जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद सात वर्ष से अधिक का समय बीत चुका है। इस दौरान केंद्र शासित प्रदेश में विकास, पर्यटन, आधारभूत संरचना और सुरक्षा व्यवस्था के क्षेत्र में व्यापक परिवर्तन देखने को मिले हैं। कभी हिंसा, बंद और अलगाववाद की खबरों से सुर्खियों में रहने वाला जम्मू-कश्मीर आज नई संभावनाओं, निवेश, रिकॉर्ड पर्यटन और बेहतर सुरक्षा वातावरण के लिए चर्चा में है।
हालांकि इन सभी परिवर्तनों में सबसे महत्वपूर्ण बदलाव सुरक्षा के मोर्चे पर दिखाई देता है। एक ऐसा क्षेत्र, जहां कभी गोलियों की आवाजें आम थीं, वहां अब शांति और स्थिरता की नई कहानी लिखी जा रही है। इसी बदलाव की सबसे बड़ी मिसाल मई 2026 में देखने को मिली, जिसने जम्मू-कश्मीर के सुरक्षा इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ दिया। चलिए जानते हैं कि आखिर 36 साल बाद कैसे बदली यह तस्वीर?
36 वर्षों में पहली बार आतंक मुक्त रहा मई
वर्ष 1989 के बाद से मई का महीना जम्मू-कश्मीर में आतंकवादी गतिविधियों के लिहाज से सबसे संवेदनशील अवधियों में गिना जाता रहा है। सर्दियों के समाप्त होने और पहाड़ों पर जमी बर्फ के पिघलने के बाद सीमापार से होने वाली घुसपैठ की कोशिशों में तेजी आती थी, आतंकवादी गतिविधियां बढ़ती थीं और सुरक्षाबलों के आतंकवाद विरोधी अभियान भी अधिक सक्रिय हो जाते थे। यही कारण था कि मई का महीना अक्सर मुठभेड़ों, हिंसा और मौतों का गवाह बनता रहा। लेकिन वर्ष 2026 में यह सिलसिला टूट गया।
दैनिक जागरण में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, मई 2026 में 1989 के बाद पहली बार ऐसा हुआ कि पूरे महीने में न कोई आतंकवादी हमला दर्ज किया गया, न किसी नागरिक की आतंकवादी हिंसा में जान गई और न ही आतंकवाद विरोधी अभियानों के दौरान कोई सुरक्षाकर्मी वीरगति को प्राप्त हुआ। सुरक्षा की दृष्टि से यह उपलब्धि जम्मू-कश्मीर के हालिया इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक मानी जा रही है।
आंकड़ों में दिखता है बदलाव
यदि पिछले वर्षों के आंकड़ों पर नजर डालें तो मई का महीना अक्सर हिंसा और मौतों से जुड़ा रहा है। जम्मू-कश्मीर पुलिस के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2000 में मई के दौरान 288 लोगों की मौत हुई थी। वर्ष 2001 में यह संख्या 300 तक पहुंच गई थी। इसके बाद 2002 में 288, 2003 में 241, 2004 में 195, 2005 में 188 और 2006 में 140 लोगों की मौत दर्ज की गई।
हालांकि इसके बाद हिंसा के स्तर में धीरे-धीरे गिरावट आने लगी, लेकिन मई का महीना लगातार संवेदनशील बना रहा। वर्ष 2007 में 59, 2008 में 39, 2009 में 27, 2010 में 43, 2011 में 19 और 2012 में 13 मौतें दर्ज की गईं।
2012 के बाद स्थानीय युवाओं की आतंकवादी संगठनों में भर्ती बढ़ने लगी, जिसका असर अगले वर्षों में भी दिखाई दिया। 2013 में 18, 2014 में 10 और 2015 में 16 मौतें दर्ज की गईं। 2016 के बाद घाटी में अशांति का दौर बढ़ा और मई के दौरान हिंसा में फिर वृद्धि देखने को मिली।
वर्ष 2017, 2018 और 2019 में मई के महीने में 37-37 मौतें दर्ज की गईं। वहीं 2020 में 28, 2021 में 16, 2022 में 38, 2023 में 14, 2024 में 7 और 2025 में 43 लोगों की मौत हुई थी। ऐसे में मई 2026 का शून्य मौतों का आंकड़ा केवल एक सांख्यिकीय उपलब्धि नहीं, बल्कि सुरक्षा परिदृश्य में आए गहरे बदलाव का संकेत माना जा रहा है।
5 महीनों में कोई नागरिक नहीं बना शिकार
मौजूदा वर्ष के पहले पांच महीनों, यानी 1 जनवरी से 31 मई 2026 तक आतंकवाद से संबंधित घटनाओं में कुल 12 मौतें दर्ज की गई हैं। इनमें एक सुरक्षाकर्मी, नौ आतंकवादी और दो अज्ञात व्यक्ति शामिल हैं। सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि अज्ञात व्यक्तियों में से एक के आतंकवादी होने की भी संभावना है।
सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि इस वर्ष अब तक किसी भी आम नागरिक की आतंकवादी हिंसा में मौत नहीं हुई है। यह स्थिति पिछले कई दशकों की तुलना में उल्लेखनीय बदलाव को दर्शाती है।
आखिर कैसे बदली तस्वीर?
