चापनारी नरसंहार: जब आतंकियों ने 26 हिंदू बारातियों को कतार में खड़ा कर गोलियों से भून दिया
19-जून-2026
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आपने पहलगाम नरसंहार के बारे में जरुर सुना होगा. अप्रैल 2025 में जब आतंकियों ने बैरसन घाटी में पहचान पूछकर 25 हिंदू पर्यटकों समेत कुल 26 लोगों को गोलियों से भून दिया था. लेकिन हिंदुओं की टारगेटेड किलिंग्स का अपनी तरह का पहला मामला नहीं था. इससे पहले भी आतंकी इस तरह के कायरतापूर्ण हमलों को अंजाम देते रहे हैं. उन्ही में से एक है चापनारी नरसंहार...
क्या है चापनारी नरसंहार ?
जम्मू के डोडा जिले का एक गांव है चापनारी, 1 जून 1998 को यहां एक ही परिवार में दो शादियां थी, एक दुल्हा शादी के बाद बारात लेकर गांव आ रहा था. और एक दूसरी बारात गांव से जा रही थी. शाम का वक्त था. हर तरफ खुशी का माहौल था. लोग नाच-गा रहे थे. लेकिन जल्दी ही जश्न का ये शोर मातम की चीखों में बदल गया. कुछ आतंकवादियों ने दोनों बारातों को घेर लिया और सभी को पहाड़ी पर एक तरफ ले गए. वहां महिलाओं को अलग कर सभी पुरुषों को एक तरफ कतार में खड़ा कर दिया. उसके बाद सभी से नाम पूछा, और जब ये कंफर्म हो गया कि सभी हिंदू हैं, तब बिना किसी चेतावनी के प्वॉइंट ब्लैंक से अंधाधुंध फायरिंग शुरु कर दी.
लाशों का ढेर लग गया, 26 लोग आतंकियों की गोलियों का शिकार बने. जितने लोग वहां मौजूद थे, उनमें से केवल पांच लोग बचे. एक दुल्हन और कुछ प्राइमेरी टीचर्स
किसने और क्यों किया था हमला ?
लश्कर-ए-तैयबा ने इस आतंकी हमले की जिम्मेदारी ली थी. ये पाकिस्तान बेस्ड वही आंतकी संगठन है, जो कि साल 2000 में लाल किला आतंकी हमला, 2001 संसद आतंकी हमला, 2005 में दिल्ली ब्लास्ट और 2006 में मुंबई ब्लास्ट के पीछे था. इस नरसंहार के उद्देश्य थे-
- हिंदुओं में दहशत पैदा करना
- इलाके को हिंदु मुक्त बनाना
- अलगाववाद को बढ़ावा देना
यहां गौर करने वाली बात ये है कि ये वही हिंदू परिवार थे, जो कि घाटी में अलगाववादी और आतंकवादियों द्वारा की जा रही हिंसा से बचने के लिए विस्थापित होकर यहां आए थे. लेकिन यहां भी आतंक ने उनका पीछा नहीं छोड़ा.
पाकिस्तान समर्थित अलगाववादी संगठन JKLF इस नरसंहार के पीछे था
जम्मू कश्मीर में कैसे थे हालात ?
ये 90 के दशक का दौर था, जम्मू कश्मीर में आतंकवाद और अलगाववाद चरम पर था. 50 के दशक में विचार के तौर पर पनपा अलगाववाद यहां तक आते-आते सशस्त्र संघर्ष का रूप ले चुका था. हिंदुओं को चुन-चुन कर निशाना बनाया जा रहा था. पाकिस्तान ट्रेनिंग, हथियार और फंडिंग देकर इसका समर्थन कर रहा था. घाटी के मुसलमान सड़कों पर थे, मस्जिदों के लाउड स्पीकरों से खुलेआम नारे लगाए जा रहे थे. रलिव, त्सलिव या गलिव, यानि इस्लाम कबूल कर लो, घाटी छोड़ दो या मर जाओ.
और, इसी का परिणाम था 1990 का लाखों कश्मीरी हिंदुओं का घाटी से पलायन. 19 जनवरी 1990 को आज भी काला दिन के तौर पर याद किया जाता है.
