कैप्टन सौरभ कालिया की कहानी: 22 दिन की यातना, पाकिस्तान की अमानवीयता और 27 साल से अधूरा इंसाफ

    09-जून-2026
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Capt Saurabh Kalia Story
 
 
9 जून 1999... पालमपुर के एक घर के बाहर भारतीय सेना का एक वाहन रुकता है। साथ में होते हैं बड़ी संख्या में भारतीय जवान। कुछ महीने पहले जिस बेटे को परिवार ने तिरंगे की रक्षा के लिए विदा किया था...आज वही बेटा तिरंगे में लिपटकर अपने घर लौट रहा था। लेकिन इस बार उसे पहचानना तक परिवार के लिए मुश्किल था।
 
आज कहानी कारगिल युद्ध के युवा अधिकारी कैप्टन सौरभ कालिया की... जिन्होंने युद्ध में सबसे पहले दिया अपना सर्वोच्च बलिदान
 
कारगिल युद्ध की शुरुआत 
 
 
3 मई 1999 को लद्दाख एक चरवाहे ताशी नामग्याल ने कारगिल की ऊंची चोटियों पर कुछ संदिग्ध हथियारबंद लोगों को देखा। उसने तुरंत भारतीय सेना को इसकी जानकारी दी। शुरुआत में यह सामान्य घुसपैठ जैसी लग रही थी, लेकिन जल्द ही स्पष्ट हो गया कि पाकिस्तान ने सुनियोजित तरीके से भारतीय क्षेत्र की ऊंची चोटियों पर कब्जा जमाना शुरू कर दिया है।
 
 
कमांडिंग अफसर से निर्देश के बाद 14 मई 1999 को 4 जाट रेजीमेंट के कैप्टन सौरभ कालिया अपने 5 साथियों - सिपाही अर्जुन राम, भीका राम, भंवर लाल बगरिया, मूला राम और नरेश सिंह के साथ बजरंग पोस्ट की ओर गश्त पर निकले। कैप्टन कालिया को सेना में शामिल हुए अभी 4 महीने भी पूरे नहीं हुए थे। काकसार में उनकी यह पहली पोस्टिंग थी।
 

Capt Saurabh Kalia And his 5 friend kaksar valley  kargil war 1999 कैप्टन कालिया और उनके 5 साथी 
 
 
कैप्टन कालिया जैसे ही काकसार में स्थित बजरंग चोटी पर पहुंचते हैं उनकी टीम का सामना भारी संख्या में मौजूद पाकिस्तानी सैनिकों से हुआ। भारतीय दल के पास सीमित हथियार और गोला-बारूद था, जबकि दूसरी तरफ संख्या और संसाधनों में कहीं अधिक ताकतवर दुश्मन था। कैप्टन कालिया और उनके साथियों ने अंत तक मुकाबला किया। लेकिन जब गोलियां खत्म हो गईं, तो दुश्मनों ने कैप्टन कालिया के साथ उनकी टीम को युद्धबंदी बना लिया।
 
 
22 दिन, जिनकी कल्पना भी मुश्किल है
 
 
इसके बाद शुरू हुई वह कहानी, जिसे सुनकर आज भी रूह कांप उठती है। 22 दिनों तक पाकिस्तान की कैद में रहे कैप्टन सौरभ कालिया और उनके 5 साथियों के साथ अमानवीयता की सारी हदें पार कर दी गई थीं। हैवानों ने कैप्टन कालियां की आँखें निकाल ली थी, कान और नाक काट दिए गए थे, शरीर पर गर्म लोहे से दागे गए अनेक जख्मों के निशान थे। जब 9 जून 1999 को उनका शव भारत को सौंपा गया, तो उन पर अत्याचारों के ऐसे निशान थे जिन्होंने पूरे देश को झकझोर दिया। यह सिर्फ हत्या नहीं थी, बल्कि युद्धबंदियों के साथ किए गए उन अंतरराष्ट्रीय नियमों (जिनेवा संधि-1949) का भी खुला उल्लंघन था, जिन्हें दुनिया ने युद्धों की भयावहता को सीमित करने के लिए बनाया है।
 

