जब भी भारत के प्राचीन सूर्य मंदिरों की चर्चा होती है, तो सबसे पहले तीन नाम प्रमुख रूप से सामने आते हैं। कश्मीर स्थित मार्तंड सूर्य मंदिर, ओडिशा का कोणार्क सूर्य मंदिर और गुजरात का मोढेरा सूर्य मंदिर। इनमें मार्तंड सूर्य मंदिर केवल अपनी भव्य वास्तुकला के लिए ही नहीं, बल्कि कश्मीर के सांस्कृतिक और धार्मिक इतिहास में अपने विशेष स्थान के कारण भी अलग पहचान रखता है।
मंदिरों की इस विशेष श्रृंखला में आज चर्चा उसी ऐतिहासिक धरोहर की, जिसने साम्राज्यों का उत्थान देखा, राजनीतिक उथल-पुथल झेली और सदियों की मार सहने के बावजूद अपनी पहचान नहीं खोई। इतिहास, पुराण और पुरातात्त्विक साक्ष्यों के आधार पर आइए जानते हैं मार्तंड सूर्य मंदिर की गौरवशाली यात्रा।
श्रीनगर स्थित मार्तंड सूर्य मंदिर
श्रीनगर से लगभग 64 किमी दूर और दक्षिण कश्मीर संभाग के अनंतनाग जिले से करीब 9.6 किमी दूर मट्टन में स्थित यह मंदिर भारतीय उपमहाद्वीप के सबसे महत्वपूर्ण सूर्य मंदिरों में गिना जाता है। उपलब्ध ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार मंदिर का निर्माण 8वीं शताब्दी में कार्कोट वंश के महान सम्राट ललितादित्य मुक्तापीड ने कराया।
कश्मीर के प्राचीन इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण ग्रंथ नीलमत पुराण माना जाता है। जिसमें कश्मीर की उत्पत्ति, नदियों, तीर्थों, पर्वों और धार्मिक परंपराओं का विस्तार से वर्णन मिलता है। नीलमत पुराण में सूर्य से संबंधित धार्मिक अनुष्ठानों और देवपूजा का उल्लेख इस बात का संकेत देता है कि सूर्योपासना उस समय कश्मीर के सामाजिक और धार्मिक जीवन का महत्वपूर्ण अंग थी। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि सम्राट ललितादित्य ने सूर्य पूजा की शुरुआत नहीं की, बल्कि पहले से प्रचलित परंपरा को एक भव्य स्थापत्य रूप प्रदान किया।
कार्कोट वंश :
625 ई. से 855 ई. के बीच कश्मीर में कार्कोट वंश का शासन रहा। लगभग दो सदी तक शासन करने वाले इस राजवंश के काल में कश्मीर ने राजनीतिक स्थिरता, आर्थिक समृद्धि तथा कला और स्थापत्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की। इस वंश के सबसे प्रसिद्ध और प्रतापी राजा हुए सम्राट ललितादित्य मुक्तापीड (लगभग 724–760 ईस्वी), जिन्हें कश्मीर के इतिहास में सबसे शक्तिशाली शासकों में गिना जाता है।
कल्हण की राजतरंगिणी में ललितादित्य के शासन का वर्णन मिलता हैं। उनके अनुसार ललितादित्य ने केवल अपने राज्य का विस्तार किया, बल्कि नगरों, मठों, मंदिरों और सार्वजनिक निर्माण कार्यों को भी व्यापक संरक्षण दिया।
कल्हण लिखते हैं कि ‘ऐसा कोई प्रमुख स्थान नहीं था जहाँ उन्होंने धार्मिक या लोककल्याण से जुड़ा निर्माण न कराया हो। उनके शासनकाल में कश्मीर कला, स्थापत्य और संस्कृति के स्वर्णकाल में प्रवेश करता दिखाई देता है। इसी काल में अनंतनाग के निकट एक ऊँची पहाड़ी पर मार्तंड सूर्य मंदिर का निर्माण कराया गया।‘
(Kalhana, Rajatarangini, trans. M. A. Stein, Book IV, pp. 156–160)
प्रख्यात इतिहासकार रामचन्द्र काक अपनी पुस्तक ‘Ancient Monuments of Kashmir’ में मार्तंड सूर्य मंदिर को कश्मीर की प्राचीन स्थापत्य कला की सर्वोत्तम उपलब्धियों में स्थान दिया है।
