‘Not today sir, we are very close to the objective….’
कारगिल की हजारों फीट ऊँची बर्फीली चोटियों पर गूंजे ये आखिरी शब्द थे, मेजर एम. सरवनन की...जिन्हें कारगिल युद्ध में अतुलनीय साहस और वीरता के लिए वीर चक्र से किया गया था सम्मानित।
29 मई 1999… कारगिल युद्ध का शुरुआती दौर। बटालिक सेक्टर के जुबार रिज के समीप स्थित सामरिक रूप से महत्वपूर्ण प्वाइंट 4268 पाकिस्तानी सेना ने ऊंची पहाड़ी पर कब्जा जमा रखा था। इस पोस्ट को वापस लेने की जिम्मेदारी 1 बिहार रेजिमेंट के युवा अधिकारी मेजर एम. सरवनन को सौंपी गई।
तमिलनाडु के रामेश्वरम में 10 अगस्त 1972 को जन्मे सरवनन 1995 में OTA से पासआउट होने के बाद वे बिहार रेजिमेंट में शामिल हुए। कारगिल युद्ध शुरू होने के बाद उनकी यूनिट को असम से जम्मू-कश्मीर भेजा गया और फिर उनकी टीम लद्दाख के लिए रवाना हुई।
कारगिल युद्ध का हिस्सा बनने जब वो रवाना हो रहे थे तब, उन्होंने अपनी माँ को एक पत्र लिखा था। मेजर मरियप्पन अपने पत्र में लिखते हैं, माँ मैं जल्द घर आऊंगा लेकिन इस बार जब घर लौटूंगा तो ‘वीर चक्र’ लेकर ही लौटूंगा।
28 और 29 मई की रात मेजर मरियप्पन की टीम को उनके कमांडिंग अफसर कर्नल ओपी यादव से बटालिक सेक्टर के प्वाइंट 4268 पर दुश्मन के बनें मजबूत बंकर पर हमला करने और उसे दुश्मनों से मुक्त कराने की जिम्मेदारी सौंपी गई। करीब 14 हजार फीट की ऊंचाई, जमा देने वाली ठंड और ऊंचाई पर कब्ज़ा जमाए बैठे पाकिस्तानी सैनिक लगातार फायरिंग कर रहे थे। अपने मिशन को पूरा करने के लिए भारतीय जाबांजों को देर रात ही चढ़ाई करनी होती थी ताकि वे दुश्मन की आँखों से बचकर अपने लक्ष्य तक पहुँच सकें। 28 मई की रात दुश्मनों के हमले से बचते हुए मेजर की टीम अपने लक्ष्य की ओर आगे बढती है। मेजर सरवनन सबसे आगे बढ़कर अपनी टीम को लीड कर रहे थे।
मेजर सरवनन की टीम तडके सुबह करीब 3-4 बजे के करीब जैसे ही अपने लक्ष्य प्वाइंट 4268 के समीप पहुंची ही थी कि दुश्मनों ने ताबड़तोड़ गोलियां बरसानी शुरू कर दी। दुश्मनों के हमले का जवाब देते हुए मेजर सरवनन ने रॉकेट लॉन्चर से दुश्मन के बंकर को निशाना बनाया जिसमें बंकर में बैठे पाकिस्तानी सैनिक ढेर हो गए। हालाँकि इसी बीच दुश्मनों की गोली के छर्रों से मेजर सरवनन भी घायल हो गए। मेजर के घायल होने की खबर रेडियो पर कमांडिंग अफसर कर्नल ओपी यादव तक पहुंची। हालात बिगड़ते देख उनके कमांडिंग ऑफिसर ने वायरलेस पर आदेश दिया -
‘Genghis Khan, fall back.’
(मिशन के दौरान मेजर सरवनन का कोड नेम ‘चंगेज खान’ रखा गया था...)
मेजर सरवनन का अपने कमांडिंग अफसर को जवाब था -
‘Not today sir, we are very close to the objective.’
गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद मेजर अपनी टुकड़ी का नेतृत्व करना और दुश्मनों पर हमला जारी रखा। अगले ही हमले में मेजर ने दूसरे बंकर में बैठे 2 और पाकिस्तानी सैनिकों को मार गिराया, लेकिन उसी क्षण दुश्मन द्वारा फायर की गई एक गोली सीधे मेजर सरवनन के सिर को भेद गई। गोली लगने के कारण मेजर सरवनन युद्धभूमि में देश की रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त हो गए। मेजर एम. सरवनन ने अपने अंतिम क्षण तक मोर्चा नहीं छोड़ा था। मेजर की अगुवाई वाली यूनिट ने 6 जुलाई तक दुश्मन की महत्वपूर्ण स्थिति को भारी नुकसान पहुंचाते हुए प्वाइंट 4268 को दुश्मनों से मुक्त करा कर भारतीय तिरंगा फहराया।
मेजर एम. सरवनन के अलावा, इस अभियान में अपनी बलिदान होने वाले अन्य वीर योद्धाओं में गणेश प्रसाद यादव, लांस नायक बिद्यानंद सिंह, सिपाही प्रमोद कुमार, सिपाही हरदेव प्रसाद और सिपाही एसएसपी गुप्ता शामिल थे। भीषण संघर्ष के बाद, मेजर सरवनन का शव उनकी मृत्यु के 37 दिन बाद बरामद किया जा सका। 8 जुलाई तक जुबार रिज और पॉइंट 4268 पूरी तरह खाली करा लिया गया था।
युद्धभूमि में मेजर सरवनन की बहादुरी, कुशल नेतृत्व और सवोच्च बलिदान के लिए उन्हें मरणोपरांत वीर चक्र से सम्मानित किया गया। मेजर ने अपनी माँ से किया वादा तो निभाया लेकिन अपने प्राणों की आहुति देकर।
तत्कालीन राष्ट्रपति के. आर. नारायणन ने वीरता का यह सम्मान मेजर सरवनन की मां को सौंपा था। प्रशस्ति पत्र में लिखा था— “For our tomorrow… He gave his today…’ कारगिल की चोटियों पर दिया गया उनका बलिदान आज भी भारतीय सेना के साहस, नेतृत्व और राष्ट्रभक्ति की अमर कहानी बनकर जीवित है।