Zulu Spur: आखिरी लड़ाई जिसने कारगिल युद्ध में भारत की जीत पक्की कर दी

    26-जुलाई-2026
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Zulu Spur
 
जुलाई 1999 के तीसरे सप्ताह तक कारगिल युद्ध लगभग समाप्त हो चुका था. पाकिस्तानी सैनिक या तो मारे जा चुके थे, या फिर वो भाग खड़े हुए थे. भारतीय सेना कारगिल की ज्यादातर चोटियों को रिकैप्चर कर चुकी थी. सिवाय एक के, जिसके बिना कारगिल की ये जीत अधूरी थी. और वो चोटी थी, मुश्कोह घाटी की जूलू कॉम्पलैक्स.
 
जुलू कॉम्प्लेक्स एक अकेली चोटी नहीं, बल्कि कई छोटी-बड़ी चोटियों, ढलानों का एक समूह है. जिसमें ट्राई-जंक्शन, थंब, जुलू बेस और जुलू टॉप जैसी चार महत्वपूर्ण चोटियां शामिल हैं.
 
इनको रि-कैप्चर करने के लिए 22 जुलाई से 26 जुलाई तक, तीन चरणों में, पांच दिनों तक सैन्य अभियान चलाया गया. इसे बहादुरी के साथ साथ सेना की शानदार स्ट्रैटजी का एक श्रेष्ठ नमूना समझा जा सकता है. आइए, अब इसके तीनों चरणों को विस्तार से समझते हैं...
 
 
पहला चरण
 
 
सेना का पहला टारगेट होती हैं अग्रिम चौकियां, ताकि यहां बेस तैयार किया जा सके. इसके लिए 3/3 गोरखा राइफल्स बटालियन को चुना जाता है.
 
22 जुलाई 1999 को गोरखा राइफल्स के जवान पहला हमला करते हैं. भारी गोलाबारी और कड़ाके की ठंड के बीच जवान एक के बाद एक कई पाकिस्तानी मोर्चों को ध्वस्त कर देते हैं. पहले 'ट्राई-जंक्शन' फिर 'थंब' और अगले दिन यानि 23 जुलाई को जुलू बेस पर भी फिर से नियंत्रण स्थापित कर लिया जाता है. गोरखा सैनिकों का हमला इतना इतना भीषण था कि पाकिस्तानी सैनिक कुछ समझ ही नहीं पाते और जान बचाने के लिए जूलू टॉप पर भागना पड़ता है.
 
इस तरह पहला चरण सफलतापूर्वक पूरा होता है. इसके बाद शुरु होता है, अगला
दूसरा चरण
 
इस समय पाकिस्तानी सेना जूलू टॉप पर होती है. मजबूत बंकरों में, 16 हजार 700 फीट की ऊंचाई पर. मशीन गनों के साथ
 
माइनस 15 डिग्री ठंड, बेहद कम ऑक्सीजन और लगभग 90 डिग्री की सीधी चढ़ाई, बिना किसी कवर के, और पाकिस्तानियों द्वारा रास्ते में बिछाई गई लैंड माइन्स, इस चरण को बेहद मुश्किल बना देते हैं.
 
अभियान की जिम्मेदारी सौंपी जाती है, बेहद घातक, 9 पैरा स्पेशल फोर्सेज की दो टीमों को.
 
पाकिस्तानी सेना भारतीय सेना की मूवमेंट को देख सकती थी, आसानी से फायर कर सकती थी, इसलिए हमले के लिए सीधी चढ़ाई वाला, लगभग ना मुमकिन लगने वाला बेहद खतरनाक रास्ता चुना जाता है. पाकिस्तानी सैनिकों के लिए यह बड़ा सरप्राइज एलिमेंट था.
 
अब एक तरफ सीधी चढ़ाई और दूसरी तरफ लैंडमाइन्स. चढ़ाई करते समय भारतीय सैनिकों की स्पीड बेहद कम थी, उनका एक गलत कदम इस मिशन और टीम के लिए आखिरी हो सकता था. इसीलिए दुश्मन के लैंडमाइन्स के इस जाल को काटने के लिए 24-25 जुलाई की रात को भारतीय तोपखाने से पाकिस्तानी चौकियों पर भीषण गोलाबारी की जाती है. एकदम नरक जैसी. ताकि एक तो धमाकों के शोर की आड़ में भारतीय कमांडो चढ़ाई शुरू कर सकें. और दूसरा लैंडमाइन्स, अपने आप ही फटकर नष्ट हो जाएं. इसके बाद आता है,
 
तीसरा और आखिरी चरण
 
26जुलाई की सुबह जब सूरज की पहली किरण जूलू टॉप पर पड़ती है, तब तक भारतीय सैनिक वहां पहुंच चुके होते हैं. पाकिस्तानी सेना को इसकी बिलकुल भी उम्मीद नहीं थी, अपने बंकरों के सामने अचानक भारतीय सैनिकों को देखकर उनके होश उड़ जाते हैं. टॉप पर इतनी भी जगह नहीं होती है कि बंदूक से निशाना लगाया जा सके. इसके बाद दोनों सेनाओं के बीच शुरु होती है आमने-सामने की लड़ाई.
 
नायक कौशल यादव इस लड़ाई के हीरो बनकर उभरते हैं. वो ग्रेनेड से पाकिस्तानी बंकरों पर हमला करते हैं. और आमने-सामने की लड़ाई में अकेले पांच पाकिस्तानी सैनिकों को मार गिराते हैं. इतना ही नहीं, घायल होने के बाद भी वो पीछे नहीं हटते और देश के लिए सर्वोच्च बलिदान देते हैं. उन्हें मरणोपरांत वीर चक्र से सम्मानित किया जाता है.
भारतीय सेना दोपहर तक सभी पाकिस्तानी सैनिकों को मार गिराती है. और जूलू टॉप पर तिरंगा लहरा दिया जाता है. इसके बाद पूरे जुलू कॉम्प्लेक्स की तलाशी ली जाती है. ताकि पता लगाया जा सके कि कहीं कोई पाकिस्तानी सैनिक छिपा तो नहीं है.
 
इस जीत के साथ ही 26 जुलाई 1999 को आधिकारिक रूप से ऑपरेशन विजय यानि कारगिल युद्ध की सफलता की घोषणा कर दी जाती है.