रामचन्द्र काक लिखते हैं, ‘’मार्तंड मंदिर अनंतनाग से करीब 5 मिल दूर स्थित है। मंदिर का निर्माण इतनी ऊँचाई पर किया गया, जहाँ से पूरी कश्मीर घाटी का मनोरम दृश्य नजर आता है। मंदिर का पूर्वाभिमुख (अर्थात पूर्व दिशा में मुख) होना भी इसकी विशेषता है, जिससे प्रातःकालीन सूर्य की किरणें सीधे गर्भगृह तक पहुँचती थीं। यह योजना सूर्योपासना की धार्मिक परंपरा के अनुरूप मानी जाती है।‘’
(Ram Chandra Kak, Ancient Monuments of Kashmir, pp. 131-32)
ASI के अभिलेखों के अनुसार, मंदिर का मुख्य परिसर एक विशाल आयताकार प्रांगण, मध्य में स्थित गर्भगृह तथा चारों ओर बने स्तंभ युक्त परिक्रमा-पथ से मिलकर बना था। विभिन्न पुरातात्त्विक अध्ययनों में मंदिर परिसर के चारों ओर लगभग 84 स्तंभों का वर्णन मिलता है। मंदिर में मौजूद स्तंभों और मंदिर की दीवारों में अनेक देवी देवताओं के चित्र उकेरे गए हैं, जिन्हें आज भी देखा जा सकता है।
खंडहर में तब्दील हो चुके मार्तंड मंसिर का दृश्य
मुख्य प्रवेश द्वार पर माँ गंगा, यमुना और सरस्वती की प्रतिमाएँ अंकित हैं। इसके अतिरिक्त भगवान विष्णु की एक विशाल, वर्तमान में खंडित प्रतिमा भी दिखाई देती है। इसके अतिरिक्त ASI और इतिहासकारों के अनुसार मार्तंड मंदिर के चारों ओर अनेक छोटे मंदिर और उनमें 365 प्रतिमाओं का उल्लेख मिलता है।
मार्तंड सूर्य मंदिर की वास्तुकला :
मार्तंड मंदिर भारतीय मंदिर स्थापत्य की उन अद्भुत कृतियों में से एक है, जहाँ स्थानीय कश्मीरी शिल्पकला, गुप्तकालीन स्थापत्य और गांधार कला के प्रभाव का अद्भुत समन्वय नजर आता है। इसी कारण भारतीय और विदेशी पुरातत्वविदों ने इसे प्राचीन भारत की सर्वश्रेष्ठ मंदिर संरचनाओं में स्थान दिया है। मंदिर की स्थापत्य विशेषताओं में इसका विशाल प्रवेश द्वार, ऊँचे पत्थर के स्तंभ, मेहराब तथा पत्थरों पर की गई सूक्ष्म नक्काशी विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।
ब्रिटिश इतिहासकार जेम्स फर्ग्यूसन ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘History of Indian and Eastern Architecture’ में मार्तंड सूर्य मंदिर को भारतीय मंदिर वास्तुकला की सबसे प्रभावशाली रचनाओं में से एक बताया है। उनके अनुसार इसकी स्थापत्य कला भारतीय उपमहाद्वीप में अद्वितीय है और इसकी तुलना किसी अन्य मंदिर से करना सरल नहीं है।
BOOK II. ARCHITECTURE IN THE HIMALAYAS. CHAPTER I. KASHMIR. (Page 251-61)
मध्यकाल : मंदिर का विध्वंस
लगभग छह शताब्दियों तक यह मंदिर कश्मीर में सूर्योपासना का प्रमुख केंद्र बना रहा। लेकिन 14वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में कश्मीर की राजनीतिक परिस्थितियों में आए बदलाव ने इसके इतिहास की दिशा ही बदल दी।
इसी काल में सुल्तान सिकंदर शाह मिरी (1389–1413 ई.), जिसे 'बुतशिकन' (मूर्ति-भंजक) भी कहा गया उसका शासन रहा। इस काल की सबसे महत्वपूर्ण जानकारी 15वीं शताब्दी में जोनराज द्वारा लिखी गई द्वितीय राजतरंगिणी में मिलता है।
जोनराज सिकंदर शाह मिरी के शासन का वर्णन करते हुए लिखते हैं कि 'सिकंदर के शासन काल में उसने ‘मार्तंड, विष्णु, ईशान, चक्रभृत और त्रिपुरेश्वर’ की प्रतिमाओं को खंडित किया।'
जोनराज द्वारा रचित राजतरंगिणी पृष्ठ (467)
