कश्मीर केवल अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए ही नहीं, बल्कि भारत की प्राचीन आध्यात्मिक और दार्शनिक परंपराओं के प्रमुख केंद्र के रूप में भी जाना जाता है। यहाँ स्थित अनेक प्राचीन मंदिर भारतीय सभ्यता, सनातन आस्था और ज्ञान परंपरा के जीवंत साक्षी हैं। इन्हीं में से एक है श्रीनगर के ज़बरवान पर्वत पर स्थित प्राचीन ज्येष्ठेश्वर महादेव, जिसे आज आदि शंकराचार्य मंदिर के नाम से जाना जाता है।
श्रीनगर के दक्षिण-पूर्व में ज़बरवान (शंकराचार्य) पर्वत पर समुद्र तल से लगभग 1,100 फीट की ऊँचाई पर स्थित यह मंदिर मूलतः ज्येष्ठेश्वर महादेव के नाम से प्रसिद्ध है। आज इसे आदि शंकराचार्य मंदिर के रूप में जाना जाता है। यह मंदिर कश्मीर की आध्यात्मिक, दार्शनिक और सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। यह मंदिर प्राचीन काल से शिव साधना का प्रमुख केंद्र रहा है। यहाँ स्थापित शिवलिंग ज्येष्ठेश्वर के नाम से पूजित है, जिसका अर्थ है - सर्वोच्च और आद्य शिव।
मंदिर के गर्भ गृह में स्थापित ज्येष्ठेश्वर महादेव शिवलिंग
मंदिर का निर्माण
मंदिर के निर्माण-काल को लेकर इतिहासकारों में मतभेद हैं। अपनी पुस्तक ‘Ancient Monuments of Kashmir’ में रामचंद्र काक लिखते हैं कि ‘पुरातत्वविद् जनरल अलेक्ज़ेंडर कनिंघम' ने स्थानीय परंपराओं के आधार पर इस मंदिर का संबंध सम्राट अशोक के पुत्र राजा जलौक (लगभग दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व) से माना है। वहीं कुछ इतिहासकार वर्तमान पत्थर की संरचना का प्रारंभिक निर्माण चौथी शताब्दी ईसा पूर्व के आस-पास राजा गोपादित्य के शासनकाल से जोड़ते हैं।
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कश्मीर की उत्पत्ति और प्राचीन धार्मिक परंपराओं का सर्वाधिक प्राचीन वर्णन नीलमत पुराण में मिलता है। जिस पर्वत पर यह मंदिर स्थित है, उसका उल्लेख नीलमत पुराण तथा राजतरंगिणी जैसे ग्रंथों में गोपाद्री (गोपाद्रि) पर्वत के रूप में मिलता है। बाद की परंपराओं में यह नाम राजा गोपादित्य से भी संबंधित माना गया है, जिसका उल्लेख रामचंद्र काक ने भी किया है।
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गोपादित्य के बाद आने वाली शताब्दियों में यह मंदिर केवल पूजा का स्थान नहीं रहा, बल्कि शिव साधकों और तपस्वियों का प्रमुख केंद्र बन गया। आठवीं शताब्दी में कर्कोट वंश के महान सम्राट ललितादित्य मुक्तापीड के काल में मंदिर का व्यापक जीर्णोद्धार कराया गया। माना जाता है कि इसी समय मंदिर की बाहरी संरचना को और व्यवस्थित किया गया, पहाड़ी तक पहुँचने वाले मार्गों का विकास हुआ और धार्मिक गतिविधियों के लिए आवश्यक व्यवस्थाओं का विस्तार किया गया।
कैसे पड़ा शंकराचार्य मंदिर नाम
आठवीं शताब्दी में केरल के कालडी से निकले जगद्गुरु आदि शंकराचार्य भारत भ्रमण के दौरान कश्मीर पहुँचे। ऐतिहासिक परंपराओं के अनुसार उन्होंने गोपाद्री पर्वत पर स्थित ज्येष्ठेश्वर महादेव मंदिर में भगवान शिव की आराधना की और यहाँ ध्यान एवं साधना की। माना जाता है कि इसी यात्रा के बाद यह प्राचीन शिवालय धीरे-धीरे शंकराचार्य मंदिर के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