इसके पीछे थे, jklf और हिजबुल मुजाहिद्दीन जैसे आतंकी और अलगाववादी संगठन. जो कि स्वतंत्र कश्मीर और उसके पाकिस्तान में विलय की बात करते थे.
हालांकि इन अलगाववादी घटनाओं का मुख्य केंद्र कश्मीर घाटी ही थी, लेकिन जम्मू भी इससे अछूता नहीं था. चापनारी नरसंहार इसका प्रमुख उदाहरण है. इसके अलावा भी जम्मू में आतंकियों ने इस तरह के कई नरसंहारों को अंजाम दिया. जैसे-
जम्मू में बड़े आतंकी हमले
17 अप्रैल 1998 प्रानकोटे नरसंहार (उद्धमपुर )
रात में 14 आतंकियों ने गांव में घुसकर हिंदू परिवारों पर हमला किया, लोगों को घरों से निकाला, इस्लाम कबूल करने को कहा, मना करने वालों की गर्दनें तलवार से काट दीं, कुछ को जिंदा जला दिया
19 अप्रैल 1998 थुब गांव नरसंहार (उद्धमपुर )
आतंकियों ने गांव में घुसकर हिंदू परिवारों को निशाना बनाया, 13 हिंदुओं की बर्बर हत्या कर दी
5 जनवरी 1996 बारशाला नरसंहार
आतंकियों ने गांववासियों को लाइन में खड़ा कर हिंदुओं को मुसलमानों से अलग किया. और फिर करीब 16 लोगों की गोली मार कर हत्या कर दी.
19-20 जुलाई 1999 ठाठरी नरसंहार
15 से ज्यादा आतंकियों ने गांव में घुसकर घरों पर 13 घंटे तक फायरिंग की, 15 हिंदू मारे गए
30 अप्रैल 2006 डोडा नरसंहार
थावा और लालोन गल्ला, आतंकियों ने सेना की वर्दी में दो गांवों पर हमला किया. लोगों को घरों से निकाला, हिंदुओं को अलग किया, और लाइन में खड़ा कर गोली मार दी. करीब 57 हिंदुओं की बर्बर हत्या
तत्कालीन केंद्रीय गृहमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने चापनारी का दौरा किया था
परिणाम और प्रतिक्रिया
चापनारी नरसंहार की तत्कालीन केंद्र सरकार ने कड़ी निंदा की और इसके लिए पाकिस्तान को जिम्मेदार ठहराया. तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने इसे स्पष्ट रूप से हिंदुओं की एथनिक क्लिंजिंग की कोशिश बताया था. इतना ही नहीं आडवाणी हमले के बाद चापनारी गए भी थे. तत्कालीन मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला ने इसे पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवादियों का एक और बर्बर कृत्य बताया था.
चापानेरी नरसंहार के बाद स्थानीय हिंदु समुदाय के बीच असुरक्षा बढ़ी, कई परिवारों ने पलानय किया. इस पर जम्मू क्षेत्र के कई हिंदु संगठनों ने भारी आक्रोश जताया. इसे देखते हुए सरकार ने वहां अतिरिक्त सुरक्षा बल तैनात किये. सेना ने काउंटर टैरेरिज्म ऑपरेशन तेज कर दिये.
सिंतबर 1998, यानि करीब घटना के तीन महीने बाद सेना के एनकाउंटर में मुख्य आरोपी और लश्कर-ए-तैयबा का आतंकी अबिद हुसैन मारा गया.
2004 में हिजबुल मुजाहिदीन के एक आतंकी अत्तुल्लाह को गिरफ्तार कर लिया गया.
लेकिन अफसोस की बात है कि 28 साल बीत जाने के बाद भी पीड़ितों को पूर्ण न्याय नहीं मिल पाया है. आज जब हम इस नरसंहार को याद कर रहे हैं, तब यह सबसे बड़ी चुनौती है. और सबसे दुखद बात , इतिहास की किताबों से इस नरसंहार को लगभग गायब कर दिया गया है.
स्थानीय हिंदुओं की मांग है कि यहां पहाड़ी पर उस जगह एक स्मारक बने, ताकि आने वाली पीढ़ी अपने इतिहास से सबक ले सकें.