इनके पश्चात कश्मीरी इतिहासकार पीर हसन शाह की 'तारीख-ए-हसन' में मार्तंड मंदिर के विध्वंस का अधिक विस्तृत विवरण मिलता है। उनके अनुसार मंदिर को लगभग एक वर्ष तक गिराने का प्रयास किया गया। जब विशाल पत्थर की संरचना नहीं टूटी तो उसकी नींव से पत्थर निकालकर उनकी जगह लकड़ी रखी गई और उसमें आग लगा दी गई। आग से मंदिर की दीवारों पर मौजूद स्वर्ण-मढ़ित चित्र नष्ट हो गए और परिसर की घेरने वाली दीवारें भी ध्वस्त कर दी गईं।
हालाँकि आधुनिक इतिहासकार यह भी स्वीकार करते हैं कि सदियों तक चली उपेक्षा, प्राकृतिक आपदाओं ने भी मंदिर को प्रभावित किया। विध्वंस के बाद भी मार्तंड सूर्य मंदिर का विशाल चबूतरा, मुख्य प्रवेशद्वार, परिक्रमा-पथ और अनेक पत्थर के स्तंभ आज तक सुरक्षित हैं।
औपनिवेशिक काल : ब्रिटिश पुरातत्वविदों की दृष्टि
19वीं शताब्दी में जब कश्मीर यूरोपीय यात्रियों, इतिहासकारों और पुरातत्वविदों के अध्ययन का केंद्र बनने लगा, तब मार्तंड सूर्य मंदिर ने भी विद्वानों का विशेष ध्यान आकर्षित किया। ब्रिटिश पुरातत्वविद सर अलेक्ज़ेंडर कनिंघम, इतिहासकार जेम्स फर्ग्यूसन, सर मार्क ऑरेल स्टीन तथा कश्मीरी पुरातत्वविद रामचन्द्र काक ने इस मंदिर का विस्तृत अध्ययन किया।
इन विद्वानों ने इसकी स्थापत्य योजना, निर्माण शैली, शिल्पकला और ऐतिहासिक महत्व का विश्लेषण करते हुए इसे भारतीय मंदिर वास्तुकला की उत्कृष्ट कृतियों में स्थान दिया। विशेष रूप से रामचन्द्र काक की पुस्तक Ancient Monuments of Kashmir आज भी मार्तंड सूर्य मंदिर के अध्ययन का एक महत्वपूर्ण स्रोत मानी जाती है। वहीं जेम्स फर्ग्यूसन की किताब History of Indian and Eastern Architecture भी प्रमुख स्रोत है।
स्वतंत्र भारत में संरक्षण
स्वतंत्रता के बाद ASI ने मार्तंड सूर्य मंदिर को राष्ट्रीय महत्व के संरक्षित स्मारकों में शामिल किया। इसके बाद समय-समय पर मंदिर परिसर के संरक्षण, संरचनात्मक स्थिरता तथा अवशेषों के रखरखाव के लिए आवश्यक कार्य किए गए। आज मंदिर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के संरक्षण में है। सदियों तक उपेक्षित रहने के बाद हाल के वर्षों में इस मंदिर को लेकर सार्वजनिक और प्रशासनिक स्तर पर रुचि बढ़ी है।
दशकों बाद मार्तंड मंदिर में राष्ट्रीय अनहद महायोग पीठ, नवलापुरा के पिठाधीश्वर संत रुद्रनाथ महाकाल ने 6 मई 2022 को अपने अनुयायियों के साथ पूजा अर्चना की थी। इसके दो दिन बाद LG मनोज सिन्हा ने मार्तंड मंदिर में नवग्रह पूजा में हिस्सा लिया। इसके अलावा मंदिर के जीर्णोद्धार को लेकर भी सरकार तैयारी में है। इसे लेकर LG सिन्हा ने मार्च 2024 में महत्वपूर्ण बैठक भी की थी।
मार्तंड सूर्य मंदिर के जीर्णोद्धार के लिए जारी नोटिफिकेशन
निष्कर्ष
मार्तंड सूर्य मंदिर का इतिहास केवल एक मंदिर का इतिहास नहीं, बल्कि कश्मीर की सांस्कृतिक, धार्मिक और स्थापत्य यात्रा का इतिहास है। वैदिक परंपरा में सूर्योपासना की अवधारणा से लेकर नीलमत पुराण के उल्लेखों, सम्राट ललितादित्य मुक्तापीड द्वारा इसके भव्य निर्माण, मध्यकालीन राजनीतिक परिवर्तनों और आधुनिक भारत में इसके संरक्षण तक मार्तंड मंदिर भारतीय सभ्यता की निरंतरता का सशक्त प्रमाण है। आज भले ही यह मंदिर खंडहर के रूप में दिखाई देता हो, किंतु इसके अवशेष उस युग की स्थापत्य प्रतिभा, सांस्कृतिक समृद्धि और धार्मिक चेतना की अमिट स्मृति हैं।
अगले लेख में हम कश्मीर की एक और प्राचीन धरोहर की ऐतिहासिक यात्रा पर विस्तार से चर्चा करेंगे।