Capt Saurabh Kalia Story 
 
 
अंतरराष्ट्रीय कानूनों की अनदेखी
 
 
युद्ध के दौरान पकड़े गए सैनिकों के साथ मानवीय व्यवहार करना अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून का मूल सिद्धांत है। 1949 के जिनेवा कन्वेंशन और युद्धबंदियों से संबंधित नियम स्पष्ट रूप से किसी भी प्रकार की शारीरिक यातना, अंग-भंग, अपमानजनक व्यवहार और क्रूरता को प्रतिबंधित करते हैं।
 
 
भारत ने बार-बार यह मुद्दा उठाया कि कैप्टन कालिया और उनके साथियों के साथ जो हुआ, वह इन अंतरराष्ट्रीय दायित्वों का गंभीर उल्लंघन था। लेकिन 27 वर्ष बाद भी इस मामले में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कोई निर्णायक न्याय नहीं हो सका है।
 
 
जब कैप्टन कालिया का पार्थिव शरीर घर पहुंचा, तो सबसे पहले उनके छोटे भाई वैभव कालिया ने उन्हें देखा। वर्षों बाद भी उस क्षण को याद करते हुए उनकी आवाज भर जाती है। वे बताते हैं कि परिवार के लिए अपने ही बेटे को पहचानना मुश्किल हो गया था। चेहरे पर कुछ बचा नहीं था। पहचान का सहारा सिर्फ उनकी भौंहें बनीं।
 
Capt Saurabh Kalia and his brother Vaibhav
 अपने भाई वैभव के साथ सौरभ कालिया 
 
 
कैप्टन कालिया के भाई वैभव कहते हैं कि
 
 
‘जब सौरभ सेना में गए, तब घर में गर्व का माहौल था। फोन की सुविधा आज जैसी नहीं थी। चिट्ठियां ही संवाद का माध्यम थीं, जो कई बार एक महीने बाद पहुंचती थीं। परिवार ने उन्हें वर्दी में बहुत कम देखा था।
 

सौरभ का आखिरी पत्र तब घर पहुंचा, जब वे पहले ही दुश्मन की कैद में थे। उन्होंने अपनी मां के लिए कुछ खाली चेक भी साइन करके छोड़े थे और कहा था कि जरूरत पड़े तो पैसे निकाल लेना। लेकिन नियति को कुछ और मंजूर था। उनकी पहली तनख्वाह उनके बलिदान होने के बाद खाते में आई।'
 
 
Saurabh Kalia and his mother
  मां के साथ कैप्टन सौरभ कालिया की आखिरी तस्वीर 
 
 
सौरभ का सपना बचपन से ही सेना में जाने का था। उन्होंने पहले सशस्त्र बल चिकित्सा महाविद्यालय (AFMC) की परीक्षा दी, लेकिन सफल नहीं हुए। इसके बाद उन्होंने हार नहीं मानी। स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद CDS की परीक्षा दी और चयनित हो गए। IMA, देहरादून से दिसंबर 1998 में पास आउट होने के बाद फरवरी 1999 में उनकी पहली पोस्टिंग कारगिल सेक्टर में हुई। उन्हें हनुमान जी में विशेष आस्था थी। वे हमेशा अपने पर्स में हनुमान जी की तस्वीर रखते थे।
 

Hanuman ji picture in capt saurabh kalia purse कैप्टन कालिया के पर्स में हनुमान जी की तस्वीर
 
27 साल की लड़ाई: न्याय की तलाश
 
 
कारगिल युद्ध खत्म हो गया। देश आगे बढ़ गया। पीढ़ियां बदल गईं। लेकिन पालमपुर के उस घर में समय जैसे 1999 में ही कहीं ठहर गया। कैप्टन कालिया के पिता डॉ. एन. के. कालिया ने अपने बेटे के लिए न्याय मांगते हुए वर्षों तक संघर्ष किया है। उन्होंने राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, सेना, मानवाधिकार संगठनों और विभिन्न सरकारी संस्थाओं को सैकड़ों पत्र लिखे। बताया जाता है कि यह संख्या 500 से भी अधिक है।
 
 
उनकी मांग सरल है कैप्टन सौरभ कालिया और उनके साथियों के साथ हुई क्रूरता को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाया जाए और जिम्मेदार लोगों को जवाबदेह ठहराया जाए। आज भी यह मामला न्याय और जवाबदेही की मांग के प्रतीक के रूप में देखा जाता है।