शंकराचार्य मंदिर में स्थित आदि शंकराचार्य की तपोस्थली
उसी काल में कश्मीर भारतीय दर्शन का भी एक प्रमुख केंद्र था। आगे चलकर उत्पलदेव, अभिनवगुप्त, क्षेमराज जैसे महान आचार्यों ने कश्मीर शैव दर्शन को दार्शनिक ऊँचाइयों तक पहुँचाया। इस प्रकार यह मंदिर केवल आस्था का ही नहीं, बल्कि भारतीय ज्ञान-परंपरा और आध्यात्मिक चिंतन का भी महत्वपूर्ण केंद्र बना रहा।
मध्यकाल : संघर्ष के बीच आस्था
1389 ईस्वी में सिकंदर शाह 'बुतशिकन' के शासनकाल के दौरान कश्मीर के अनेक प्राचीन मंदिर ध्वस्त किये गए। इतिहासकारों के अनुसार इस काल में शंकराचार्य मंदिर की धार्मिक व्यवस्था और आय पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। मंदिर की बाहरी संरचना को कुछ क्षति पहुँची, किंतु उसका मूल गर्भगृह तथा प्रमुख पत्थर की संरचना सुरक्षित रही। पुरातात्त्विक साक्ष्य भी संकेत देते हैं कि मंदिर का प्राचीन मूल ढाँचा आज तक संरक्षित है।
प्राचीन मंदिर की तस्वीर
1819 : मंदिरों के पुनः संरक्षण का दौर
1819 ईस्वी में महाराजा रणजीत सिंह के शासनकाल में कश्मीर के प्राचीन तीर्थस्थलों को अपेक्षाकृत सुरक्षित वातावरण प्राप्त हुआ। शंकराचार्य मंदिर में पूजा-अर्चना की व्यवस्था सुदृढ़ हुई और श्रद्धालुओं की आवाजाही में सुधार आया। 1846 की अमृतसर संधि के बाद जम्मू-कश्मीर का शासन डोगरा वंश के हाथों में आया। महाराजा गुलाब सिंह ने राज्य के प्राचीन मंदिरों और तीर्थस्थलों के संरक्षण को विशेष महत्व दिया।
शंकराचार्य मंदिर का मानचित्र
शंकराचार्य मंदिर की मरम्मत कराई गई, मंदिर तक पहुँचने वाले मार्गों को व्यवस्थित किया गया तथा श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए सीढ़ियों का निर्माण कराया गया। गर्भगृह तक पहुँचने के लिए लगभग 244 सीढ़ियाँ बनाई गईं, जिनके अंतिम भाग में गर्भगृह तक जाने हेतु 36 अतिरिक्त सीढ़ियाँ हैं। महाराजा रणबीर सिंह ने भी इस संरक्षण कार्य को आगे बढ़ाया और नियमित पूजा-अर्चना की व्यवस्थाओं को सुदृढ़ किया।
शंकराचार्य पर्वत से कश्मीर घाटी का मनोरम दृश्य
आतंकवाद के दौर में भी नहीं टूटी परंपरा
1990 के दशक में जब जम्मू-कश्मीर आतंकवाद की चपेट में आया, तब यह मंदिर भी संवेदनशील धार्मिक स्थलों में शामिल हो गया। कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के बीच भी यहाँ पूजा-अर्चना पूरी तरह कभी बंद नहीं हुई। सीमित संख्या में ही सही, श्रद्धालु निरंतर भगवान ज्येष्ठेश्वर के दर्शन करते रहे। यह केवल धार्मिक परंपरा की निरंतरता नहीं, बल्कि उस सनातन आस्था का भी प्रमाण है जिसने कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी अपनी ज्योति को बुझने नहीं दिया।
आज महाशिवरात्रि, श्रावण मास तथा अन्य प्रमुख पर्वों पर देशभर से श्रद्धालु इस प्राचीन शिवालय में दर्शन के लिए पहुँचते हैं। शंकराचार्य मंदिर केवल कश्मीर का एक ऐतिहासिक मंदिर नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता की उस अखंड सांस्कृतिक चेतना का जीवंत प्रतीक है जिसने अनेक सदियों के राजनीतिक उतार-चढ़ाव, आक्रमणों और चुनौतियों के बावजूद अपनी आध्यात्मिक परंपरा को सुरक्षित रखा है।
Written By :
Ujjawal Mishra