढालो में बर्फ के बीच छिपे पाकिस्तान के एक बड़े सप्लाई डिपो को निशाना बनाती है. यहां पाकिस्तान के टेंट, हथियार और राशन का बड़ा भंडार था. 16 जून 1999 को भारतीय वायु सेना के टोही विमान इसका पता लगाते हैं. 17 जून को वायु सेना के मिराज-2000 विमान लेजर गाइडेड बमों का पहला सफल इस्तेमाल इसी मुंतो ढालो पर करते हैं. लेजर गाइडेड बम करीब 450 किलो का एक विशेष बम होता है, जिसमें एक स्पेशल सेंसर लगा होता है. जिसके चलते सामान्य बम की तरह इस पर हवा के दबाव और गुरुत्वाकर्षण का कोई असर नहीं होता है. और यह सीधा टारगेट को हिट करता है.
इस हमले में पाकिस्तान के 100 से अधिक सैनिक मारे जाते हैं और उसका पूरा प्रशासनिक ढांचा नष्ट हो जाता है. इसके बाद बटालिक और द्रास सेक्टर की ऊंची चोटियों पर बैठे पाकिस्तानी सैनिक दाने-दाने और एक-एक गोली के लिए मोहताज हो जाते हैं. भारतीय सेना मुंतो ढालो को अपने अधिकार क्षेत्र में ले लेती है.
टाइगर हिल पर तिरंगा
मुंतो ढालो पर नियंत्रण के बाद सेना का अगला टारगेट होता है टाइगर हिल... 24 जून को मिराज-2000 विमान टाइगर हिल पर स्थित पाकिस्तानी सेना के कमांड सेंटर पर लेजर गाइडेड बम से हमला करते हैं. इस हमले में पाकिस्तानी कमांड सेंटर ताश के पत्तों की तरह बिखर जाता है. पाकिस्तानी सेना के कई सीनियर अधिकारी मारे जाते हैं. और उनकी संचार व्यवस्था ठप पड़ जाती है.
इसके बाद 27 जून को एक बार फिर वायुसेना के मिराज 2000 विमान टाइगिर हिल पर लेजर गाइडेड बम बरसाते हैं, इस बार निशाना थे दूसरे कंक्रीट बंकर. जो कि थल सेना के ऑपरेशन में रोड़ा बने हुए थे. इस हमले में पाकिस्तान के सभी बंकर नष्ट हो जाते हैं.
इसका फायदा थल सेना को मिलता है. 3 जुलाई 1999 को आर्मी के जवान रात के अंधेरे में टाइगर हिल की खड़ी चट्टान पर चढ़ाई शुरु करते हैं. इस बीच वायुसेना के विमान टाइगर हिल के दूसरे हिस्सों पर बमबारी करते रहते हैं. ताकि दुश्मन का ध्यान भटकाया जा सके. इसका असर होता है कि भारतीय टुकड़ी टाइगर हिल के टॉप पर पहुंचती है और 4 जुलाई 1999 की सुबह करीब 6 बजकर 50 मिनट पर टाइगर हिल पर तिरंगा फहरा दिया जाता है.
टाइगर हिल पर भारतीय सेना की जीत के बाद भी खतरा टला नहीं था. पास की दूसरी चोटियों पर पाकिस्तानी सैनिक मौजूद थे. टाइगर हिल के ठीक पश्चिम में स्थित पॉइंट 4388 पर पाकिस्तानी सेना के कई एडवांस्ड सप्लाई कैंप सक्रिय होते हैं. 4 जुलाई से 9 जुलाई के बीच वायुसेना के मिराज-2000 और मिग विमान इस इलाके में भारी बमबारी करते हैं. जिससे थल सेना के लिए प्वाइंट 4388 पर नियंत्रण करना काफी आसान हो जाता है. यहां भारतीय सेना के नियंत्रण होने के बाद द्रास सेक्टर पूरी तरह सुरक्षित हो जाता है.
टाइगर हिल और द्रास में भारतीय नियंत्रण स्थापित होने के बाद कुछ पाकिस्तानी सैनिक यहां से भागकर मश्कोह घाटी में छिपे होते हैं. यहां पाकिस्तान का एक और बड़ा लॉजिस्टिक्स बेस होता है. 11-12 जुलाई को भारतीय वायुसेना के टोही विमान इसे ट्रैक करते हैं और इस डिपो पर भारी गोलाबारी करते हैं. वायुसेना के इस हमले में डिपो जलकर राख हो जाता है. इसके बाद पाकिस्तान का बैकअप प्लान पूरी तरह खत्म हो जाता है.
इसके बाद 13 जुलाई से 25 जुलाई के बीच वायुसेना क्लीन अप ऑपरेशन चलाती है. ताकि बटालिक और काकसार सेक्टर की कुछ पहाड़ियों पर बचे कुचे पाकिस्तानी सैनिकों को हटाया जा सके.
और फिर आता है 26 जुलाई 1999.. वो दिन जब भारतीय सेना 60 दिनों तक लगातार युद्ध के बाद आधिकारिक तौर पर ऑपरेशन विजय की सफलता की घोषणा करती है. और इस तरह ऑपरेशन सफेद सागर ऑपरेशन विजय की कामयाबी में बेहद अहम रोल निभाता है.