सुरक्षा विशेषज्ञों और अधिकारियों के अनुसार जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा रणनीति के कई स्तरों पर बदलाव किया गया है। विभिन्न सुरक्षा बलों और खुफिया एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित हुआ है। केवल घटनाओं के बाद प्रतिक्रिया देने के बजाय अब पूर्व-सक्रिय रणनीति के तहत आतंकवादी नेटवर्क को पहले ही निशाना बनाया जा रहा है।
आतंकवादियों के ओवरग्राउंड वर्कर (OGW) नेटवर्क, फंडिंग चैनलों और स्थानीय समर्थन तंत्र पर लगातार कार्रवाई की जा रही है। इसके साथ ही सीमा पार से होने वाली घुसपैठ को रोकने के लिए नियंत्रण रेखा और अंतरराष्ट्रीय सीमा पर निगरानी और तकनीकी संसाधनों को लगातार मजबूत किया गया है।
स्थानीय भर्ती लगभग समाप्त
सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार आतंकवादी संगठनों में स्थानीय युवाओं की भर्ती में भी भारी गिरावट दर्ज की गई है। एक समय था जब घाटी में स्थानीय स्तर पर भर्ती सुरक्षा एजेंसियों के लिए बड़ी चुनौती बन चुकी थी, लेकिन अब यह प्रवृत्ति लगभग समाप्त होती दिखाई दे रही है। इसके पीछे लगातार चलाए गए जागरूकता अभियान, बेहतर शिक्षा और रोजगार के अवसर, विकास परियोजनाओं का विस्तार और आम लोगों का बदलता दृष्टिकोण प्रमुख कारण माने जा रहे हैं।
आतंकवाद से मोहभंग
विशेषज्ञों का मानना है कि जम्मू-कश्मीर में आम लोगों का आतंकवाद और अलगाववाद से मोहभंग होना भी सुरक्षा स्थिति में सुधार का एक बड़ा कारण है। लोग अब हिंसा के बजाय शांति, रोजगार, पर्यटन और आर्थिक विकास को प्राथमिकता दे रहे हैं। यही वजह है कि आतंकवादी संगठनों को स्थानीय स्तर पर पहले जैसा समर्थन नहीं मिल रहा और सीमा पार बैठे आतंकी हैंडलरों पर भी लगातार दबाव बढ़ रहा है।
एक रिकॉर्ड से कहीं बढ़कर है यह उपलब्धि
मई 2026 का आतंकवाद मुक्त महीना केवल एक आंकड़ा नहीं है। यह जम्मू-कश्मीर में बदलते सामाजिक, राजनीतिक और सुरक्षा परिदृश्य का प्रतीक है। यह सुरक्षाबलों की सतत रणनीति, खुफिया तंत्र की मजबूती, सीमाओं पर बढ़ी चौकसी और आतंकवाद के खिलाफ चलाए गए निरंतर अभियानों का परिणाम माना जा रहा है।