जम्मू-कश्मीर के प्राचीन मंदिरों की इस विशेष श्रृंखला में अब तक हमने श्रीनगर स्थित आदि शंकराचार्य मंदिर और अनंतनाग के मार्तंड सूर्य मंदिर की ऐतिहासिक और पौराणिक यात्रा को जाना। अब आगे बढ़ते हुए चर्चा उस प्राचीन धरोहर की, जिसने 9वीं शताब्दी में कश्मीर की मंदिर वास्तुकला को एक नई पहचान दी। कहानी है अवंतीस्वामी मंदिर की।
झेलम यानी प्राचीन वितस्ता के निकट बसे अवंतीपुर में आज इस मंदिर के विशाल पत्थर, टूटे स्तंभ और खंडित प्रांगण ही दिखाई देते हैं। लेकिन कभी यही परिसर कश्मीर के धार्मिक और स्थापत्य वैभव का महत्वपूर्ण केंद्र था। भगवान विष्णु को समर्पित इस मंदिर का संबंध उत्पल वंश के संस्थापक राजा अवन्तिवर्मन से है।
तो आखिर अवन्तिवर्मन कौन थे? अवंतीस्वामी मंदिर की स्थापना कब हुई? इसकी वास्तुकला में ऐसा क्या खास था कि सदियों बाद भी इतिहासकार इसकी चर्चा करते रहे? और समय के थपेड़ों के बीच यह भव्य मंदिर खंडहर में कैसे बदल गया? प्राचीन ग्रंथों, इतिहासकारों के विवरण और पुरातात्त्विक साक्ष्यों के आधार पर जानते हैं अवंतीस्वामी मंदिर की गौरवशाली यात्रा।
कर्कोट वंश के बाद कश्मीर में अवन्तिवर्मन का उदय
8वीं शताब्दी में ललितादित्य मुक्तापीड के शासन काल में कर्कोट वंश ने कश्मीर को राजनीतिक और सांस्कृतिक रूप से एक महत्वपूर्ण ऊंचाई दी थी। लेकिन उनके बाद राजसत्ता कमजोर हुई और कश्मीर कई राजनीतिक उतार-चढ़ाव से गुजरा। इसी दौर के बाद लगभग 855 ईस्वी में अवन्तिवर्मन सत्ता में आए और उत्पल वंश की स्थापना की। उनके शासनकाल को कश्मीर के पुनर्गठन के महत्वपूर्ण दौर के रूप में देखा जाता है।
अवन्तिवर्मन के दौर में कश्मीर में केवल मंदिर निर्माण ही नहीं हुआ। कल्हण की राजतरंगिणी में उनके मंत्री सुय्य द्वारा वितस्ता के जलप्रवाह को नियंत्रित करने और कृषि व्यवस्था सुधारने के प्रयासों का भी उल्लेख मिलता है। यह बताता है कि मंदिर निर्माण के साथ-साथ उस दौर में राज्य की आर्थिक और जल-व्यवस्था को मजबूत करने पर भी काम हो रहा था।
स्रोत: कल्हण, राजतरंगिणी, Book V; M. A. Stein
अवंतीस्वामी मंदिर की स्थापना
अवंतीस्वामी मंदिर का निर्माण अवन्तिवर्मन के शासनकाल 855–883 ईस्वी में हुआ। कल्हण की राजतरंगिणी में वर्णन है कि अवन्तिवर्मन ने अपने राज्यारोहण से पहले अवंतीस्वामी की स्थापना की थी। इसके पश्चात उन्होंने अवंतीपुर में भगवान शिव को समर्पित अवंतीश्वर मंदिर का निर्माण कराया।
Book V, verses M. A. Stein, Kalhaṇa's Rājataraṅgiṇī, Vol. I
स्थापत्य कला
मंदिर का विशाल आयताकार प्रांगण, गर्भ गृह, चारों ओर स्तंभयुक्त गलियारे और भव्य प्रवेशद्वार इसकी प्रमुख स्थापत्य विशेषताएं थीं। कश्मीर के मंदिरों की स्थापत्य शैली को भारतीय मंदिर वास्तुकला की एक विशिष्ट क्षेत्रीय परंपरा माना जाता है। अवंतीपुर के मंदिर इसी परंपरा के विकसित रूप को सामने रखते हैं।
राम चंद्र काक मंदिर की स्थापत्य योजना का वर्णन करते हुए लिखते हैं कि ‘’मंदिर एक स्तंभयुक्त परिक्रमा-पथ से घिरे 174 फीट × 148 फीट 8 इंच के पक्के आंगन के बीच स्थित था। मुख्य मंदिर दोहरी आधार-पीठ पर बना था और उसके चारों कोनों पर चार छोटे मंदिर थे। काक के अनुसार पश्चिमी हिस्से में स्तंभों की विशेष सज्जा थी, जबकि मुख्य प्रवेशद्वार तक सीढ़ियों के रास्ते पहुंचा जाता था। प्रवेश के दोनों ओर विष्णु और उनकी consorts की उकेरी गई आकृतियां थीं।‘’
Ancient Monuments Of Kashmir Page – 120
ब्रिटिश इतिहासकार जेम्स फर्ग्यूसन ने ‘History of Indian and Eastern Architecture’ में अवंतीपुर के मंदिरों पर विस्तार से चर्चा की। फर्ग्यूसन ने मार्तंड की तुलना में अवंतीपुर के मंदिरों की एक प्रमुख विशेषता “Greater richness of detail” यानि अधिक समृद्ध स्थापत्य विवरण को बताया। उन्होंने मंदिर के अलंकरण और स्तंभों की कलात्मकता पर भी ध्यान दिया।
सदियों तक मिट्टी में दबा रहा मंदिर
रामचंद्र काक लिखते हैं – ‘मंदिर परिसर लगभग एक हजार वर्षों तक उपेक्षा और प्राकृतिक जमाव के कारण मिट्टी और मलबे में दबा रहा। जब तक मंदिर को बाद में नुकसान पहुंचाने वाली घटनाएं हुईं, तब तक भी इसका बड़ा हिस्सा पहले ही गाद से ढक चुका था।‘
Ancient Monuments Of Kashmir Page – 120
आज अवंतीस्वामी मंदिर जितना दिखाई देता है, उसका एक बड़ा हिस्सा 20वीं शताब्दी के पुरातात्त्विक उत्खनन का परिणाम है। पुरातत्वविद दयाराम साहनी ने 1913 में यहां व्यापक खुदाई की। उनके उत्खनन से मंदिर का प्रांगण, संरचनाएं और बड़ी मात्रा में पुरातात्त्विक सामग्री सामने आई। इस खुदाई का विवरण Archaeological Survey of India Annual Report, 1913–14 में “Excavations at Avantipur” शीर्षक से प्रकाशित हुआ।
साहनी की खुदाई से केवल मंदिर की संरचना ही सामने नहीं आई। यहां से मूर्तियां, सिक्के, मिट्टी के पात्र और अन्य सामग्री भी मिली, जिसने उस समय के कश्मीर के जीवन को समझने में इतिहासकारों की मदद की। अवंतीपुर से मिली भगवान विष्णु की प्रतिमाओं को कश्मीर की मध्यकालीन मूर्तिकला के अध्ययन में विशेष महत्व मिला है। बाद के कला इतिहास अध्ययनों में इन प्रतिमाओं की तुलना गांधार और गुप्तकालीन कला परंपराओं से भी की गई। यानि अवंतीस्वामी मंदिर की कहानी केवल एक खंडहर की कहानी नहीं है। इसकी खुदाई ने 9वीं शताब्दी के कश्मीर के धर्म, कला, स्थापत्य और सामाजिक जीवन की कई परतें खोल दीं।
विध्वंस की कहानी
समय के साथ मंदिर का मूल स्वरूप नष्ट होता गया। प्राकृतिक क्षरण, लंबे समय तक जमा होती रही मिट्टी और गाद, मानवीय हस्तक्षेप तथा मध्यकालीन उथल-पुथल—इन सबने इसके वर्तमान स्वरूप को प्रभावित किया। शिकंदर शाह ने अपने शासन काल में मंदिर को पूरी तरह क्षतिग्रस्त कर दिया।
भारतीय इतिहासकार रामचंद्र काक अपनी किताब ‘Ancient Monuments Of Kashmir’ में भी इसका जिक्र करते हुए लिखा – ‘’शिकंदर शाह के शासन से पहले मंदिर को कुछ हद नुकसान पहुँच चुका था। लेकिन चौदहवीं शताब्दी में सिकंदर बुतशिकन ने अवंतिपुर के मंदिरों को पूरी तरह से नष्ट कर दिया।‘’
Ancient Monuments Of Kashmir P. 125
उपसंहार
आज अवंतीस्वामी मंदिर के बचे हुए स्तंभ और पत्थर उस दौर की कहानी सुनाते हैं जब अवन्तिवर्मन के नेतृत्व में कश्मीर में नगर बस रहे थे, सिंचाई व्यवस्था सुधारी जा रही थी और मंदिर स्थापत्य अपनी एक अलग पहचान बना रहा था। वितस्ता के किनारे खड़े इन खंडहरों को देखकर आज भी अंदाजा लगाया जा सकता है कि नौवीं शताब्दी का कश्मीर कितना समृद्ध और कलात्मक रहा होगा। अवंतीस्वामी मंदिर इसलिए केवल एक खंडहर नहीं है। यह उस कश्मीर की पत्थरों में बची हुई स्मृति है, जिसने कभी अपनी स्थापत्य कला से पूरे हिमालयी क्षेत्र में अलग पहचान बनाई थी।
अगले लेख में हम कश्मीर की एक और प्राचीन धरोहर की ऐतिहासिक यात्रा पर विस्तार से चर्चा करेंगे।
Written By
Ujjawal Mishra